‘प्रतिभा की कमी नहीं, बस तराशने की जरूरत…’ राष्ट्रपति भवन में आदिवासी छात्रों से मिलकर भावुक हुईं द्रौपदी मुर्मू

Editorial
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राष्ट्रपति भवन मंगलवार को एक बेहद खास और ऐतिहासिक पल का गवाह बना, जब देश की प्रथम नागरिक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रव्यापी जनजातीय गरिमा उत्सव के मौके पर देश के कोने-कोने से आए लगभग 200 आदिवासी छात्रों से सीधे रूबरू हुईं। जनजातीय मामलों के मंत्रालय की विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं का लाभ उठाकर अपनी तकदीर बदलने वाले इन होनहारों से बातचीत करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने उनके जीवन के संघर्षों, अनुभवों और भविष्य के बड़े सपनों को बेहद करीब से सुना। भावुक और ऊर्जा से भरे इस संवाद सत्र के दौरान राष्ट्रपति ने दो टूक शब्दों में कहा कि हमारे आदिवासी युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, बस जरूरत है तो उनकी इस छिपी हुई प्रतिभा को सही समय पर तलाशने और तराशने की। उन्होंने इस बात पर गहरी खुशी जताई कि विपरीत और कठिन परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करते हुए इन छात्रों ने न सिर्फ उच्च शिक्षा हासिल की है, बल्कि कई युवाओं ने विदेशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में भी अपनी कामयाबी का परचम लहराया है। राष्ट्रपति ने साफ कहा कि इन बच्चों की यह असाधारण सफलता आज देश के लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है।

इस संवाद के जरिए राष्ट्रपति मुर्मू ने समाज के सफल और समृद्ध हो चुके लोगों को आइना दिखाते हुए एक बेहद गहरा और प्रभावी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में बड़ा बनना बेहद अच्छी बात है और संघर्ष हर इंसान की जिंदगी का एक अनिवार्य हिस्सा होता है, लेकिन जो लोग अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ जाते हैं, उन्हें अपने अतीत और अपने समाज के पीछे छूट गए लोगों को कभी नहीं भूलना चाहिए। राष्ट्रपति ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि एक मजबूत और विकसित राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब आगे बढ़ चुके लोग अपने से पीछे रह गए भाई-बहनों को सहारा देने के लिए खुद एक-दो कदम आगे बढ़ाएं। देश का समग्र विकास किसी एक वर्ग के आगे बढ़ने से नहीं, बल्कि जब समाज के सभी स्तर के लोग एक साथ मिलकर कदमताल करेंगे, तभी भारत सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एक महाशक्ति बनकर उभरेगा। सरकार की छात्रवृत्ति योजनाओं की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल एक आर्थिक मदद नहीं है, बल्कि यह उन प्रतिभावान युवाओं को आसमान छूने के लिए पंख देने जैसा है जो संसाधनों के अभाव में घुटकर रह जाते थे।अपने संबोधन के आखिरी पड़ाव में राष्ट्रपति ने आदिवासी युवाओं को अपनी जड़ों, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को सहेजने की एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने याद दिलाया कि हमारी पहचान और विरासत बेहद अनमोल है और जनजातीय समुदाय के पूर्वजों ने अपनी संस्कृति और अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुतियां दी हैं। भगवान बिरसा मुंडा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वे सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि क्रांति की वो मशाल हैं, जिनके जैसे न जाने कितने ही वीर इस मिट्टी के लिए शहीद हो गए और इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए। राष्ट्रपति ने कहा कि आज हम भले ही जनजातीय गौरव उत्सव मना रहे हैं, लेकिन हमें उनके कड़े संघर्षों को हमेशा याद रखना होगा क्योंकि असली खुशी संघर्ष की भट्टी में तपने के बाद ही मिलती है। उन्होंने युवाओं से भावुक अपील की कि वे आधुनिक शिक्षा और तकनीक के दम पर दुनिया फतह करें, लेकिन अपनी अनूठी विरासत पर हमेशा गर्व करें और उसे संजोकर रखें, क्योंकि अपनी जड़ों से जुड़कर ही एक सशक्त, आत्मनिर्भर और भव्य भारत का सपना सच किया जा सकता है।

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