ईरान ने मांगा युद्ध का मुआवजा, ट्रंप ने दिया पलटवार; बोले- 50 साल का हिसाब दो

Editorial
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ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने के बजाय एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। हालिया सैन्य संघर्ष में हुए नुकसान की भरपाई के लिए ईरान की ओर से अमेरिका से मुआवजे की मांग की गई, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मांग को लेकर ऐसा पलटवार किया कि बातचीत का पूरा रुख बदलता दिखाई दे रहा है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अगर ईरान अमेरिका से नुकसान का मुआवजा मांगता है, तो अमेरिका भी पिछले कई दशकों में हुए नुकसान का हिसाब ईरान से मांग सकता है।इस बयान के बाद ईरान-अमेरिका संबंध, युद्ध का मुआवजा, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और दोनों देशों के बीच दशकों पुराना विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है।

ईरान ने अमेरिका से मांगा युद्ध का मुआवजा

हालिया संघर्ष में ईरान को हुए नुकसान को लेकर अमेरिका से मुआवजे की मांग सामने आई है। ईरान का तर्क है कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से उसके देश में भारी नुकसान हुआ और इसकी भरपाई की जिम्मेदारी अमेरिका की होनी चाहिए।ईरान की इस मांग पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे तौर पर पीछे हटने के बजाय इसे बातचीत का एक संभावित मुद्दा माना, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका की तरफ से भी मुआवजे का दावा सामने रखने का संकेत दिया।ट्रंप का संदेश साफ था कि अगर दोनों देशों के बीच मुआवजे की बात होगी तो इसे केवल हालिया संघर्ष तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

ट्रंप ने कहा- अमेरिका भी मांगेगा मुआवजा

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की मांग के जवाब में कहा कि यदि तेहरान अमेरिका से युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई चाहता है, तो वाशिंगटन भी अपने नुकसान का हिसाब मांग सकता है।ट्रंप ने पिछले करीब 50 वर्षों में अमेरिका को हुए नुकसान और ईरान से जुड़े विभिन्न संघर्षों का हवाला देते हुए मुआवजे की मांग की संभावना जताई।यानी अब मामला सिर्फ यह नहीं रह गया है कि हालिया सैन्य संघर्ष में किसका कितना नुकसान हुआ। ट्रंप के बयान के बाद यह सवाल भी उठने लगा है कि अगर पुराने विवादों का हिसाब खोला गया, तो दोनों देश एक-दूसरे पर कितने दावे कर सकते हैं।

50 साल पुराने विवादों का हिसाब क्यों महत्वपूर्ण?

ईरान और अमेरिका के रिश्ते पिछले कई दशकों से बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच राजनीतिक मतभेदों के साथ-साथ परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा, सैन्य गतिविधियों और मध्य पूर्व में प्रभाव को लेकर भी लगातार टकराव रहा है।ऐसे में ट्रंप का 50 साल के हिसाब का जिक्र महज मुआवजे तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह बयान अमेरिका की बातचीत की रणनीति को भी दर्शाता है।ट्रंप का रुख यह संकेत देता है कि अमेरिका किसी भी संभावित समझौते में केवल ईरान की मांगों पर चर्चा करने के बजाय अपने दावों को भी बराबर महत्व देना चाहता है।

बातचीत की मेज पर नया मुद्दा बना मुआवजा

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने की कोशिशों में पहले से ही कई जटिल मुद्दे शामिल हैं। अब युद्ध में हुए नुकसान के मुआवजे का सवाल भी बातचीत का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।कूटनीतिक बातचीत में मुआवजा बेहद संवेदनशील मुद्दा माना जाता है, क्योंकि इसके साथ किसी कार्रवाई की जिम्मेदारी और नुकसान का आकलन जुड़ा होता है।अगर दोनों पक्ष अपने-अपने नुकसान का दावा करते हैं तो सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना होगी कि नुकसान की गणना किस आधार पर होगी और किस घटना के लिए कौन जिम्मेदार माना जाएगा।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर भी नजर

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर इस मार्ग की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ जाती है। तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति पर इसका असर पड़ सकता है।ऐसे में ईरान-अमेरिका के बीच किसी भी बातचीत का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजार और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

परमाणु कार्यक्रम भी बड़ा मुद्दा

ईरान और अमेरिका के बीच विवाद का एक बड़ा कारण ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी रहा है। अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता जताता रहा है, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्यों से जोड़ता रहा है।इसके अलावा मध्य पूर्व में सैन्य और राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद हैं।अब अगर मुआवजे का मुद्दा भी बातचीत में शामिल होता है तो पहले से जटिल वार्ता और कठिन हो सकती है।

ट्रंप की रणनीति- दबाव बनाने की कोशिश?

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति और कूटनीति में अक्सर दबाव और सौदेबाजी की रणनीति देखने को मिलती है। ईरान के मुआवजे के दावे पर उनका जवाब भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।ट्रंप ने ईरान की मांग को एकतरफा स्वीकार करने के बजाय अमेरिकी नुकसान का मुद्दा सामने रख दिया। इससे बातचीत का संतुलन बदल सकता है।अमेरिका अब यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि किसी भी समझौते में केवल ईरान के नुकसान की चर्चा नहीं होगी, बल्कि अमेरिकी पक्ष के दावों और नुकसान को भी शामिल किया जाएगा।

ईरान की प्रतिक्रिया पर रहेगी नजर

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान ट्रंप के इस बयान का किस तरह जवाब देता है। क्या तेहरान पुराने विवादों के हिसाब को बातचीत का हिस्सा मानने के लिए तैयार होगा या वह केवल हालिया संघर्ष में हुए नुकसान की भरपाई की मांग पर कायम रहेगा?दोनों देशों के बीच बातचीत की दिशा काफी हद तक इसी प्रतिक्रिया पर निर्भर कर सकती है।अगर मुआवजे का मुद्दा औपचारिक वार्ता का हिस्सा बनता है तो दोनों पक्षों के बीच लंबी और कठिन बातचीत हो सकती है।

क्या आसान होगा अमेरिका-ईरान समझौता?

ईरान और अमेरिका के बीच किसी भी समझौते तक पहुंचना पहले से ही आसान नहीं है। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा, सैन्य कार्रवाई, आर्थिक प्रतिबंध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे मुद्दे बातचीत को जटिल बनाते हैं।अब मुआवजे का सवाल भी सामने आ गया है।ऐसे में दोनों देशों को किसी समझौते तक पहुंचने के लिए केवल वर्तमान विवाद ही नहीं, बल्कि पुराने मतभेदों को भी ध्यान में रखना पड़ सकता है।

अब असली सवाल- किसका कितना हिसाब?

ईरान का कहना है कि उसे अमेरिकी कार्रवाई से नुकसान हुआ है और उसकी भरपाई होनी चाहिए। दूसरी तरफ ट्रंप का कहना है कि अगर मुआवजे की बात होगी तो अमेरिका भी अपने नुकसान का हिसाब मांगेगा।यानी बातचीत अब एकतरफा मुआवजे से निकलकर दोनों पक्षों के दावों तक पहुंचती दिखाई दे रही है।अब देखना होगा कि ईरान और अमेरिका इस मुद्दे को किस तरह आगे बढ़ाते हैं। क्या दोनों देश पुराने विवादों को पीछे छोड़कर भविष्य के समझौते पर ध्यान देंगे या फिर पांच दशक पुराने घटनाक्रम भी बातचीत की मेज पर खुलेंगे?फिलहाल इतना साफ है कि ईरान ने मुआवजे की मांग रखी और ट्रंप ने जवाब में अमेरिकी नुकसान का हिसाब सामने रख दिया। अब सवाल सिर्फ युद्ध के नुकसान की भरपाई का नहीं, बल्कि उन पुराने विवादों का भी है जिनकी परछाई आज तक ईरान-अमेरिका संबंधों पर दिखाई देती है।

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