जालौन उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में मौरंग खनन को लेकर किसानों और खदान संचालकों के बीच विवाद के आरोप सामने आए हैं। परासन मौरंग खदान के आसपास नदी किनारे सब्जियों की खेती करने वाले किसानों का कहना है कि खनन गतिविधियों के कारण उनकी फसलों को नुकसान पहुंच रहा है। किसानों ने आरोप लगाया है कि पोकलैंड मशीनों से रात के समय खनन किया जाता है और इसका विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई। पीड़ित किसानों ने जिलाधिकारी के सामने अपनी शिकायत रखने और न्याय की मांग करने की बात कही है। इस मामले ने खनन गतिविधियों की निगरानी, किसानों की सुरक्षा और शिकायतों पर प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नदी किनारे सब्जियों की खेती, फसल उजड़ने का आरोप
मामला जालौन के परासन क्षेत्र के आसपास का बताया जा रहा है। यहां नदी किनारे खेती करने वाले किसान सब्जियां उगाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। किसानों के मुताबिक, खेती उनके लिए आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है और फसल को नुकसान पहुंचने से उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है।किसानों का आरोप है कि परासन मौरंग खदान क्षेत्र में भारी मशीनों से खनन किए जाने के कारण उनकी सब्जियों की फसल बर्बाद हो रही है। उनका कहना है कि खेतों के आसपास खनन गतिविधियों के चलते खेती करना मुश्किल होता जा रहा है। किसानों ने मांग की है कि उनकी जमीन और फसलों को हुए नुकसान की जांच कराई जाए तथा दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए। फसल को कितना नुकसान हुआ है, कितने किसान प्रभावित हैं और खनन गतिविधियां स्वीकृत क्षेत्र के भीतर हो रही हैं या बाहर, इसकी आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

पोकलैंड मशीनों से रातभर खनन का आरोप
किसानों ने आरोप लगाया है कि परासन मौरंग खदान में पोकलैंड मशीनों के जरिए रातभर खनन किया जाता है। उनके अनुसार, भारी मशीनों के इस्तेमाल से आसपास के कृषि क्षेत्र पर असर पड़ रहा है। किसानों का दावा है कि उन्होंने इस गतिविधि का विरोध कर अपनी फसलों को बचाने की कोशिश की, लेकिन उनकी शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।खनन से जुड़े मामलों में यह जांचना जरूरी होता है कि संबंधित पट्टे की स्वीकृत सीमाएं क्या हैं, खनन की अनुमति किन शर्तों के साथ दी गई है और मशीनों के इस्तेमाल को लेकर क्या नियम लागू हैं। यदि खनन स्वीकृत क्षेत्र से बाहर या नियमों के विपरीत किया जा रहा है, तो जांच के आधार पर संबंधित विभाग कार्रवाई कर सकते हैं।फिलहाल किसानों के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और इस विशेष मामले में प्रशासन की विस्तृत जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है। इसलिए अवैध खनन के आरोपों को जांच के दायरे में ही देखा जाना चाहिए।
विरोध करने पर मारपीट का आरोप
किसानों ने यह भी आरोप लगाया है कि जब उन्होंने कथित खनन गतिविधियों और फसल के नुकसान का विरोध किया, तो उनके साथ मारपीट की गई। कुछ रिपोर्टों में किसानों ने धमकी दिए जाने की शिकायत भी की है। इन आरोपों के सामने आने के बाद मामले में किसानों की सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। यदि किसानों के साथ मारपीट या धमकी की घटना हुई है, तो इसकी निष्पक्ष जांच और शिकायत के आधार पर उचित कार्रवाई आवश्यक है। साथ ही, संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए, ताकि तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय हो सके।किसानों का कहना है कि वे अपनी फसलों और आजीविका की रक्षा के लिए आवाज उठा रहे हैं। ऐसे में उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुनना और किसी भी विवाद की स्थिति में कानून के अनुसार कार्रवाई करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
डीएम से शिकायत के बाद कार्रवाई का इंतजार
किसानों के मुताबिक, वे अपनी समस्याएं लेकर जिलाधिकारी के पास भी पहुंचे थे। उन्होंने खनन गतिविधियों, फसल को नुकसान और विरोध करने पर कथित मारपीट की शिकायत करते हुए कार्रवाई की मांग की। किसानों का आरोप है कि शिकायत करने के बावजूद उन्हें अब तक अपेक्षित राहत नहीं मिली है। शिकायत पर प्रशासन ने क्या कार्रवाई की, जांच के लिए कोई टीम गठित हुई या नहीं और संबंधित खदान के अभिलेखों की जांच की गई या नहीं, इस बारे में आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।ऐसे मामलों में शिकायत की प्राप्ति, मौके का निरीक्षण, खनन की स्वीकृत सीमा का सत्यापन और फसल क्षति का आकलन महत्वपूर्ण कदम होते हैं। यदि किसानों के दावे सही पाए जाते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई और पात्रता के आधार पर क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया पर भी विचार किया जा सकता है।
मेसर्स सलोनी इंटरप्राइजेज की भूमिका की जांच की मांग
विवाद में परासन मौरंग खदान और मेसर्स सलोनी इंटरप्राइजेज का नाम सामने आया है। किसानों ने खदान संचालन से जुड़ी गतिविधियों की जांच कराने की मांग की है। उनका सवाल है कि यदि खनन नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है।यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कंपनी के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी जांच का विषय हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कंपनी ने नियमों का उल्लंघन किया है या प्रशासन ने उसे किसी प्रकार की अनुचित छूट दी है।मामले की निष्पक्ष जांच के लिए खनन पट्टे की शर्तों, स्वीकृत क्षेत्र, मशीनों के उपयोग, खनन के समय और किसानों की शिकायतों का परीक्षण किया जाना चाहिए। जांच में यदि किसी तरह की अनियमितता प्रमाणित होती है, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
किसानों की मांग—फसल और आजीविका की हो सुरक्षा
परासन खदान को लेकर सामने आए विवाद में किसानों की प्रमुख चिंता उनकी फसल और आजीविका है। नदी किनारे सब्जियों की खेती करने वाले परिवारों के लिए फसल को नुकसान पहुंचना सीधे उनकी आमदनी पर असर डाल सकता है। ऐसे में किसानों की शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण और मौके पर स्थिति का निष्पक्ष आकलन जरूरी है।किसानों की मांग है कि कथित अवैध खनन की जांच कराई जाए, फसलों को हुए नुकसान का आकलन किया जाए और विरोध के दौरान मारपीट या धमकी के आरोपों पर भी कार्रवाई हो। साथ ही, खदान संचालन से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि खेती करने वाले लोगों को परेशानी का सामना न करना पड़े।
अब प्रशासन की जांच पर टिकी निगाहें
जालौन के परासन क्षेत्र में मौरंग खनन को लेकर किसानों की शिकायतों ने एक बार फिर खनन गतिविधियों की निगरानी और ग्रामीणों की आजीविका की सुरक्षा का मुद्दा सामने ला दिया है। किसानों ने न्याय की मांग की है, जबकि अवैध खनन, फसल बर्बादी और मारपीट के आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।अब महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन किसानों की शिकायतों की जांच कराए, खदान की स्वीकृत सीमाओं और संचालन संबंधी नियमों का सत्यापन करे तथा आरोपों पर तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करे। यदि अनियमितता या किसी अपराध की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
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