नई दिल्ली कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के प्रस्तावित ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ मार्च से ठीक पहले सियासत में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस के पूर्व नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल का साल 2011 का एक पुराना वीडियो साझा कर राहुल गांधी और विपक्ष पर निशाना साधा है। वीडियो में सिब्बल कहते नजर आ रहे हैं कि नागरिकों को विरोध प्रदर्शन का अधिकार जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे अपनी पसंद की किसी भी जगह पर प्रदर्शन कर सकते हैं या सड़क और यातायात बाधित कर सकते हैं।रिजिजू ने इसी बयान को आधार बनाकर कांग्रेस की मौजूदा प्रदर्शन रणनीति पर सवाल उठाए हैं। उनका निशाना राहुल गांधी हैं, जो वोट चोरी और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर सरकार के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने पुराने नेताओं के बयानों के कारण राजनीतिक असहजता में फंस गई है? और क्या 1 नवंबर की प्रस्तावित महारैली से पहले यह विवाद विपक्ष की रणनीति को कमजोर कर सकता है?
- कपिल सिब्बल के पुराने वीडियो से रिजिजू का हमला
- सिब्बल ने भी दिया जवाब, रिजिजू पर किया पलटवार
- प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन क्या कहीं भी प्रदर्शन किया जा सकता है?
- 1 नवंबर की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ महारैली पर सबकी नजर
- दिल्ली के व्यापारियों को कारोबार प्रभावित होने की चिंता
- क्या पुराने बयान से कांग्रेस की रणनीति पर पड़ेगा असर?

कपिल सिब्बल के पुराने वीडियो से रिजिजू का हमला
किरेन रिजिजू ने 30 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर कपिल सिब्बल का एक पुराना वीडियो साझा किया। यह वीडियो उस समय का बताया जा रहा है, जब सिब्बल केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार में कानून मंत्री थे। वीडियो में वह प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन की बात करते दिखाई देते हैं।सिब्बल का कहना था कि नागरिकों को विरोध करने का अधिकार है, लेकिन किसी भी मनचाही जगह पर प्रदर्शन करना संवैधानिक या मौलिक अधिकार नहीं है। यदि प्रदर्शन के कारण सड़कें बंद होती हैं, यातायात रुकता है या आम लोगों को अपने काम पर जाने में परेशानी होती है, तो प्रशासन को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाने पड़ सकते हैं। उन्होंने प्रदर्शन के लिए स्थान और व्यवस्था तय करने में पुलिस प्रशासन की भूमिका का भी उल्लेख किया था।रिजिजू ने इसी बयान को लेकर विपक्ष पर तंज कसा और सवाल उठाया कि क्या राहुल गांधी अपने कानूनी गुरु कपिल सिब्बल की बात मानेंगे? सरकार की ओर से इस वीडियो को विपक्ष के मौजूदा विरोध प्रदर्शन पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

सिब्बल ने भी दिया जवाब, रिजिजू पर किया पलटवार
इस विवाद में कपिल सिब्बल की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। 30 अक्टूबर को उन्होंने रिजिजू के पुराने वीडियो साझा करने पर पलटवार किया। सिब्बल ने तत्कालीन यूपीए सरकार और मौजूदा सरकार के दौर में विरोध प्रदर्शनों के प्रति रवैये की तुलना करते हुए सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि उस समय प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन या लाठीचार्ज का इस्तेमाल नहीं किया गया था।इस जवाब के बाद विवाद केवल पुराने बयान तक सीमित नहीं रहा। अब बहस इस बात पर भी पहुंच गई है कि विरोध प्रदर्शन के अधिकार की व्याख्या किस संदर्भ में की जानी चाहिए और सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कितनी छूट मिलनी चाहिए।यानी रिजिजू ने जहां सिब्बल के पुराने बयान से कांग्रेस को घेरने की कोशिश की, वहीं सिब्बल ने भी अपने जवाब के जरिए सरकार पर निशाना साध दिया। इससे साफ है कि यह मुद्दा केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहने वाला।
प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन क्या कहीं भी प्रदर्शन किया जा सकता है?
इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन इन अधिकारों पर सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और दूसरे नागरिकों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए उचित कानूनी प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।इसका मतलब है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन प्रदर्शन के दौरान यातायात, सार्वजनिक सेवाओं और आम लोगों की आवाजाही का ध्यान रखना भी जरूरी है। प्रदर्शन के लिए स्थान, अनुमति और व्यवस्था से जुड़े नियमों का पालन करना पड़ सकता है।यही वह कानूनी और राजनीतिक बिंदु है, जिसे लेकर भाजपा कांग्रेस को घेर रही है। हालांकि, किसी विशेष प्रदर्शन पर रोक या प्रशासनिक कार्रवाई उचित है या नहीं, इसका फैसला परिस्थितियों और लागू कानूनों के आधार पर ही किया जा सकता है। केवल किसी पुराने बयान के आधार पर मौजूदा प्रदर्शन को गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।
1 नवंबर की ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ महारैली पर सबकी नजर
अब इस विवाद का सीधा संबंध 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित INDIA गठबंधन की महारैली से जुड़ गया है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस आयोजन के जरिए वोट चोरी, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की भूमिका जैसे मुद्दों को उठाने की तैयारी में हैं। राहुल गांधी पहले भी चुनावी प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सवाल उठा चुके हैं।विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ियों को लेकर गंभीर सवाल हैं। कांग्रेस इस मुद्दे को जन आंदोलन का रूप देने की कोशिश कर रही है। वहीं, भाजपा और केंद्र सरकार विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक अभियान बताकर जवाब दे रहे हैं।रैली को लेकर कांग्रेस नेताओं की ओर से करीब 10 लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के दिल्ली पहुंचने की संभावना को देखते हुए यातायात और सुरक्षा व्यवस्था भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है।
दिल्ली के व्यापारियों को कारोबार प्रभावित होने की चिंता
महारैली को लेकर दिल्ली के व्यापारियों ने भी चिंता जताई है। चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने राहुल गांधी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से रैली की तारीख आगे बढ़ाने की अपील की है। व्यापारियों का कहना है कि दीपावली के आसपास बाजारों में खरीदारी का दबाव रहता है और बड़ी रैली के कारण यातायात बाधित होने से कारोबार प्रभावित हो सकता है।CTI ने अनुमान जताया है कि रैली में करीब 10 लाख लोगों के शामिल होने और 15 हजार से 20 हजार बसों के आने की संभावना है। संगठन ने दिल्ली के प्रमुख बाजारों में कारोबार पर असर पड़ने की आशंका जताते हुए लगभग 10 हजार से 12 हजार करोड़ रुपये के संभावित कारोबार पर जोखिम की बात कही है। यह व्यापारियों के संगठन का अनुमान है, किसी वास्तविक नुकसान का आंकड़ा नहीं।व्यापारियों ने रैली को दीपावली के बाद आयोजित करने या आयोजन स्थल बदलने का सुझाव भी दिया है। हालांकि, राहुल गांधी की ओर से रैली आगे बढ़ाने की मांग स्वीकार नहीं किए जाने की खबरें सामने आई हैं। अब इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रदर्शन और व्यापारिक गतिविधियों के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है।
क्या पुराने बयान से कांग्रेस की रणनीति पर पड़ेगा असर?
कपिल सिब्बल के पुराने वीडियो ने कांग्रेस के सामने एक असहज राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा किया है। भाजपा इसे विपक्ष के दोहरे रवैये के रूप में पेश कर रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस और विपक्ष का तर्क है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र में नागरिकों और राजनीतिक दलों का अधिकार है।यहां एक बात महत्वपूर्ण है कि कपिल सिब्बल अब कांग्रेस में नहीं हैं और उनका 2011 का बयान उस समय की परिस्थितियों में दिया गया था। इसलिए उसे आज की राजनीतिक परिस्थितियों पर सीधे लागू करना भी उचित नहीं होगा। लेकिन पुराने बयान को सामने लाकर भाजपा ने कांग्रेस की मौजूदा रणनीति पर राजनीतिक बहस जरूर तेज कर दी है।अब निगाहें 1 नवंबर की महारैली पर टिकी हैं। क्या विपक्ष बड़ी संख्या में लोगों को जुटाकर अपने चुनावी आरोपों को राष्ट्रीय मुद्दा बना पाएगा? क्या दिल्ली में यातायात और बाजारों की व्यवस्था प्रभावित हुए बिना प्रदर्शन हो सकेगा? और क्या राहुल गांधी इस पूरे विवाद पर कोई स्पष्ट जवाब देंगे?फिलहाल कपिल सिब्बल का पुराना वीडियो कांग्रेस के लिए नया सियासी सिरदर्द बन गया है। रिजिजू के हमले के बाद सिब्बल ने भी जवाब दे दिया है। ऐसे में 1 नवंबर का प्रदर्शन केवल वोट चोरी के आरोपों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि विपक्ष अपने विरोध के अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है और आम लोगों के हितों का कितना ध्यान रखता है।राजनीति में विरोध का अधिकार जितना अहम है, उतनी ही अहम है उसकी मर्यादा और सार्वजनिक जिम्मेदारी। अब देखना होगा कि इस सियासी टकराव में कांग्रेस अपनी बात कितनी मजबूती से रख पाती है।
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