परिसीमन बिल पर बड़ा सियासी धमाका! शरद पवार की NCP ने रखी 50% फॉर्मूले की शर्त, INDIA गठबंधन पर सुप्रिया सुले का दो टूक ऐलान

Editorial
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नई दिल्ली देश की राजनीति में इन दिनों जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है परिसीमन (Delimitation) बिल। लोकसभा और विधानसभा सीटों के संभावित पुनर्निर्धारण को लेकर केंद्र सरकार की तैयारियों के बीच अब शरद पवार की पार्टी एनसीपी (शरदचंद्र पवार) ने ऐसा संकेत दिया है, जिसने राजनीतिक हलकों में नई हलचल पैदा कर दी है।सवाल उठने लगा है कि क्या शरद पवार की एनसीपी केंद्र सरकार के परिसीमन बिल का समर्थन करने जा रही है? क्या संसद में सरकार को इस महत्वपूर्ण विधेयक पर विपक्ष के एक बड़े दल का साथ मिल सकता है? इन अटकलों के बीच पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद सुप्रिया सुले ने पहली बार विस्तार से अपना पक्ष रखा है।हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि समर्थन बिना शर्त नहीं होगा। पार्टी का रुख पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार प्रस्तावित बिल में क्या प्रावधान लेकर आती है।

50 प्रतिशत सीट बढ़ाने की शर्त पर सकारात्मक संकेत

प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रिया सुले ने कहा कि अगर केंद्र सरकार देश के सभी राज्यों के लिए लोकसभा और विधानसभा सीटों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का प्रावधान लिखित रूप में बिल का हिस्सा बनाती है, तो उनकी पार्टी इस प्रस्ताव पर सकारात्मक तरीके से विचार कर सकती है।उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभी तक सरकार ने संशोधित विधेयक विपक्षी दलों के सामने नहीं रखा है। ऐसे में किसी भी तरह का अंतिम फैसला लेना जल्दबाजी होगी।सुले ने कहा कि पहले सरकार पूरा संशोधित बिल सार्वजनिक करे, उसके बाद एनसीपी उसका विस्तार से अध्ययन करेगी और फिर पार्टी अपना अंतिम रुख तय करेगी।यानी फिलहाल पार्टी ने न तो समर्थन का ऐलान किया है और न ही विरोध का। लेकिन यह जरूर संकेत दिया है कि यदि सभी राज्यों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जाता है, तो बातचीत की गुंजाइश बनी हुई है।

सर्वदलीय बैठक में क्या हुई चर्चा?

सुप्रिया सुले ने बताया कि परिसीमन के मुद्दे पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में उन्होंने हिस्सा लिया। इस महत्वपूर्ण बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद थे।बैठक के दौरान सरकार ने सभी दलों के सामने परिसीमन को लेकर अपनी प्रारंभिक सोच साझा की। चर्चा के दौरान सभी राज्यों के लिए 50 प्रतिशत सीट बढ़ाने के प्रस्ताव पर भी विचार-विमर्श हुआ।सुले के मुताबिक, सरकार ने यह भी जानकारी दी कि इस विषय पर समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, डीएमके सहित कई विपक्षी दलों से भी चर्चा की गई है, ताकि व्यापक सहमति बनाई जा सके।इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि सरकार इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश कर रही है और विपक्ष के प्रमुख दलों को विश्वास में लेने का प्रयास जारी है।

आबादी के आधार पर परिसीमन पर जताई चिंता

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सुप्रिया सुले ने एक अहम चिंता भी जाहिर की।उन्होंने कहा कि यदि परिसीमन सिर्फ आबादी के आधार पर किया गया, तो इसका सबसे बड़ा असर उन राज्यों पर पड़ेगा जिन्होंने वर्षों तक जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है।सुले ने विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।उनका कहना था कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को सफल बनाया, उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान पहुंचाना उचित नहीं होगा।इसी वजह से एनसीपी चाहती है कि ऐसा फार्मूला तैयार किया जाए जो देश के हर राज्य के साथ समान और न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करे।

50 प्रतिशत फॉर्मूला क्यों माना जा रहा है अहम?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सभी राज्यों की मौजूदा लोकसभा और विधानसभा सीटों में समान रूप से लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि की जाती है, तो प्रतिनिधित्व बढ़ेगा और उन राज्यों की चिंताएं भी काफी हद तक कम हो सकती हैं, जिन्हें आबादी आधारित परिसीमन से नुकसान होने की आशंका है।हालांकि, अंतिम निर्णय सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले विधेयक और संसद में होने वाली चर्चा पर निर्भर करेगा।फिलहाल सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से ऐसा कोई अंतिम मसौदा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

NDA में जाने की अटकलों पर लगाया विराम

परिसीमन बिल को लेकर चर्चा के साथ-साथ पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक गलियारों में एक और अटकल तेजी से चल रही थी।कहा जा रहा था कि शरद पवार की एनसीपी केंद्र सरकार के करीब आ सकती है और संसद में सरकार का समर्थन कर सकती है।लेकिन सुप्रिया सुले ने इन सभी अटकलों पर साफ और दो टूक जवाब दिया।उन्होंने कहा कि एनसीपी (शरदचंद्र पवार) पूरी मजबूती के साथ INDIA गठबंधन का हिस्सा है। पार्टी की प्रतिबद्धता गठबंधन के प्रति पहले जैसी ही है और एनडीए में जाने या किसी नए राजनीतिक समीकरण की कोई संभावना नहीं है।उन्होंने स्पष्ट किया कि परिसीमन बिल पर पार्टी का रुख पूरी तरह नीति और राज्यों के हित के आधार पर तय होगा, न कि किसी राजनीतिक गठजोड़ या सत्ता समीकरण के आधार पर।

अब सरकार के अगले कदम पर टिकी निगाहें

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि केंद्र सरकार परिसीमन बिल का अंतिम स्वरूप क्या रखती है।क्या सरकार वास्तव में सभी राज्यों के लिए 50 प्रतिशत सीट बढ़ाने का प्रावधान बिल में शामिल करेगी?क्या दक्षिण भारत और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की चिंताओं को दूर करने वाला कोई संतुलित फार्मूला सामने आएगा?और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि सरकार ऐसा प्रस्ताव लेकर आती है, तो क्या विपक्ष के कुछ दल इस विधेयक के समर्थन में आ सकते हैं?इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में संसद और राजनीतिक गलियारों में होने वाली गतिविधियों से साफ होंगे।फिलहाल इतना तय है कि परिसीमन बिल अब केवल संसदीय प्रक्रिया का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की राजनीति, राज्यों के अधिकार, संघीय ढांचे और भविष्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। ऐसे में सरकार का हर कदम और विपक्ष की हर प्रतिक्रिया आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।

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