आरक्षण नहीं तो वोट नहीं’ से गूंजा जलेसर: निषाद पार्टी का शक्ति प्रदर्शन, विधानसभा सत्र से पहले सरकार को बड़ा अल्टीमेटम

Editorial
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रिपोर्ट: आयुष तिवारी

एटा उत्तर प्रदेश की राजनीति में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। एटा जिले की 106 जलेसर (सुरक्षित) विधानसभा में बुधवार को निषाद पार्टी ने अपनी राजनीतिक ताकत का जोरदार प्रदर्शन करते हुए सरकार को स्पष्ट संदेश दिया कि यदि कश्यप-निषाद समाज की लंबे समय से चली आ रही आरक्षण की मांग पूरी नहीं हुई, तो इसका असर आने वाले चुनावों में भी दिखाई देगा। “आरक्षण नहीं तो वोट नहीं” के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा और सैकड़ों की संख्या में जुटे कार्यकर्ताओं ने सरकार से तत्काल निर्णय लेने की मांग की।जुलूस और प्रदर्शन का नेतृत्व निषाद पार्टी के जिला अध्यक्ष राकेश कश्यप ने किया। उनके साथ बड़ी संख्या में पार्टी पदाधिकारी, कार्यकर्ता, युवा, महिलाएं और कश्यप-निषाद समाज के लोग शामिल रहे। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां लेकर सरकार से मांग की कि आगामी 3 अगस्त 2026 से शुरू होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा सत्र में कश्यप-निषाद समाज को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने का प्रस्ताव लाया जाए।

भाजपा विधायक की अनुपस्थिति में प्रतिनिधि को सौंपा गया ज्ञापन

प्रदर्शन के बाद कार्यकर्ताओं ने भाजपा विधायक संजीव दिवाकर की अनुपस्थिति में उनके प्रतिनिधि नरेश चंद्र माथुर को मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मांग की गई कि कश्यप-निषाद समाज को संविधान की अनुसूचित जाति सूची में क्रमांक 53 पर ‘मझवार’ और क्रमांक 66 पर ‘तुरैहा’ के रूप में आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए सरकार तत्काल कदम उठाए।प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वर्षों से यह मांग उठाई जा रही है, लेकिन अभी तक इसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया है। अब समाज और अधिक इंतजार करने के मूड में नहीं है।

“अब वादे नहीं, फैसला चाहिए”

सभा को संबोधित करते हुए जिला अध्यक्ष राकेश कश्यप ने कहा कि निषाद, कश्यप, बिंद, मल्लाह और संबंधित समाज वर्षों से अपने संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। चुनाव के समय राजनीतिक दल बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद इन मांगों को भुला दिया जाता है।उन्होंने कहा कि अब समाज केवल आश्वासन नहीं बल्कि ठोस निर्णय चाहता है। यदि विधानसभा सत्र में इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

“आरक्षण नहीं तो वोट नहीं” बना आंदोलन का मुख्य नारा

पूरे प्रदर्शन के दौरान सबसे अधिक गूंजने वाला नारा था—“आरक्षण नहीं तो वोट नहीं”। इस नारे के माध्यम से निषाद पार्टी ने साफ संकेत दिया कि आने वाले चुनावों में आरक्षण का मुद्दा उनकी राजनीति का सबसे बड़ा एजेंडा रहेगा।कार्यकर्ताओं ने कहा कि समाज को बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रहेगा और गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया जाएगा।

विधानसभा सत्र से पहले सरकार पर बढ़ा दबाव

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधानसभा सत्र शुरू होने से ठीक पहले इस तरह का शक्ति प्रदर्शन सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। यदि इस मुद्दे पर सरकार कोई निर्णय नहीं लेती है तो विपक्ष और विभिन्न सामाजिक संगठन इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना सकते हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में निषाद और कश्यप समाज कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में इस वर्ग की नाराजगी किसी भी राजनीतिक दल के लिए चिंता का विषय बन सकती है।

समाज से एकजुट होने की अपील

सभा के दौरान वक्ताओं ने समाज के लोगों से एकजुट रहने और संगठन को मजबूत बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अधिकार संघर्ष से मिलते हैं और जब तक समाज संगठित नहीं होगा, तब तक उसकी आवाज मजबूती से नहीं सुनी जाएगी।नेताओं ने कार्यकर्ताओं से गांव-गांव जाकर लोगों को आरक्षण की मांग और उसके महत्व के बारे में जागरूक करने का भी आह्वान किया।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बीच प्रशासन रहा सतर्क

प्रदर्शन के दौरान स्थानीय प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क नजर आया। कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ और ज्ञापन सौंपने के बाद कार्यकर्ताओं ने सरकार से जल्द सकारात्मक निर्णय लेने की उम्मीद जताई।

आगे की रणनीति पर नजर

निषाद पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि विधानसभा सत्र में आरक्षण के मुद्दे पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो प्रदेशभर में बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू किया जाएगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह केवल एक ज्ञापन नहीं, बल्कि पूरे समाज की भावनाओं और अधिकारों की आवाज है।

राजनीतिक संदेश साफ

जलेसर में हुए इस शक्ति प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण का मुद्दा आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। “आरक्षण नहीं तो वोट नहीं” का नारा केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सरकार के लिए एक सीधा राजनीतिक संदेश भी बनकर उभरा। अब सबकी निगाहें 3 अगस्त से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र पर टिकी हैं कि सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है।

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