लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर:भगवान शिव के इस प्राचीन धाम की कहानी, इतिहास, वास्तुकला और धार्मिक महत्व

Editorial
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ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर को यूं ही ‘टेंपल सिटी’ यानी मंदिरों का शहर नहीं कहा जाता। इस शहर की पहचान उसके प्राचीन मंदिरों, कलिंग स्थापत्य और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी है। इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में लिंगराज मंदिर का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भुवनेश्वर के पुराने शहर क्षेत्र में स्थित है और ओडिशा की धार्मिक एवं स्थापत्य विरासत का शानदार उदाहरण माना जाता है। ओडिशा पर्यटन विभाग के अनुसार, मंदिर का वर्तमान स्वरूप 11वीं शताब्दी के आसपास विकसित हुआ और इसकी ऊंचाई करीब 180 फीट है।

लिंगराज मंदिर का इतिहास

लिंगराज मंदिर को भुवनेश्वर की प्राचीन धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यह मंदिर कलिंग शैली की मंदिर वास्तुकला के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी है। ओडिशा पर्यटन के अनुसार, भुवनेश्वर में मंदिर स्थापत्य की परंपरा अपने चरम पर पहुंचने वाले दौर में लिंगराज मंदिर का विशेष महत्व रहा। मंदिर का विशाल परिसर और उसकी बारीक नक्काशी इसे भारतीय मंदिर वास्तुकला की उल्लेखनीय कृतियों में शामिल करती है।भुवनेश्वर का प्राचीन क्षेत्र एकाम्र क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। ओडिशा पर्यटन के मुताबिक, शहर का नाम ‘त्रिभुवनेश्वर’ से जुड़ा है, जिसका अर्थ तीनों लोकों के ईश्वर से संबंधित माना जाता है। यहां सदियों से शिव उपासना की मजबूत परंपरा रही है।

भगवान शिव के साथ विष्णु का भी जुड़ा है स्वरूप

लिंगराज मंदिर की सबसे खास धार्मिक विशेषताओं में से एक इसका हरिहर स्वरूप है। यहां भगवान शिव को ‘हरिहर’ के रूप में पूजा जाता है, जो शिव और विष्णु की संयुक्त धार्मिक अवधारणा को दर्शाता है।ओडिशा पर्यटन इसे शैव और वैष्णव परंपराओं के समन्वय का महत्वपूर्ण उदाहरण बताता है। यही कारण है कि लिंगराज मंदिर सिर्फ शिव भक्तों के लिए ही नहीं, बल्कि ओडिशा की व्यापक धार्मिक संस्कृति और परंपराओं को समझने वालों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।मंदिर में प्रतिष्ठित शिवलिंग को परंपरा में ‘स्वयंभू’ माना जाता है। ‘स्वयंभू’ का अर्थ ऐसी दिव्य सत्ता से है जिसे मानव द्वारा निर्मित न मानकर स्वयं प्रकट माना जाता है।

180 फीट ऊंचा मंदिर, अद्भुत कलिंग वास्तुकला

लिंगराज मंदिर की भव्यता का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी वास्तुकला है। मंदिर का मुख्य शिखर लगभग 180 फीट ऊंचा बताया जाता है। पत्थरों से निर्मित इस विशाल संरचना में अनुपात, नक्काशी और स्थापत्य संतुलन का अद्भुत मेल दिखाई देता है।कलिंग स्थापत्य की खासियत मंदिर के ऊंचे शिखर, पत्थरों पर की गई कलात्मक नक्काशी और धार्मिक प्रतीकों में दिखाई देती है। ओडिशा के मंदिरों की वास्तुकला कई सदियों में विकसित हुई और इसमें बाहरी दीवारों पर बेहद बारीक मूर्तिकला देखने को मिलती है।लिंगराज मंदिर इसी परंपरा का शानदार उदाहरण है। इसकी दीवारों और संरचना पर बनी आकृतियां उस दौर के कलाकारों की तकनीकी क्षमता और कल्पनाशीलता को दर्शाती हैं।

चार प्रमुख हिस्सों में बना है मंदिर

लिंगराज मंदिर परिसर को मुख्य रूप से चार प्रमुख हिस्सों में समझा जाता है।

1. गर्भगृह:
यह मंदिर का सबसे पवित्र हिस्सा है, जहां मुख्य देवता की पूजा होती है।

2. यज्ञ मंडप:
यह पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा मंडप है।

3. नाट्य मंडप:
नाम के अनुरूप यह धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों और परंपराओं से जुड़ा स्थान रहा है।

4. भोग मंडप:
यहां भगवान को भोग अर्पित करने की परंपरा जुड़ी हुई है।

ओडिशा पर्यटन के अनुसार, पूरे परिसर में करीब 150 छोटे-बड़े सहायक मंदिर भी हैं। यही विशाल मंदिर परिसर लिंगराज मंदिर को केवल एक पूजा स्थल नहीं बल्कि स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत का बड़ा केंद्र बनाता है।

मंदिर परिसर में दिखती है रोजमर्रा की जिंदगी की झलक

लिंगराज मंदिर की नक्काशी केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं है। मंदिर की वास्तुकला में तत्कालीन समाज और रोजमर्रा की गतिविधियों से जुड़ी कलात्मक अभिव्यक्तियां भी दिखाई देती हैं।पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां उस समय के कलाकारों की कल्पना और शिल्प कौशल का प्रमाण मानी जाती हैं। इसी वजह से मंदिर इतिहास, कला और संस्कृति के शोधकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है।

बिंदुसागर झील का क्या है महत्व?

लिंगराज मंदिर के उत्तर में स्थित बिंदुसागर झील मंदिर परिसर के आसपास के धार्मिक वातावरण को और विशेष बनाती है। ओडिशा पर्यटन के अनुसार, यह झील लगभग 1300 फीट लंबी और 700 फीट चौड़ी है तथा पुराने भुवनेश्वर क्षेत्र की धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रही है।बिंदुसागर के पश्चिमी किनारे पर एकाम्र वन स्थित है। इसका नाम भुवनेश्वर के प्राचीन धार्मिक संदर्भ ‘एकाम्र वन’ से जुड़ा है। यहां पारंपरिक रूप से धार्मिक और औषधीय महत्व वाले पौधों को संरक्षित किया गया है।

महाशिवरात्रि पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

लिंगराज मंदिर में महाशिवरात्रि प्रमुख त्योहारों में शामिल है। इस दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ओडिशा पर्यटन के अनुसार, महाशिवरात्रि आम तौर पर फरवरी या मार्च में पड़ती है और मंदिर से जुड़ा यह पर्व बड़े स्तर पर मनाया जाता है।इसके अलावा रुकुना रथ यात्रा भी मंदिर की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है। यह यात्रा अशोकाष्टमी के अवसर पर आयोजित होती है। इस दौरान भगवान लिंगराज के प्रतिनिधि स्वरूप चंद्रशेखर की रथ यात्रा निकाली जाती है। इसकी खास पहचान यह है कि रथ को वापस लौटते समय सामान्य अर्थों में यू-टर्न नहीं लेना पड़ता, इसी कारण इसे ‘रुकुना रथ’ की परंपरा से जोड़ा जाता है।

मंदिर में प्रवेश को लेकर क्या हैं नियम?

लिंगराज मंदिर की धार्मिक परंपराओं के कारण गैर-हिंदुओं को मंदिर के अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं है। हालांकि मंदिर परिसर को बाहर से देखने के लिए पर्यटकों के लिए एक विशेष ऊंचा प्लेटफॉर्म बनाया गया है। वहां से मंदिर परिसर का दृश्य देखा जा सकता है।ओडिशा पर्यटन की जानकारी के मुताबिक मंदिर के भीतर कैमरा और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट ले जाने की अनुमति नहीं है। इसलिए यात्रा पर जाने वाले लोगों को स्थानीय नियमों का सम्मान करना चाहिए।

कैसे पहुंचें लिंगराज मंदिर?

लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर में स्थित है। भुवनेश्वर हवाई और रेल मार्ग से देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। ओडिशा पर्यटन के अनुसार, मंदिर तक शहर की बस, ऑटो रिक्शा और कैब जैसे स्थानीय परिवहन साधनों से पहुंचा जा सकता है।मंदिर के आसपास घूमने पर पर्यटक भुवनेश्वर के कई अन्य प्राचीन मंदिरों को भी देख सकते हैं। इनमें मुक्तेश्वर मंदिर, राजारानी मंदिर, परशुरामेश्वर मंदिर और अनंत वासुदेव मंदिर प्रमुख हैं।

लिंगराज मंदिर क्यों है खास?

लिंगराज मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी प्राचीनता नहीं है। यह मंदिर धर्म, इतिहास, कला, वास्तुकला और ओडिया संस्कृति के संगम का प्रतिनिधित्व करता है। एक ओर यहां भगवान शिव की आराधना की प्राचीन परंपरा दिखाई देती है, तो दूसरी ओर हरिहर स्वरूप के माध्यम से शैव और वैष्णव परंपराओं के समन्वय की झलक मिलती है।भव्य शिखर, विशाल परिसर, लगभग 150 सहायक मंदिर, पत्थरों पर बारीक नक्काशी, बिंदुसागर झील और सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं लिंगराज मंदिर को भुवनेश्वर की पहचान का अभिन्न हिस्सा बनाती हैं।लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर केवल भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि ओडिशा की हजारों वर्षों में विकसित होती धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है। कलिंग स्थापत्य की भव्यता और हरिहर परंपरा इसे भारत के विशिष्ट मंदिरों में अलग पहचान देती है। भुवनेश्वर आने वाले श्रद्धालुओं और इतिहास-वास्तुकला में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए लिंगराज मंदिर एक ऐसा स्थान है, जहां आस्था के साथ-साथ भारत की प्राचीन स्थापत्य प्रतिभा को भी करीब से समझा जा सकता है।

!!ॐ लिंगराजाय हरिहराय नमः!!

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