नई दिल्ली देशभर में NEET-UG पेपर लीक विवाद को लेकर हुए छात्र आंदोलनों के बीच पुलिस कार्रवाई पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपना लिया है। मंगलवार को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने कहा कि छात्रों पर पुलिस की कथित ज्यादती के आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं और इनकी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच जरूरी है।मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के ऐसे छात्र प्रदर्शनकारियों को तत्काल रिहा किया जाए, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पात्र छात्रों के खिलाफ अगली सुनवाई तक किसी प्रकार की जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी।सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद पूरे देश में छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
- सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिखाई सख्ती?
- नाबालिग छात्रों को राहत
- आपराधिक रिकॉर्ड वालों को नहीं मिलेगी राहत
- स्वतंत्र जांच के दिए संकेत
- डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश
- दिल्ली सरकार को जांच जारी रखने की अनुमति
- इन राज्यों से मांगा जवाब
- घायल पुलिसकर्मियों की भी होगी निष्पक्ष जांच
- ‘जिसने कानून तोड़ा, उसके खिलाफ कार्रवाई हो’
- देशभर में चर्चा का विषय बना फैसला
- क्या होगा आगे?
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिखाई सख्ती?
NEET-UG पेपर लीक के विरोध में पिछले दिनों दिल्ली सहित कई राज्यों में छात्रों ने प्रदर्शन किए थे। इन प्रदर्शनों के दौरान कई जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। कुछ याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग किया और कई छात्रों को हिरासत में लिया गया।इन्हीं आरोपों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगे हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होना न्याय के हित में आवश्यक है।
नाबालिग छात्रों को राहत
अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि—
- जिन छात्र प्रदर्शनकारियों की उम्र 18 वर्ष से कम है,
- और जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है,
उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।साथ ही, ऐसे पात्र छात्रों के खिलाफ सुनवाई पूरी होने तक किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी।हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत केवल उन्हीं लोगों के लिए है जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
आपराधिक रिकॉर्ड वालों को नहीं मिलेगी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि यह अंतरिम सुरक्षा उन लोगों पर लागू नहीं होगी जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है या जिनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं।अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने कानून अपने हाथ में लिया है या हिंसक गतिविधियों में शामिल रहा है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रह सकती है।

स्वतंत्र जांच के दिए संकेत
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।अदालत ने संकेत दिया कि आगे आवश्यकता पड़ने पर—
- स्वतंत्र जांच समिति,
- या विशेष जांच दल (SIT)
के गठन पर भी विचार किया जा सकता है।हालांकि इस संबंध में अभी अंतिम आदेश नहीं दिया गया है।
डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी राज्यों को महत्वपूर्ण निर्देश दिए जहां छात्र आंदोलन हुए थे।अदालत ने कहा कि निम्नलिखित सभी साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए—
- सीसीटीवी फुटेज
- ड्रोन रिकॉर्डिंग
- बॉडी कैमरा फुटेज
- वायरलेस संचार रिकॉर्ड
- पीसीआर लॉग
- अन्य इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल साक्ष्य
साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि प्रदर्शनकारियों से संबंधित डिजिटल डेटा सुरक्षित रखा जाए, लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया जाए।
दिल्ली सरकार को जांच जारी रखने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को दर्ज एफआईआर की जांच जारी रखने की अनुमति दी है।हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच जारी रहने के बावजूद पात्र छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी।इससे जांच प्रक्रिया और छात्रों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास दिखाई देता है।
इन राज्यों से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों के मुख्य सचिवों से भी जवाब तलब किया है।इन राज्यों में शामिल हैं—
- दिल्ली
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- महाराष्ट्र
- केरल
- मध्य प्रदेश
अदालत ने इन राज्यों से पूछा है कि याचिकाओं में लगाए गए आरोपों पर उनका क्या पक्ष है।
घायल पुलिसकर्मियों की भी होगी निष्पक्ष जांच
सुनवाई के दौरान अदालत ने केवल छात्रों की बात नहीं की, बल्कि ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों का भी उल्लेख किया।मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि प्रदर्शन के दौरान 200 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, तो उन घटनाओं की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि न्याय केवल एक पक्ष के लिए नहीं होता। यदि किसी भी व्यक्ति—चाहे वह प्रदर्शनकारी हो या पुलिसकर्मी—के साथ कानून से परे जाकर व्यवहार हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

‘जिसने कानून तोड़ा, उसके खिलाफ कार्रवाई हो’
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
जिसने भी कानून अपने हाथ में लिया है या अपनी सीमा से बाहर जाकर कार्रवाई की है, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
इस टिप्पणी को अदालत का संतुलित दृष्टिकोण माना जा रहा है, जिसमें न तो कानून व्यवस्था से समझौता किया गया और न ही नागरिक अधिकारों की अनदेखी की गई।
देशभर में चर्चा का विषय बना फैसला
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद छात्र संगठनों, अभिभावकों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।कई लोगों का मानना है कि अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।वहीं अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां अदालत आगे की जांच और संभावित स्वतंत्र समिति के गठन पर फैसला ले सकती है।
क्या होगा आगे?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद संबंधित राज्यों को अपना जवाब दाखिल करना होगा।साथ ही सभी डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया भी सुनिश्चित करनी होगी।आने वाली सुनवाई में अदालत उपलब्ध रिकॉर्ड, राज्यों के जवाब और जांच की प्रगति के आधार पर आगे के निर्देश जारी कर सकती है।
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