हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: लोक अदालतें नहीं दे सकतीं तलाक, अधिकार सिर्फ फैमिली कोर्ट के पास

Editorial
4 Min Read

लखनऊ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि लोक अदालत या जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को वैवाहिक विवादों में तलाक की डिक्री (फैसला) देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि विवाह विच्छेद का फैसला सुनाने का अधिकार क्षेत्र सिर्फ और सिर्फ परिवार न्यायालय (फैमिली कोर्ट) के पास सुरक्षित है। लोक अदालतों की भूमिका केवल दो पक्षों के बीच आपसी सहमति से समझौता कराने तक ही सीमित है, वे किसी भी मामले में नियमित अदालतों की तरह कोई न्यायिक निर्णय नहीं सुना सकती हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की खंडपीठ ने उन्नाव की एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। इस मामले में महिला ने साल 2018 में उन्नाव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा जारी एक आदेश को चुनौती दी थी। दरअसल, याचिकाकर्ता महिला और उसके पति के बीच लोक अदालत में एक समझौता हुआ था, जिसे उसके पति ने अंतिम तलाक मान लिया और इसी को आधार बनाकर उसने दूसरा विवाह भी कर लिया। जब महिला को इस बात का पता चला, तो उसने इस व्यवस्था के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस पूरे मामले पर गंभीर नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम 2009 के नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि तलाक जैसे गंभीर और संवेदनशील मामलों को अंतिम न्यायिक निर्णय के लिए लोक अदालत में नहीं भेजा जा सकता। अदालत ने उन्नाव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कानून स्वयं लोक अदालत को तलाक देने से रोकता है, तब इस तरह के आदेश पारित करना सीधे तौर पर अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण और कानून का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी साफ किया कि लोक अदालत द्वारा समझौते के दस्तावेज में यह लिखना कि “दोनों पक्ष अब पुनर्विवाह के लिए स्वतंत्र हैं”, पूरी तरह से अवैध और कानूनन अमान्य है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को पूरी तरह रेखांकित किया कि जब तक किसी सक्षम नियमित न्यायालय (परिवार न्यायालय) द्वारा विधिवत रूप से तलाक की डिक्री पारित नहीं की जाती, तब तक पति-पत्नी के बीच का वैवाहिक संबंध कानूनी रूप से समाप्त नहीं माना जा सकता। इसलिए पति द्वारा लोक अदालत के समझौते को तलाक का आधार बताना और उसके बाद दूसरा विवाह करना पूरी तरह से विधि विरुद्ध है। अदालत ने कहा कि लोक अदालतें देश की न्यायिक व्यवस्था में त्वरित, सुलभ और किफायती न्याय का एक बेहतरीन और महत्वपूर्ण माध्यम हैं, लेकिन उन्हें हमेशा अपने तय अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्य करना होगा। लोक अदालतों को उन क्षेत्रों या मामलों में प्रवेश नहीं करना चाहिए जो नियमित अदालतों के लिए सुरक्षित रखे गए हैं।मामले का अंतिम रूप से निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने पीड़ित महिला को कानून के अनुसार आगे की उचित कानूनी कार्रवाई करने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की है। इसके साथ ही, भविष्य में इस तरह की विसंगतियों और क्षेत्राधिकार के उल्लंघन को रोकने के लिए अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने इस आदेश की एक प्रति उत्तर प्रदेश की सभी लोक अदालतों और सभी जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि भविष्य में सभी प्राधिकरण और लोक अदालतें इस कानूनी व्यवस्था का कड़ाई से अनुपालन कर सकें और उनके लिए यह एक मार्गदर्शक फैसला साबित हो।

read more:https://news7hindi.com/weather-patterns-changed-in-up-storm-and-rain-became-a-disaster/

or advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

Share This Article
Leave a Comment