छात्रों की हुंकार के आगे हर बार झुकी सत्ता! लाठीचार्ज, गोलियां और दमन भी नहीं दबा सके आंदोलन की आवाज

Editorial
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देश में नीट परीक्षा विवाद और छात्र आंदोलनों के बीच एक बार फिर इतिहास के वे पन्ने चर्चा में हैं, जिन्होंने यह साबित किया कि लोकतंत्र में छात्रों की आवाज को लंबे समय तक दबाना आसान नहीं होता। आजाद भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब छात्र अपने अधिकारों और मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे, तब-तब सत्ता को उनकी बात सुननी पड़ी। कई बार लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन छात्र आंदोलनों का प्रभाव इतना व्यापक रहा कि अंततः सरकारों को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना पड़ा।नीट पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं को लेकर देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच छात्र आंदोलनों का यही इतिहास एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। हाल के घटनाक्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) में बड़े स्तर पर कार्रवाई के बाद यह बहस तेज हो गई है कि छात्र आंदोलन लोकतंत्र में परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं।

इतिहास गवाह है, छात्र आंदोलनों ने बदले कई फैसले

आजादी के बाद से देश के विभिन्न राज्यों में छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती दी। कई आंदोलनों की शुरुआत विश्वविद्यालय परिसरों से हुई, लेकिन धीरे-धीरे वे पूरे प्रदेश और फिर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गए।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छात्र आंदोलन केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहे, बल्कि कई बार उन्होंने शासन व्यवस्था, सामाजिक बदलाव और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी प्रभावित किया।

1953: लखनऊ से उठी चिंगारी

नवंबर 1953 में लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों ने आंदोलन शुरू किया। जल्द ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र भी उनके समर्थन में उतर आए। आंदोलन तेज हुआ तो लखनऊ और कानपुर में हिंसा की घटनाएं भी सामने आईं। बसों में आगजनी हुई, कांग्रेस नेताओं का विरोध हुआ और कई स्थानों पर टकराव की स्थिति बनी।तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने विधानसभा में स्पष्ट कहा था कि हिंसा करने वाले छात्रों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। हालांकि बाद में विपक्ष के दबाव और लगातार बढ़ते आंदोलन के कारण सरकार को अपना रुख नरम करना पड़ा।

1955: राज्यपाल के हस्तक्षेप से खत्म हुआ आंदोलन

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1955 में दीक्षांत समारोह के दौरान हुए विवाद के बाद छात्रों को निष्कासित किए जाने के विरोध में बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। करीब 12 दिनों तक चले आंदोलन के बाद तत्कालीन राज्यपाल के. एम. मुंशी के हस्तक्षेप से समाधान निकला और आंदोलन समाप्त हुआ।इस घटना ने यह संदेश दिया कि संवाद और बातचीत किसी भी टकराव का सबसे प्रभावी समाधान हो सकते हैं।

कोलकाता से तमिलनाडु तक गूंजे आंदोलन

1959 में कोलकाता में छात्रों के आंदोलन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और गोलीबारी तक की। इसके बावजूद आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया।1965 में राजभाषा कानून को लेकर दक्षिण भारत में व्यापक छात्र आंदोलन हुआ। विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई जगह पुलिस कार्रवाई हुई, लेकिन अंततः केंद्र सरकार को भी परिस्थितियों के अनुसार अपने कदमों पर विचार करना पड़ा।

1972: राजस्थान में उठी मांग, पूरे प्रदेश में फैला आंदोलन

राजस्थान में हाड़ौती विश्वविद्यालय की मांग को लेकर कोटा से शुरू हुआ छात्र आंदोलन धीरे-धीरे पूरे प्रदेश में फैल गया। बड़ी संख्या में छात्र सड़कों पर उतरे और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाया।

जेपी आंदोलन ने बदल दी देश की राजनीति

1974 से 1977 के बीच बिहार में शुरू हुआ छात्र आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े जन आंदोलनों में शामिल माना जाता है। छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन बाद में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में “संपूर्ण क्रांति” के रूप में सामने आया।इस आंदोलन ने केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति को प्रभावित किया और आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता परिवर्तन का बड़ा कारण बना।

मराठवाड़ा आंदोलन में मुख्यमंत्री खुद पहुंचे

1978 में मराठवाड़ा क्षेत्र में छात्रों के आंदोलन ने जब व्यापक रूप लिया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार स्वयं आंदोलनकारियों के बीच पहुंचे और बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने का प्रयास किया।इस घटना को संवाद आधारित समाधान का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

आज भी वही सवाल—संवाद या टकराव?

नीट परीक्षा विवाद के बीच देशभर में छात्रों के प्रदर्शन जारी हैं। कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की खबरें भी सामने आईं। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और केवल प्रदर्शन होने के आधार पर बल प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता।इस टिप्पणी ने एक बार फिर छात्र आंदोलनों और लोकतांत्रिक अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस को नई दिशा दे दी है।

लोकतंत्र में छात्रों की भूमिका

विशेषज्ञों का मानना है कि छात्र समाज की सबसे जागरूक और ऊर्जावान शक्ति माने जाते हैं। जब शिक्षा, रोजगार, परीक्षा प्रणाली या सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे उठते हैं, तब छात्र आंदोलनों का प्रभाव दूरगामी होता है।हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आंदोलन शांतिपूर्ण, संवैधानिक और कानून के दायरे में रहकर किए जाएं, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो और जनहित के मुद्दों का समाधान संवाद के माध्यम से निकल सके।आजादी के बाद का इतिहास यही बताता है कि छात्र आंदोलनों ने कई बार सरकारों को फैसले बदलने पर मजबूर किया, लेकिन हर दौर में सबसे प्रभावी रास्ता संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही साबित हुई। यही कारण है कि आज भी जब छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो पूरा देश उनकी आवाज, उनके मुद्दों और उससे जुड़े लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीरता से विचार करता है।

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