मऊ में गर्भपात के काले कारोबार का खुलासा, फिर भी कार्रवाई नहीं! बोर्ड गायब, अस्पतालों पर ताले… स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल

Editorial
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मऊ जिले में मेडिकल स्टोर की आड़ में चल रहे कथित गर्भपात के अवैध कारोबार और बिना पंजीकरण संचालित अस्पतालों का बड़ा खुलासा होने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई धरातल पर दिखाई नहीं दे रही है। खुलासे के बाद कुछ अस्पतालों से बोर्ड गायब हो गए, कहीं अस्पतालों पर ताले लटक गए तो कहीं मरीजों की आवाजाही अचानक बंद हो गई। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर ठोस कार्रवाई करते नजर नहीं आए, जिससे पूरे मामले पर सवाल खड़े हो रहे हैं।संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने शुक्रवार से रविवार तक जिले के विभिन्न इलाकों में पड़ताल कर मेडिकल स्टोरों की आड़ में संचालित अवैध अस्पतालों और गर्भपात के नेटवर्क का खुलासा किया था। मामले के सार्वजनिक होने के बाद मंगलवार को टीम ने एक बार फिर संबंधित क्षेत्रों का दौरा कर वास्तविक स्थिति जानने की कोशिश की।

खुलासे के बाद बदले हालात, बोर्ड हटे और अस्पताल हुए बंद

मादी क्षेत्र में संचालित रीता क्लीनिक पर पहुंचने पर वहां का बोर्ड गायब मिला। अस्पताल का बेसमेंट, जहां गतिविधियां संचालित होने की बात सामने आई थी, पूरी तरह बंद मिला। केवल ऊपर की मंजिल पर मेडिकल स्टोर खुला दिखाई दिया।अमिला स्थित प्रतिमा सेवा सदन का गेट खुला था, लेकिन पूरे दिन कोई मरीज नहीं पहुंचा। थानीदास में आनंद पैथोलॉजी बंद मिली, जबकि कोपागंज में कृष्णा अस्पताल खुला मिला। वहीं एक अन्य बिना बोर्ड वाले क्लीनिक पर ताला लटका मिला।स्थानीय लोगों का कहना है कि स्टिंग ऑपरेशन के खुलासे के बाद अस्पताल संचालकों को कार्रवाई का डर सताने लगा था। यही वजह रही कि कई स्थानों पर गतिविधियां अचानक बंद हो गईं। हालांकि आश्चर्य की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से मौके पर पहुंचकर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई।

स्टिंग में उजागर हुआ था गर्भपात का नेटवर्क

मंगलवार को सामने आई रिपोर्ट में कोपागंज, अमिला, मादी सिपाह, थानादास और पुराघाट क्षेत्रों में मेडिकल स्टोरों की आड़ में गर्भपात कराने और बिना मानकों के अस्पताल संचालन के गंभीर आरोप सामने आए थे। रिपोर्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने स्वास्थ्य विभाग की निष्क्रियता पर नाराजगी जताई।लोगों का सवाल है कि जब मामला सार्वजनिक रूप से उजागर हो चुका है और संबंधित स्थानों की पहचान भी सामने आ गई है, तब भी कार्रवाई में देरी क्यों की जा रही है।


“टीम मीटिंग में थी, जल्द कार्रवाई होगी” — डॉ. इरशाद अहमद

कोपागंज सीएचसी प्रभारी डॉ. इरशाद अहमद ने मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा—

“मामला हमारे संज्ञान में है। टीम मीटिंग में व्यस्त थी। जल्द ही आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।”

हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि मामला सामने आने के बाद तत्काल निरीक्षण और जांच होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।


“बिना पंजीकरण अस्पताल सीज नहीं होता” — डॉ. अशोक कुमार

बड़राव सीएचसी प्रभारी डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि जांच की गई है और संबंधित अस्पताल को पंजीकरण कराने के लिए सात दिन का समय दिया गया है।

उन्होंने कहा—

“जांच कर ली गई है। पंजीयन कराने के लिए सात दिन का समय दिया गया है।”

जब उनसे पूछा गया कि बिना पंजीकरण अस्पताल संचालित होने पर तत्काल सीजिंग की कार्रवाई क्यों नहीं हुई, तो उन्होंने कहा—

“ऐसा नहीं होता। पहले नोटिस दिया जाता है और समय दिया जाता है।”

उनके इस बयान के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर और सवाल उठने लगे हैं।


सीएमओ का दावा— टीम गठित, अभियान चलेगा

मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. पंकज कुमार ने स्वीकार किया कि मामले में तत्काल कार्रवाई नहीं हो सकी।

उन्होंने कहा—

“मंगलवार को मीटिंग और अन्य विभागीय कार्यों के चलते कार्रवाई नहीं हो पाई। टीम गठित कर दी गई है। इनके खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाएगा।”

हालांकि सवाल यह है कि जब मामला जनस्वास्थ्य और कानून दोनों से जुड़ा है तो कार्रवाई के लिए और कितना इंतजार करना होगा।


“बड़ा एक्सपोज हुआ, लेकिन कार्रवाई नहीं” — कृष्णा खंडेलवाल

समाजसेवी कृष्णा खंडेलवाल ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा—

“इतने बड़े मामले का खुलासा किया गया है, लेकिन उसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होना स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।”

उनका कहना है कि यदि मीडिया और सामाजिक संगठनों के प्रयासों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती तो आम जनता का भरोसा व्यवस्था से उठ जाएगा।


“जनहित में खुलासे के बाद भी जिम्मेदार खामोश” — अरविंद मूर्ति

आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद मूर्ति ने भी विभागीय चुप्पी को चिंताजनक बताया।

उन्होंने कहा—

“मेडिकल हॉल की आड़ में चल रहे इन अस्पतालों को लेकर विभाग पहले से कटघरे में रहा है। लेकिन जब कोई जनहित में इस तरह का खुलासा करता है और उसके बाद भी जिम्मेदार चुप रहते हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है।”

उन्होंने मांग की कि सभी संदिग्ध अस्पतालों और क्लीनिकों की संयुक्त जांच कराई जाए।


“जागरूकता के बावजूद लोग पहुंच रहे हैं” — डॉ. संजय सिंह

एक सामाजिक कार्यक्रम में शामिल डॉ. संजय सिंह ने कहा—

“जनहित में ऐसे मामलों के सामने आने पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद लोग ऐसे स्थानों पर पहुंच रहे हैं, जो चिंता का विषय है।”

उन्होंने लोगों से भी सतर्क रहने और केवल पंजीकृत अस्पतालों में ही इलाज कराने की अपील की।


“सिर्फ कागजी कार्रवाई होती है” — देवप्रकाश राय

किसान नेता देवप्रकाश राय ने प्रशासनिक रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा—

“कोपागंज में अवैध अस्पतालों को लेकर अक्सर सिर्फ कागजी कार्रवाई होती है। इतना बड़ा मामला उजागर होने के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को खुद आगे बढ़कर कार्रवाई करनी चाहिए थी।”


कार्रवाई कब? यही सबसे बड़ा सवाल

मऊ में गर्भपात के कथित अवैध कारोबार और मेडिकल स्टोरों की आड़ में चल रहे अस्पतालों का मामला सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कार्रवाई कब होगी? खुलासे के बाद बोर्ड हटना, अस्पताल बंद होना और संचालकों का अचानक सतर्क हो जाना इस बात का संकेत है कि मामला साधारण नहीं है। ऐसे में यदि जिम्मेदार विभाग समय रहते सख्त कदम नहीं उठाता, तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही पर बड़ा प्रश्न|

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