मेरठ नीला ड्रम केस: मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा

Editorial
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मेरठ उत्तर प्रदेश के मेरठ में चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाई है। दोनों को मर्चेंट नेवी से जुड़े सौरभ राजपूत की हत्या और साक्ष्य मिटाने के मामले में पहले ही दोषी ठहराया जा चुका था। बुधवार 14 अक्टूबर  को जिला अदालत ने सजा के बिंदु पर सुनवाई के बाद दोनों को मृत्युदंड दिया। इस फैसले के साथ ही मार्च 2025 में सामने आए इस सनसनीखेज मामले में एक अहम न्यायिक पड़ाव पूरा हुआ है।मृत्युदंड पर कानून के तहत आगे की न्यायिक प्रक्रिया भी लागू होगी।यह मामला उस समय देशभर में चर्चा में आया था, जब सौरभ राजपूत का शव एक नीले प्लास्टिक के ड्रम से बरामद हुआ। जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर पुलिस ने सौरभ की पत्नी मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार किया था। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य और गवाहों के बयान अदालत के सामने रखे। अदालत ने दोनों को दोषी करार देने के बाद सजा सुनाने के लिए 14 अक्टूबर की तारीख तय की थी।

 मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा
मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा

सजा से पहले बेटियों से मिलने की इच्छा

मामले में एक भावनात्मक पहलू मुस्कान की बेटियों से जुड़ा है। सजा सुनाए जाने से पहले मुस्कान ने अपनी बड़ी बेटी पीहू से मिलने और उससे फोन पर बात कराने की इच्छा जताई थी। जेल प्रशासन को उसका पता या संपर्क नंबर उपलब्ध नहीं होने के कारण मुलाकात कराने में परेशानी की बात भी रिपोर्ट की गई। बाद में मुस्कान को अपनी बेटी के नाम पत्र लिखने के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध कराए जाने का उल्लेख सामने आया।बेटियों के भविष्य को लेकर मुस्कान की चिंता का जिक्र भी खबरों में हुआ है। अदालत में उसने ठीक यही शब्द कहे कि “मेरी बच्चियों का ध्यान रखना”—इस कथन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं मिली है। इसलिए इस वाक्य को अदालत में कही गई प्रमाणित बात के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।इस मामले में दो बच्चियों का भविष्य भी चर्चा का विषय बन गया है। किसी भी आपराधिक मामले में दोषियों के बच्चों की देखभाल और उनके सुरक्षित भविष्य का सवाल अलग महत्व रखता है। बच्चों को अपने माता-पिता के कथित या साबित अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।

मार्च 2025 में सामने आया था मामला

सौरभ राजपूत हत्याकांड मार्च 2025 का है।  सौरभ की हत्या 4 मार्च के आसपास की गई थी। जांच में सामने आया कि हत्या के बाद शव को छिपाने के लिए नीले प्लास्टिक के ड्रम का इस्तेमाल किया गया और उसमें सीमेंट भरा गया। 17 मार्च 2025 को ड्रम से दुर्गंध आने के बाद मामला सामने आया और पुलिस ने जांच शुरू की।इस घटना ने लोगों को झकझोर दिया था। शुरुआती जांच के बाद मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने मामले में साक्ष्य जुटाए और आरोपपत्र दाखिल किया। इसके बाद मुकदमे की सुनवाई अदालत में चली।अदालत में किसी गंभीर आपराधिक मामले का फैसला केवल जनभावनाओं के आधार पर नहीं होता, बल्कि अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों, गवाहों तथा पेश किए गए साक्ष्यों को देखकर किया जाता है। सौरभ राजपूत मामले में भी लंबी सुनवाई के बाद दोषसिद्धि और फिर सजा पर निर्णय आया।

22 गवाहों और लंबी सुनवाई के बाद फैसला

मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से 22 गवाह पेश किए गए। सुनवाई 100 से अधिक तारीखों तक चली और मामले में परिस्थितिजन्य, चिकित्सकीय तथा फॉरेंसिक साक्ष्यों पर विचार किया गया। 30 सितंबर 2026 को अदालत ने मुस्कान और साहिल को हत्या तथा साक्ष्य मिटाने के मामले में दोषी ठहराया था। इसके बाद सजा की मात्रा पर सुनवाई के लिए 14 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की गई।अभियोजन पक्ष ने दोनों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी। सौरभ के परिवार की ओर से भी कठोरतम सजा की मांग किए जाने की खबरें सामने आई थीं। परिवार के लिए यह मामला लंबे इंतजार और न्याय की उम्मीद से जुड़ा रहा।14 अक्टूबर को अदालत ने दोनों को मौत की सजा सुनाई। यह फैसला मामले की सुनवाई में महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन भारतीय कानून के तहत सत्र अदालत द्वारा दिया गया मृत्युदंड उच्च न्यायालय की पुष्टि के अधीन होता है। इसके बाद कानून के मुताबिक अपील और अन्य न्यायिक विकल्पों की प्रक्रिया भी हो सकती है।

सौरभ के परिवार को फैसले से मिली अहम राहत

सौरभ राजपूत की हत्या के बाद से उनका परिवार न्याय की मांग कर रहा था। अदालत के फैसले के बाद मामले में दोषियों को कठोरतम सजा दिए जाने की मांग पर निर्णय आ गया है। परिवार के लिए यह एक अहम घटनाक्रम है, क्योंकि मुकदमे की सुनवाई और सजा के इंतजार में लंबा समय लगा। मृत्युदंड सुनाए जाने और उसके अंतिम रूप से लागू होने में कानूनी अंतर है। दोषियों को कानून के तहत उपलब्ध अपील का अधिकार रहता है और उच्च न्यायालय को मृत्युदंड की पुष्टि करनी होती है। इसलिए इस फैसले को अदालत की ओर से सुनाई गई सजा के रूप में ही समझना चाहिए, न कि यह मान लेना चाहिए कि सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं।

नीला ड्रम केस फिर चर्चा में

सौरभ राजपूत हत्याकांड को आमतौर पर ‘नीला ड्रम केस’ के नाम से जाना गया। शव को ड्रम में छिपाए जाने के कारण इस मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। लेकिन मामले का मूल केंद्र सौरभ की हत्या, उसके बाद साक्ष्य छिपाने के प्रयास और अदालत में पेश किए गए प्रमाण रहे।यह फैसला बताता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में जांच, गवाहों की गवाही और न्यायिक सुनवाई की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। साथ ही, किसी भी मामले की रिपोर्टिंग में तथ्यों, आरोपों और अदालत के निष्कर्षों को अलग-अलग स्पष्ट करना जरूरी है। मेरठ की अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में मृत्युदंड सुनाया है। अब इस फैसले के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया पर निगाह रहेगी। सौरभ के परिवार के लिए यह न्याय की लड़ाई का अहम पड़ाव है, जबकि मुस्कान की बेटियों के भविष्य और देखभाल का सवाल भी संवेदनशील सामाजिक पहलू बना हुआ है।

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