लखनऊ राम मंदिर में कथित दान गबन का मामला अब सिर्फ जांच का विषय नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है। अयोध्या में करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस विवाद ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि मामला इतना गंभीर है तो इसकी जांच ED, CBI या आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों से क्यों नहीं कराई गई? उन्होंने दावा किया कि जांच को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) को सौंपे जाने के पीछे सत्ता के भीतर चल रही खींचतान जिम्मेदार है।वहीं भारतीय जनता पार्टी ने अखिलेश यादव के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे जनता की आस्था से जुड़े मुद्दे पर राजनीति करने की कोशिश बताया। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि घटना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन विपक्ष को इस मुद्दे पर राजनीति करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
- ‘ED-CBI नहीं, SIT क्यों?’—अखिलेश ने उठाए बड़े सवाल
- ‘दिल्ली और लखनऊ के बीच सत्ता संघर्ष’ का दावा
- ‘पैसा देखकर मर्यादा भूल गए लोग’
- ‘जनता के आक्रोश से डर रहे हैं लोग’
- बीजेपी का पलटवार—’आस्था पर राजनीति कर रही सपा’
- ‘राम मंदिर पर सवाल उठाने वालों को जवाब जनता देगी’
- जांच को लेकर बढ़ी राजनीतिक बहस
- जांच पूरी होने का इंतजार

‘ED-CBI नहीं, SIT क्यों?’—अखिलेश ने उठाए बड़े सवाल
लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि यदि मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और दान से जुड़ा है, तो इसकी जांच केवल SIT तक सीमित क्यों रखी गई? उन्होंने सवाल किया कि केंद्रीय एजेंसियों को जांच से दूर रखने का कारण क्या है?अखिलेश ने कहा कि अगर ED, CBI या आयकर विभाग इस मामले में शामिल होते, तो जांच की दिशा अलग होती। उनके मुताबिक, जांच का स्वरूप इस बात का संकेत देता है कि सत्ता के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्र सक्रिय हैं।
‘दिल्ली और लखनऊ के बीच सत्ता संघर्ष’ का दावा
सपा प्रमुख ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि मौजूदा व्यवस्था में सत्ता के दो केंद्र दिखाई देते हैं—एक दिल्ली और दूसरा लखनऊ। उन्होंने आरोप लगाया कि इसी कथित सत्ता संघर्ष के चलते जांच को केंद्रीय एजेंसियों के बजाय SIT को सौंपा गया।उन्होंने कहा कि यह केवल जांच का विषय नहीं, बल्कि यह भी देखने की जरूरत है कि जांच किसके नियंत्रण में है और उसकी रिपोर्ट किसे सौंपी जाएगी।
‘पैसा देखकर मर्यादा भूल गए लोग’
अपने बयान में अखिलेश यादव ने धार्मिक संदर्भ भी दिया। उन्होंने कहा कि भगवान राम के जीवन का सबसे बड़ा संदेश ‘मर्यादा’ है, लेकिन इस मामले में कुछ लोगों ने उसी मर्यादा को लांघ दिया।उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “पैसे को देखकर लोग अपना आपा खो बैठे हैं।” उनका कहना था कि जो भी व्यक्ति भगवान राम के जीवन और आदर्शों को समझता है, वह जानता है कि मर्यादा का पालन सबसे बड़ा धर्म है।
‘जनता के आक्रोश से डर रहे हैं लोग’
सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि कथित दान गबन के मामले में जनता के भीतर गहरा आक्रोश है और यही वजह है कि जिम्मेदार लोग खुलकर सामने आने से बच रहे हैं।उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की ओर से दिए गए दान और चढ़ावे से जुड़े किसी भी मामले में पारदर्शिता बेहद जरूरी है और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
बीजेपी का पलटवार—’आस्था पर राजनीति कर रही सपा’
अखिलेश यादव के आरोपों के बाद भारतीय जनता पार्टी ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी।उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि यह घटना यदि हुई है तो निश्चित रूप से गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है।उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का इतिहास राम मंदिर आंदोलन के विरोध से जुड़ा रहा है और ऐसे में उन्हें इस मुद्दे पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है।
‘राम मंदिर पर सवाल उठाने वालों को जवाब जनता देगी’
ब्रजेश पाठक ने कहा कि देश और सनातन समाज अच्छी तरह जानता है कि राम मंदिर को लेकर किन दलों ने अतीत में क्या रुख अपनाया था। उन्होंने कहा कि भगवान राम करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं और इस विषय पर राजनीति करना उचित नहीं है।उन्होंने यह भी कहा कि सरकार तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ेगी और यदि किसी स्तर पर कोई अनियमितता सामने आती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
जांच को लेकर बढ़ी राजनीतिक बहस
राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े कथित दान गबन विवाद ने अब राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। विपक्ष जहां जांच की निष्पक्षता और एजेंसी के चयन पर सवाल उठा रहा है, वहीं सत्तारूढ़ दल विपक्ष पर आस्था से जुड़े विषय को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है, क्योंकि यह धार्मिक आस्था और राजनीतिक विमर्श—दोनों से जुड़ा हुआ है।
जांच पूरी होने का इंतजार
फिलहाल मामले की जांच जारी है और संबंधित एजेंसियां तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई कर रही हैं। अभी तक किसी भी जांच एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से अंतिम निष्कर्ष जारी नहीं किया है।कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच पूरी होने और आधिकारिक रिपोर्ट सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आरोप किस हद तक सही हैं और यदि किसी की जिम्मेदारी तय होती है तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।राम मंदिर से जुड़ा यह मामला केवल कानूनी जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने प्रदेश की राजनीति को भी गर्मा दिया है। एक ओर अखिलेश यादव जांच प्रक्रिया और एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर बीजेपी विपक्ष पर आस्था के मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है।फिलहाल इस पूरे विवाद पर सबकी निगाहें जांच की प्रगति और आधिकारिक निष्कर्ष पर टिकी हैं। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और आगे क्या कानूनी कार्रवाई होती है।
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