देशभर के लाखों घर खरीदारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और राहतभरा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी बिल्डर ने फ्लैट या मकान का कब्जा तय समय से काफी देर से दिया है, तो घर खरीदार कब्जा मिलने के बाद भी मुआवजे की मांग कर सकता है। अदालत ने कहा कि केवल फ्लैट का कब्जा मिल जाने भर से खरीदार के कानूनी अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। यदि बिल्डर की लापरवाही या देरी से खरीदार को आर्थिक, मानसिक या अन्य प्रकार का नुकसान हुआ है, तो वह उपभोक्ता आयोग (कंज्यूमर फोरम) में जाकर मुआवजे की मांग कर सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के साथ नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि फ्लैट का कब्जा लेने के बाद खरीदार उपभोक्ता नहीं रह जाता और वह देरी के लिए बिल्डर से मुआवजा नहीं मांग सकता। अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कहा कि यह कानून और उपभोक्ता अधिकारों की भावना के विपरीत है।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी घर खरीदार की शिकायत केवल फ्लैट का कब्जा हासिल करने तक सीमित नहीं होती। यदि बिल्डर ने तय समयसीमा का पालन नहीं किया और वर्षों की देरी के बाद फ्लैट सौंपा, तो उस देरी के कारण हुए नुकसान का मुआवजा मांगना खरीदार का वैध अधिकार है। कब्जा मिलने के बाद भी यह अधिकार समाप्त नहीं होता।यह फैसला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के द्वारका स्थित एक हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़े मामले में आया। इस मामले में एक खरीदार को फ्लैट का कब्जा मिलने में करीब 22 वर्ष की देरी हुई थी। लंबे इंतजार के बाद जब उसे फ्लैट मिला तो उसने देरी के लिए मुआवजे की मांग की। लेकिन एनसीडीआरसी ने यह कहते हुए उसकी शिकायत खारिज कर दी थी कि कब्जा लेने के बाद वह उपभोक्ता नहीं रहा और अब मुआवजा नहीं मांग सकता। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को पलटते हुए खरीदार के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि देरी से कब्जा देना स्वयं में सेवा में कमी (Deficiency in Service) का मामला है। यदि बिल्डर समय पर फ्लैट नहीं देता, तो खरीदार को किराया देना पड़ सकता है, बैंक की ईएमआई चुकानी पड़ सकती है, आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है और मानसिक तनाव भी झेलना पड़ता है। ऐसे नुकसान की भरपाई केवल इसलिए खत्म नहीं हो सकती कि बाद में बिल्डर ने फ्लैट का कब्जा दे दिया।सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि बिल्डर और खरीदार के बीच हुए एग्रीमेंट में यदि आर्बिट्रेशन क्लॉज (मध्यस्थता की शर्त) मौजूद है, तब भी उससे खरीदार का उपभोक्ता आयोग में जाने का अधिकार खत्म नहीं होता। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण कानून लोगों को अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा देता है और किसी निजी समझौते की शर्त के आधार पर उन्हें कंज्यूमर फोरम जाने से नहीं रोका जा सकता।इस फैसले का असर देशभर के रियल एस्टेट सेक्टर पर पड़ सकता है। पिछले कई वर्षों में हजारों परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो सकीं। लाखों खरीदार वर्षों तक अपने सपनों के घर का इंतजार करते रहे। कई लोगों को एक तरफ बैंक की ईएमआई चुकानी पड़ी तो दूसरी ओर किराए के मकान में भी रहना पड़ा। ऐसे खरीदार अब इस फैसले के आधार पर मुआवजे की मांग करने का कानूनी आधार प्राप्त कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बिल्डरों की जवाबदेही बढ़ाएगा। अब केवल कब्जा देकर बिल्डर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकेंगे। यदि परियोजना में अनावश्यक देरी हुई है, तो उन्हें उसके लिए कानूनी रूप से जवाब देना होगा। इससे रियल एस्टेट कंपनियों पर समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने का दबाव भी बढ़ेगा।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में खरीदार द्वारा वर्ष 2005 में जिला उपभोक्ता फोरम में दायर की गई शिकायत को फिर से बहाल कर दिया है। अदालत ने संबंधित उपभोक्ता फोरम को निर्देश दिया है कि वह पूरे मामले की सुनवाई कर एक वर्ष के भीतर यह तय करे कि फ्लैट सौंपने में कितनी देरी हुई और क्या खरीदार मुआवजे का हकदार है।कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में ऐसे हजारों मामलों के लिए मिसाल बनेगा। इससे उन घर खरीदारों को भी राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्होंने वर्षों की देरी के बाद मजबूरी में फ्लैट का कब्जा तो ले लिया, लेकिन अब तक यह मानते रहे कि उनका मुआवजे का अधिकार समाप्त हो चुका है।सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि उपभोक्ता के अधिकार सर्वोपरि हैं। यदि बिल्डर ने अपने वादे के अनुसार समय पर फ्लैट नहीं दिया है, तो कब्जा मिलने के बाद भी खरीदार न्याय की मांग कर सकता है। यह फैसला न केवल लाखों घर खरीदारों के लिए बड़ी राहत है, बल्कि रियल एस्टेट सेक्टर को भी यह स्पष्ट संदेश देता है कि समयसीमा का उल्लंघन करने पर जवाबदेही तय होगी और खरीदारों के अधिकारों की हर हाल में रक्षा की जाएगी।
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