रिपोर्ट:दीपचंद्र दीक्षित
फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले की मॉडल ग्राम पंचायत गुतासी से सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। यहां संचालित आंगनबाड़ी केंद्र में कथित तौर पर ऐसी लापरवाही हुई, जिसने पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया। आरोप है कि आंगनबाड़ी कार्यकत्री और सहायिका तीन वर्षीय मासूम बच्चे को कमरे के अंदर बंद छोड़कर केंद्र से चली गईं, जबकि मासूम काफी देर तक कमरे में अकेला बंद होकर रोता और चीखता रहा। यदि समय रहते स्थानीय लोगों की नजर उस पर नहीं पड़ती, तो कोई बड़ा हादसा भी हो सकता था।
घटना के सामने आने के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन कर्मचारियों पर है, वही यदि इस तरह की लापरवाही करें तो सरकारी योजनाओं पर लोगों का विश्वास कैसे कायम रहेगा। ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
रोने की आवाज ने खोली लापरवाही की पोल
स्थानीय लोगों के अनुसार, घटना उस समय सामने आई जब पास स्थित एक कार्यालय से बाहर निकले एक व्यक्ति को आंगनबाड़ी केंद्र के भीतर से लगातार किसी बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। पहले तो उन्होंने सामान्य बात समझी, लेकिन जब आवाज लगातार आती रही तो उन्हें संदेह हुआ।उन्होंने आंगनबाड़ी केंद्र के पास जाकर देखा तो कमरा बंद था और अंदर से मासूम बच्चे के रोने की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। आसपास देखने पर न तो कोई कार्यकत्री दिखाई दी और न ही सहायिका। इसके बाद स्थानीय लोगों की मदद से कमरे का दरवाजा खोला गया और तीन वर्षीय मासूम को बाहर निकाला गया।
कमरे में अकेला बंद था मासूम
ग्रामीणों का कहना है कि बच्चा काफी देर तक कमरे में अकेला बंद रहा। वह डरा-सहमा लगातार रो रहा था। बाहर निकलने के बाद भी वह भयभीत नजर आया। घटना के बाद गांव में यह चर्चा का विषय बन गई कि आखिर बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी निभाने वाली आंगनबाड़ी कर्मी केंद्र छोड़कर कहां चली गई थीं।लोगों का कहना है कि यदि बच्चे की तबीयत बिगड़ जाती या किसी अन्य कारण से कोई अप्रिय घटना हो जाती, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता।

ग्रामीण बोले— पहले भी हो चुकी है ऐसी लापरवाही
गांव के कई लोगों ने आरोप लगाया कि यह पहली घटना नहीं है। उनके मुताबिक आंगनबाड़ी केंद्र पर पहले भी कई बार लापरवाही की शिकायतें सामने आ चुकी हैं। कभी समय पर केंद्र नहीं खुलता, तो कभी बच्चों की उचित देखभाल नहीं होती।ग्रामीणों का कहना है कि कई बार संबंधित अधिकारियों को इस संबंध में मौखिक और लिखित शिकायतें दी गईं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यही वजह है कि कर्मचारियों की कार्यशैली में सुधार नहीं आया।
सीडीपीओ से संपर्क का प्रयास, नहीं मिला जवाब
शिकायतकर्ता का आरोप है कि घटना की जानकारी देने के लिए उन्होंने बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं किया गया।ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पहले भी कई शिकायतें जिला स्तर तक भेजी थीं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इससे कर्मचारियों के हौसले बुलंद हैं और लापरवाही लगातार जारी है।
बच्चों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
आंगनबाड़ी केंद्र छोटे बच्चों की शिक्षा, पोषण और सुरक्षा के लिए संचालित किए जाते हैं। यहां आने वाले अधिकांश बच्चे तीन से छह वर्ष की आयु के होते हैं और वे पूरी तरह कर्मचारियों की देखरेख पर निर्भर रहते हैं।ऐसे में किसी मासूम को कमरे में बंद छोड़ देना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा के प्रति गंभीर उदासीनता माना जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते बच्चे को बाहर नहीं निकाला जाता तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी।
ग्रामीणों में आक्रोश, कार्रवाई की मांग
घटना के बाद ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखने को मिली। लोगों ने कहा कि बच्चों के भविष्य और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।ग्रामीणों ने मांग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी कार्यकत्री और सहायिका के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
सरकारी व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
यह घटना सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। सरकार आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन यदि जमीनी स्तर पर इस प्रकार की लापरवाही होती है तो योजनाओं का उद्देश्य प्रभावित होता है।स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल कागजी निरीक्षण से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। नियमित मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय किए बिना ऐसे मामलों पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा।
जांच और कार्रवाई की मांग तेज
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और यदि आरोप सही पाए जाएं तो संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाए। साथ ही आंगनबाड़ी केंद्रों की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए ताकि भविष्य में किसी मासूम की जान खतरे में न पड़े।फिलहाल यह मामला पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोग प्रशासन की कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं। यदि जांच में लापरवाही की पुष्टि होती है, तो यह केवल एक कर्मचारी की गलती नहीं बल्कि बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक का मामला माना जाएगा।
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