
अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर को करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र माना जाता है। यहां हर दिन देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार दानपात्र में नकदी, सोना-चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं चढ़ाते हैं। लेकिन अब इसी चढ़ावे को लेकर उठे सवालों ने पूरे देश को हैरान कर दिया है। मंदिर के चढ़ावे में कथित गबन और हेराफेरी के आरोपों ने न सिर्फ मंदिर प्रबंधन बल्कि उससे जुड़े जिम्मेदार लोगों को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शुरुआती दौर में जहां कुछ करोड़ रुपये की हेराफेरी की चर्चा थी, वहीं अब सोशल मीडिया पर यह आंकड़ा 200 करोड़ रुपये तक पहुंचने के दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, इस रकम की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह से एक के बाद एक खुलासे सामने आ रहे हैं, उससे यह सवाल जरूर उठ रहा है कि आखिर आस्था के इस सबसे बड़े केंद्र में इतना बड़ा खेल कैसे चलता रहा और जिम्मेदारों को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी?

सूत्रों के मुताबिक, मंदिर के दानपात्रों को खोलने के बाद सारी राशि एक जगह इकट्ठा की जाती थी। इसके बाद उसकी गिनती शुरू होती थी। इसी प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर रकम गायब की जाती रही। चूंकि गिनती से पहले यह तय नहीं होता था कि किस दानपात्र में कितनी रकम है, इसलिए गिनती के बाद जो आंकड़ा दर्ज हुआ, वही आधिकारिक रिकॉर्ड बन गया। यही वजह है कि अब यह पता लगाना बेहद मुश्किल हो गया है कि आखिर कुल कितनी राशि का गबन हुआ। मामले में अब तक पांच संदिग्धों को पकड़े जाने और उनकी निशानदेही पर करीब तीन करोड़ रुपये बरामद होने की बात सामने आई है। लेकिन जांच एजेंसियों को आशंका है कि इससे कहीं अधिक रकम पहले ही इधर-उधर खपाई जा चुकी है। यही कारण है कि अब यह मामला केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि मंदिर ट्रस्ट के कई बड़े पदाधिकारी भी सवालों के घेरे में आ गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों की जिम्मेदारी चढ़ावे की सुरक्षा, गिनती और निगरानी की थी, उन्हें आखिर इतनी बड़ी गड़बड़ी की जानकारी क्यों नहीं हुई? अगर जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर जानकारी नहीं थी तो फिर यह प्रशासनिक विफलता नहीं तो और क्या है? यही वजह है कि अब ट्रस्ट के कई बड़े नामों पर उंगलियां उठ रही हैं और उनकी चुप्पी भी सवालों को और गहरा कर रही है।इस बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने वाराणसी में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि राम मंदिर के दानपात्र में चोरी और जमीन खरीद में बड़े घोटाले हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि 2.92 करोड़ रुपये की नजूल जमीन को 24 करोड़ रुपये में खरीदा गया। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, दोषियों की गिरफ्तारी और ट्रस्ट को भंग करने की मांग की। संजय सिंह ने कहा कि यह मामला केवल पैसों का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा हुआ है।
वहीं केंद्रीय मंत्री और अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने भी इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि के चढ़ावे में चोरी अक्षम्य है और इसके दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मंदिर से करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं और राज्य सरकार ने विशेष जांच दल का गठन किया है। उनकी पार्टी की ओर से मांग है कि दोषियों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कड़ी कार्रवाई की जाए। बताया जा रहा है कि चढ़ावे की गिनती के लिए कर्मचारियों को एक आउटसोर्सिंग कंपनी के माध्यम से रखा गया था, लेकिन कर्मचारियों के चयन में ट्रस्ट की भूमिका अहम थी। आरोप यह भी हैं कि इनमें कई कर्मचारी किसी न किसी पदाधिकारी के परिचित या रिश्तेदार थे। सबसे हैरानी की बात यह है कि इन कर्मचारियों की नियमित तलाशी तक नहीं होती थी। मंदिर परिसर की सुरक्षा भले ही पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के हवाले रही हो, लेकिन ट्रस्ट के कर्मचारियों को परिसर में आने-जाने की पूरी छूट थी। सूत्रों के अनुसार, जिन लोगों के पास से रकम बरामद हुई है, वे महज 12 से 18 हजार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर काम कर रहे थे। अब सवाल उठ रहा है कि इतने कम वेतन पर लंबे समय तक काम करने के पीछे आखिर वजह क्या थी? क्या उन्हें किसी बड़े खेल का हिस्सा बनाकर रखा गया था या फिर वे खुद इस पूरे नेटवर्क का हिस्सा बन चुके थे? जांच एजेंसियां अब इन सभी पहलुओं को खंगाल रही हैं।
मामला सिर्फ नकदी तक सीमित नहीं है। चर्चा यह भी है कि चढ़ावे में आए सोना-चांदी और बहुमूल्य जेवरात भी गायब हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक करोड़ों रुपये मूल्य के आभूषणों का हिसाब नहीं मिल रहा है। यहां तक कि दो किलो वजन की एक सोने की गदा के गायब होने की भी चर्चा है। हालांकि, इन दावों की भी अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन अगर जांच में यह सच साबित होता है, तो यह देश के सबसे बड़े धार्मिक संस्थानों में से एक में सुरक्षा और प्रबंधन की सबसे बड़ी विफलताओं में गिना जाएगा।आस्था के इस केंद्र से करोड़ों लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। ऐसे में यह मामला सिर्फ पैसों की हेराफेरी का नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास और श्रद्धा का भी है। अगर आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक आर्थिक घोटाला नहीं होगा, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं के साथ विश्वासघात भी माना जाएगा। अब पूरे देश की निगाहें एसआईटी की जांच पर टिकी हैं। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर रामलला के दरबार में चढ़ाई गई श्रद्धा की कमाई कहां गई और उसके असली गुनहगार कौन हैं।
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