
लखनऊ में हाल ही में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। हादसे के बाद प्रशासन और विभागीय अधिकारी हरकत में जरूर आए हैं, लेकिन राजधानी की एक और भयावह सच्चाई सामने आई है। शहर में जहां सिर्फ 226 कोचिंग संस्थान ही विधिवत पंजीकृत हैं, वहीं करीब 4,000 कोचिंग सेंटर बिना पंजीकरण के संचालित हो रहे हैं। इनमें पढ़ने वाले हजारों छात्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर शिक्षा के नाम पर चल रही इस अवैध व्यवस्था को संरक्षण कौन दे रहा है? अगर नियम इतने स्पष्ट हैं तो फिर हजारों कोचिंग सेंटर बिना पंजीकरण के कैसे चल रहे हैं? और अगर विभाग को इसकी जानकारी है तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कोचिंग के नाम पर मौत का इंतजार?
शहर के कई इलाकों में संचालित कोचिंग संस्थान ऐसे भवनों में चल रहे हैं, जहां न फायर सेफ्टी के पर्याप्त इंतजाम हैं, न इमरजेंसी एग्जिट और न ही छात्रों की संख्या के अनुसार बैठने की व्यवस्था। कई जगह संकरी सीढ़ियां, बंद खिड़कियां और भीड़भाड़ वाले कमरों में सैकड़ों छात्र पढ़ने को मजबूर हैं।नियमों के मुताबिक किसी भी कोचिंग संस्थान में आने-जाने का मार्ग अलग-अलग होना चाहिए। आग लगने की स्थिति में बचाव के पर्याप्त साधन होने चाहिए। दूसरी मंजिल या उससे ऊपर संचालित संस्थानों में आपातकालीन निकासी की व्यवस्था अनिवार्य है। सीसीटीवी कैमरे और फायर सेफ्टी उपकरण भी जरूरी हैं। लेकिन हकीकत में इनमें से अधिकांश मानकों का पालन नहीं हो रहा।
विभाग की वेबसाइट पर ही नहीं है सूची
हैरानी की बात यह है कि उच्च शिक्षा विभाग ने अपने यहां पंजीकृत कोचिंग संस्थानों की सूची तक सार्वजनिक नहीं की है। न तो वेबसाइट पर इसकी जानकारी उपलब्ध है और न ही अभिभावकों को यह पता चल पाता है कि जिस संस्थान में वे अपने बच्चों का दाखिला करा रहे हैं, वह कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है या नहीं।इस पारदर्शिता की कमी का फायदा अवैध कोचिंग संचालक खुलेआम उठा रहे हैं। कई संस्थान एक ही पंजीकरण के आधार पर शहर में कई शाखाएं चला रहे हैं, जबकि नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि प्रत्येक शाखा का अलग पंजीकरण होना चाहिए।

कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दावे
विभागीय अधिकारी दावा कर रहे हैं कि समय-समय पर निरीक्षण किया जाता है, लेकिन जब उनसे पूछा गया कि अब तक कितने अवैध कोचिंग संस्थानों पर कार्रवाई हुई, तो उनके पास कोई ठोस आंकड़ा नहीं था। राजधानी में आज तक किसी बड़े अवैध कोचिंग नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई का रिकॉर्ड सामने नहीं आया है।यही वजह है कि अवैध कोचिंग कारोबार लगातार फैलता गया और आज यह संख्या हजारों में पहुंच चुकी है। सवाल यह है कि अगर वर्षों तक कार्रवाई नहीं हुई तो क्या विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है?
एक पंजीकरण, कई शाखाएं
जांच में यह भी सामने आया है कि कई कोचिंग संस्थान एक ही पते का पंजीकरण कराकर शहर में कई अन्य शाखाएं चला रहे हैं। यह सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन है। इसके बावजूद ऐसे संस्थानों के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई।कोचिंग विनियमन अधिनियम के अनुसार प्रत्येक शाखा का अलग पंजीकरण होना चाहिए। इसके साथ ही छात्रों के बैठने के लिए निर्धारित दूरी, पर्याप्त वेंटिलेशन और फायर एनओसी जैसी शर्तें भी अनिवार्य हैं।
मैदान में उतरीं चार टीमें
बढ़ते दबाव के बीच क्षेत्रीय उच्च शिक्षा विभाग ने चार जांच टीमें गठित की हैं। ये टीमें हजरतगंज, आलमबाग, अमीनाबाद, अलीगंज समेत कई इलाकों में जांच कर रही हैं। हालांकि अधिकांश कोचिंग संस्थान बंद मिलने के कारण टीमों को ठोस कार्रवाई का मौका नहीं मिला।अधिकारियों का कहना है कि कई संस्थानों की पहचान कर ली गई है और उनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। लेकिन सवाल वही है कि वर्षों से चल रहे अवैध संस्थानों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जुर्माना भी तय, फिर डर क्यों नहीं?
उत्तर प्रदेश कोचिंग विनियमन अधिनियम के तहत अवैध कोचिंग संस्थान चलाने पर पहली बार 25 हजार रुपये, दूसरी बार एक लाख रुपये तक जुर्माना और तीसरी बार एफआईआर दर्ज कराने का प्रावधान है।इसके बावजूद हजारों संस्थान खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। इससे साफ है कि या तो निगरानी कमजोर है या फिर कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है।
सबसे बड़ा सवाल…
जब राजधानी में सिर्फ 226 पंजीकृत और करीब 4,000 अवैध कोचिंग संस्थान चल रहे हों, तो हजारों छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? क्या अग्निकांड के बाद जागी व्यवस्था कुछ दिनों में फिर ठंडी पड़ जाएगी? और क्या छात्रों की जिंदगी से हो रहा यह खिलवाड़ यूं ही चलता रहेगा?लखनऊ के अभिभावक और छात्र अब जवाब मांग रहे हैं। क्योंकि सवाल सिर्फ नियमों का नहीं, बल्कि हजारों जिंदगियों की सुरक्षा का है।

