
बिहार के गया जिले के ब्राह्मणी घाट की संकरी गलियों से निकलकर एक युवा ने ऐसा मुकाम हासिल किया है, जिसने पूरे जिले ही नहीं बल्कि पूरे बिहार को गौरवान्वित कर दिया है। साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले शुभम कुमार ने जेईई मेन में 100 पर्सेंटाइल हासिल करने के बाद जेईई एडवांस्ड 2026 में भी शानदार प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। हार्डवेयर दुकानदार के बेटे की यह उपलब्धि आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है। यह कहानी केवल एक परीक्षा में सफलता की नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण, अनुशासन और माता-पिता के त्याग की मिसाल है। गया के ब्राह्मणी घाट निवासी शुभम कुमार बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रहे हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा शहर के एक निजी विद्यालय में हुई। स्कूल के दिनों से ही उनका सपना इंजीनियर बनने का था। दसवीं कक्षा के बाद उन्होंने अपने लक्ष्य को स्पष्ट कर लिया और उसी दिशा में पूरी मेहनत के साथ आगे बढ़ना शुरू कर दिया। जहां कई छात्र कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव में अपना आत्मविश्वास खो देते हैं, वहीं शुभम ने हर चुनौती को अवसर में बदलते हुए सफलता की सीढ़ियां चढ़ीं। अपने सपने को साकार करने के लिए शुभम ने दो वर्षों तक राजस्थान के कोटा में रहकर जेईई की तैयारी की। उन्होंने दिन-रात एक कर दिया। उनकी दिनचर्या में प्रतिदिन 10 से 12 घंटे की पढ़ाई शामिल थी, जबकि परीक्षा के करीब आने पर यह समय 14 घंटे तक पहुंच जाता था। कठिन विषयों को समझने के लिए उन्होंने लगातार अभ्यास किया, टेस्ट दिए और शिक्षकों से मार्गदर्शन लिया। शुभम का मानना है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। नियमित मेहनत, समय का सही प्रबंधन और अनुशासन ही किसी भी बड़े लक्ष्य तक पहुंचने का सबसे प्रभावी रास्ता है।
इस सफलता के पीछे उनके माता-पिता का त्याग और संघर्ष भी कम नहीं है। शुभम के पिता शिव कुमार गया के रमना रोड स्थित एक छोटी हार्डवेयर दुकान चलाते हैं, जबकि उनकी मां कंचन देवी गृहिणी हैं। सीमित आय और साधारण जीवन के बावजूद माता-पिता ने बेटे की पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं आने दी। कोटा में पढ़ाई का खर्च उठाना परिवार के लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हर मुश्किल को मुस्कुराकर स्वीकार किया ताकि बेटे के सपनों पर कोई असर न पड़े। शुभम कहते हैं कि अगर उनके माता-पिता का विश्वास और समर्थन नहीं होता तो शायद यह सफलता हासिल करना संभव नहीं था। जैसे ही जेईई एडवांस्ड का परिणाम घोषित हुआ, ब्राह्मणी घाट मोहल्ले में खुशी की लहर दौड़ गई। शुभम के घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया। रिश्तेदारों, पड़ोसियों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों के लोगों ने परिवार को शुभकामनाएं दीं। पूरे इलाके में मिठाइयां बांटी गईं और लोगों ने इसे केवल शुभम की नहीं, बल्कि पूरे गया और बिहार की उपलब्धि बताया। हर कोई इस होनहार छात्र की सफलता पर गर्व महसूस कर रहा है। शुभम की कहानी उन हजारों छात्रों के लिए उम्मीद की नई किरण है, जो छोटे शहरों और सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखते हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि सफलता के लिए बड़े शहर, महंगे स्कूल या विशेष सुविधाएं जरूरी नहीं हैं। अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत ईमानदार हो और परिवार का साथ मिले, तो कोई भी छात्र अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है।आज शुभम कुमार केवल एक सफल छात्र नहीं हैं, बल्कि बिहार के युवाओं के लिए प्रेरणा, संघर्ष और सफलता का जीवंत उदाहरण बन चुके हैं। उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि सपने चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों, उन्हें पूरा करने का रास्ता मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास से होकर ही गुजरता है।
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