जौनपुर उत्तर प्रदेश में पुलिस और प्रशासन के लाख दावों के बावजूद ज़मीनी हकीकत आज भी पीड़ितों के लिए संघर्ष भरी बनी हुई है। हर सप्ताह थानों और तहसीलों में ‘समाधान दिवस’ के आयोजन के नाम पर कागजी कोरम पूरा किया जा रहा है, लेकिन न्याय की आस में पीड़ित दर-दर भटकने को मजबूर हैं। ताजा मामला जौनपुर जिले से सामने आया है, जहां भूमि विवाद में प्रशासन द्वारा एक पक्ष को गलत तरीके से कब्जा दिलाने का गंभीर आरोप लगाते हुए एक महिला न्याय की गुहार लेकर सीधे एसपी ऑफिस पहुंच गई।

“थानेदार सुनता नहीं, मुझे कप्तान साहब से मिलना है”
महिला थाने की चौखट से लेकर पुलिस अधिकारियों के दफ्तरों तक न्याय की आस में चक्कर काटती नजर आती हैं। जौनपुर की रहने वाली पीड़िता सुषमा यादव जब अपनी फरियाद लेकर एसपी ऑफिस पहुंची, तो वहां का प्रशासनिक रवैया एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गया।सुषमा यादव का आरोप है कि स्थानीय थाने की पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी और मिलीभगत करके उनकी जमीन पर विपक्षियों को गलत तरीके से कब्जा दिला दिया। अपने हक और वजूद की लड़ाई लड़ रही पीड़िता की मांग थी कि वह अपनी पीड़ा सीधे पुलिस कप्तान (एसपी) को बताएगी ताकि उसे निष्पक्ष न्याय मिल सके।
पीआरओ (PRO) पर लगे गंभीर आरोप: नहीं मिलने दिया कप्तान से
मामले में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि जब पीड़िता न्याय की उम्मीद लेकर एसपी ऑफिस पहुंची, तो वहां तैनात जनसंपर्क अधिकारी (PRO) ने उसे कप्तान साहब से मिलने ही नहीं दिया।पीड़िता का दर्द इस बात पर छलक उठा कि जब आम जनता अपनी फरियाद लेकर सीधे जिला मुख्यालय के बड़े अधिकारियों तक नहीं पहुंच सकती, तो थानों के स्तर पर होने वाली अनसुनी के बाद वह कहां जाए? क्या थानों और तहसीलों में लगने वाले समाधान दिवस सिर्फ दिखावा बनकर रह गए हैं? ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि पीड़ित जनता की आवाज पुलिस के उच्चाधिकारियों तक ही नहीं पहुंचेगी, तो उसे न्याय कैसे मिलेगा?
समाधान दिवसों पर उठे बड़े सवाल: क्या कागजों तक सीमित है न्याय?
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा जनता की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए हर शनिवार को थाना और तहसील स्तर पर ‘सम्पूर्ण समाधान दिवस’ का आयोजन किया जाता है। उद्देश्य यह होता है कि जनता को न्याय के लिए भटकना न पड़े और स्थानीय स्तर पर ही मामलों का पारदर्शी निपटारा हो सके।लेकिन जौनपुर की इस घटना ने इन तमाम व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। ज़मीनी विवादों में पुलिस की कथित संलिप्तता और एकतरफा कार्रवाई के चलते पीड़ितों की जान दांव पर लग जाती है। जब स्थानीय पुलिस मनमानी पर उतर आती है और उच्चाधिकारियों तक पहुंचना भी लोहे के चने चबाने जैसा हो जाए, तो आम आदमी खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करता है।
यूपी में न्याय का सफर: क्या अभी भी जारी रहेगा संघर्ष?
उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था के सुधार के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जौनपुर जैसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि निचले स्तर पर खाकी की कार्यशैली में सुधार की अभी कितनी गुंजाइश बाकी है।सुषमा यादव का यह मामला सिर्फ एक महिला की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उन तमाम बेबस लोगों की आवाज है जो थाने की चौखट से धक्के खाकर लौट जाते हैं। अब देखना यह होगा कि क्या जौनपुर के उच्च पुलिस अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेते हुए पीड़िता को न्याय दिलाएंगे या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
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