कॉरपोरेट जगत में भूचाल: राजेश एक्सपोर्ट्स पर 15.15 लाख करोड़ की कथित हेराफेरी का आरोप

Editorial
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देश के कॉरपोरेट जगत में उस समय बड़ा भूचाल आ गया जब शेयर बाजार नियामक सेबी ने देश की प्रमुख ज्वेलरी और गोल्ड रिफाइनिंग कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (आरईएल) और उसके चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक राजेश मेहता के खिलाफ कड़ा अंतरिम आदेश जारी किया। सेबी ने कंपनी पर वित्त वर्ष 2021 से 2025 के बीच 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व को कथित तौर पर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और वित्तीय लेनदेन में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया है। आरोपों का पैमाना इतना बड़ा है कि इसने निवेशकों, बाजार विशेषज्ञों और कॉरपोरेट जगत को हैरान कर दिया है। सेबी की जांच के अनुसार, कंपनी द्वारा दर्शाए गए राजस्व का लगभग 99.8 प्रतिशत हिस्सा संदिग्ध पाया गया है। नियामक का कहना है कि वित्तीय दस्तावेजों और लेनदेन की जांच के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं, जिनसे राजस्व को वास्तविकता से कहीं अधिक दिखाने की आशंका पैदा हुई। यदि जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह भारतीय कॉरपोरेट इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक माना जा सकता है।

 

इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं राजेश मेहता, जिन्होंने बेहद साधारण शुरुआत से एक वैश्विक कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया था। बेंगलुरु में जन्मे राजेश मेहता ने 1980 के दशक में अपने भाई के साथ बेहद सीमित पूंजी के सहारे चांदी के आभूषणों का कारोबार शुरू किया था। धीरे-धीरे यह कारोबार बढ़ता गया और 1995 में कंपनी ने शेयर बाजार में कदम रखते हुए अपना आईपीओ लॉन्च किया। इसके बाद राजेश एक्सपोर्ट्स ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई और 2015 में स्विट्जरलैंड की प्रतिष्ठित गोल्ड रिफाइनरी वालकैम्बी का अधिग्रहण कर वैश्विक सुर्खियां बटोरीं। कभी सफलता की मिसाल माने जाने वाले इस कारोबारी समूह पर अब गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगने से पूरे उद्योग जगत में चर्चा तेज हो गई है।

सेबी की रिपोर्ट में केवल कंपनी और उसके प्रबंधन ही नहीं, बल्कि ऑडिट प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। नियामक के अनुसार, जांच के दौरान कंपनी के वैधानिक ऑडिटरों से आवश्यक दस्तावेज और ऑडिट वर्किंग पेपर मांगे गए थे, लेकिन समय पर उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। सेबी का मानना है कि इस तरह का रवैया जांच प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने और महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने की ओर इशारा करता है। यही नहीं, कंपनी पर भी कई बार समन जारी किए जाने के बावजूद अपेक्षित वित्तीय दस्तावेज समय पर प्रस्तुत न करने के आरोप लगे हैं।इस खुलासे का असर शेयर बाजार में तुरंत दिखाई दिया। खबर सामने आते ही राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई और निवेशकों में बेचैनी बढ़ गई। बाजार में कंपनी की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सबसे अधिक चर्चा इस बात की भी हो रही है कि इस मामले का असर देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) पर भी पड़ सकता है। उपलब्ध शेयरधारिता आंकड़ों के अनुसार एलआईसी की कंपनी में लगभग 10.80 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ऐसे में राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में गिरावट का असर एलआईसी के निवेश मूल्य पर भी पड़ा और उसके शेयरों में भी दबाव देखने को मिला।

हालांकि कंपनी ने सेबी के सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। राजेश एक्सपोर्ट्स का कहना है कि उसके द्वारा घोषित राजस्व पूरी तरह सही है और किसी प्रकार की हेराफेरी नहीं की गई है। कंपनी ने अपने बयान में कहा है कि सेबी का आदेश केवल अंतरिम प्रकृति का है और अभी तक किसी भी आरोप पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। कंपनी का दावा है कि कुछ संचार संबंधी भ्रम और दस्तावेजी प्रक्रियाओं के कारण स्थिति उत्पन्न हुई है तथा वह सभी आवश्यक रिकॉर्ड और स्पष्टीकरण नियामक को उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में है। फिलहाल यह मामला कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय पारदर्शिता और निवेशकों के हितों की सुरक्षा से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर रहा है। एक समय वैश्विक विस्तार और कारोबारी सफलता की मिसाल मानी जाने वाली कंपनी आज गंभीर जांच के दायरे में है। अब पूरे बाजार की नजर सेबी की आगे की कार्रवाई, जांच के निष्कर्षों और कंपनी की ओर से पेश किए जाने वाले दस्तावेजों पर टिकी हुई है।यह मामला केवल एक कंपनी या उसके प्रमोटर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर में वित्तीय जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा भी बन गया है। आने वाले दिनों में जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और आरोप कितने सही साबित होते हैं, इस पर न सिर्फ कंपनी का भविष्य बल्कि हजारों निवेशकों का भरोसा भी निर्भर करेगा।

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