
उत्तर प्रदेश राज्य में लगातार चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों और महिला सशक्तिकरण की योजनाओं का जमीन पर एक बड़ा और सकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में बाल विवाह के मामलों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों गवाही दे रहे हैं कि अब अभिभावक बेटियों की कम उम्र में शादी करने के बजाय उनकी पढ़ाई-लिखाई पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। यूपी में अब लड़कियों के बाल विवाह का ग्राफ 2.1 प्रतिशत अंकों की गिरावट के साथ महज 13.7 फीसदी पर सिमट गया है, जो कि 20.1 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से भी काफी बेहतर है। गौर करने वाली बात है कि साल 2015-16 में यूपी में यह आंकड़ा 21.1 फीसदी था। सिर्फ लड़कियां ही नहीं, बल्कि 21 वर्ष से पहले विवाह के बंधन में बंधने वाले पुरुषों का ग्राफ भी 23 फीसदी से घटकर अब 19.5 फीसदी पर आ गया है। इस बड़े सुधार के बावजूद बुंदेलखंड और तराई के कुछ जिलों में स्थिति अब भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। बाल विवाह के मामले में ललितपुर जिला अभी भी पूरे प्रदेश में टॉप पर बना हुआ है। हालांकि, यहां पहले के 42 फीसदी के मुकाबले मामूली सुधार हुआ है और अब यह आंकड़ा 40 फीसदी पर आ गया है। इसी तरह बलरामपुर में बाल विवाह की दर 37.2 फीसदी से घटकर 35 फीसदी और गोंडा में 24.5 फीसदी से घटकर 20 फीसदी पर आ गई है। इस मामले में सबसे बेहतरीन सुधार श्रावस्ती जिले में देखने को मिला है, जहां बाल विवाह का आंकड़ा 34.2 फीसदी से सीधे लुढ़ककर 24 फीसदी पर आ गया है। सिद्धार्थनगर, श्रावस्ती और ललितपुर जैसे चंद जिलों को छोड़ दें, तो राज्य के बाकी हिस्सों में अब बाल विवाह के मामले न के बराबर रह गए हैं।

इस उत्साहजनक रिपोर्ट के बीच एक ऐसा विरोधाभासी और बेहद डराने वाला पहलू भी सामने आया है, जिसने सरकार और स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ जहां बाल विवाह के आंकड़े तेजी से कम हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ कम उम्र में लड़कियों के मां बनने (किशोरी गर्भावस्था) के मामलों में अचानक उछाल आ गया है। पिछले सर्वे (NFHS-5) में 15 से 19 वर्ष की लड़कियों में गर्भावस्था की दर घटकर 2.9 फीसदी पर आ गई थी, जो इस नए सर्वे (NFHS-6) में दोबारा बढ़कर 3.5 फीसदी हो गई है। पूर्व महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य डॉ. बद्री विशाल के अनुसार, गांवों में शिक्षा और चिकित्सा सुविधाएं बढ़ने से बाल विवाह तो थमा है, लेकिन कम उम्र में मां बनने के बढ़ते आंकड़ों को रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग को नए सिरे से रणनीति बनाकर काम करना होगा। साफ है कि सूबे में अभी भी लड़कियों की सुरक्षा, स्कूल ड्रॉप-आउट को रोकने और स्वास्थ्य जागरूकता पर विशेष फोकस बनाए रखने की सख्त जरूरत है।
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