Toxic Movie Review: यश की फिल्म ने किया निराश, कहानी गायब

Editorial
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साउथ सुपरस्टार यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक’ आखिरकार 26 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। ‘KGF: Chapter 2’ के बाद यश की वापसी को लेकर दर्शकों में जबरदस्त उत्साह था। फिल्म के ट्रेलर में दमदार एक्शन, शानदार विजुअल्स, बड़े सेट और यश का स्वैग देखकर उम्मीद थी कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ा धमाका करेगी। हालांकि, फिल्म देखने के बाद कहानी और स्क्रीनप्ले को लेकर निराशा हाथ लगती है।फिल्म को गीतू मोहनदास ने निर्देशित किया है। इसमें यश के साथ नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, रुक्मिणी वसंत, तारा सुतारिया और अक्षय ओबेरॉय जैसे कलाकार नजर आते हैं। फिल्म को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका विजुअल ट्रीटमेंट भले ही शानदार है, लेकिन कहानी दर्शकों को लंबे समय तक बांधकर रखने में कामयाब नहीं होती।

चार साल बाद यश की वापसी, लेकिन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी ‘टॉक्सिक’

यश की पिछली बड़ी रिलीज ‘KGF: Chapter 2’ थी। इसके बाद अभिनेता की अगली फिल्म का दर्शकों को करीब चार साल तक इंतजार करना पड़ा। इस लंबे इंतजार ने ‘टॉक्सिक’ से उम्मीदें काफी बढ़ा दी थीं।फिल्म के प्रचार और ट्रेलर ने भी दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बंदूकें, एक्शन, ग्लैमर, सर्कस और यश का दमदार लुक फिल्म को बड़े स्तर की सिनेमाई पेशकश के तौर पर पेश करता है। लेकिन थिएटर में फिल्म देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि इतने बड़े विजुअल कैनवास के पीछे कहानी आखिर कहां है?

गोवा की पृष्ठभूमि में अपराध और रिश्तों की कहानी

‘टॉक्सिक’ की कहानी 1940 से 1970 के दशक के गोवा की पृष्ठभूमि में बुनी गई है। फिल्म अपराध, स्मगलिंग, सत्ता, परिवार और रिश्तों की दुनिया को सामने लाने की कोशिश करती है।यश फिल्म में राया का किरदार निभा रहे हैं। कहानी में उनके परिवार और खासतौर पर बहन गंगा के साथ रिश्ते को भी अहम स्थान दिया गया है। इसके अलावा नादिया के किरदार में कियारा आडवाणी नजर आती हैं। हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत और अक्षय ओबेरॉय भी कहानी का हिस्सा हैं।कहानी में पिता-पुत्र का रिश्ता, भाई-बहन का भावनात्मक जुड़ाव, प्यार, धोखा, अपराध और सत्ता जैसे कई पहलू शामिल हैं। समस्या यह है कि इतने सारे ट्रैक एक साथ होने के बावजूद फिल्म किसी एक भावनात्मक कहानी को मजबूती से स्थापित नहीं कर पाती।

यश का स्वैग शानदार, लेकिन किरदार कमजोर

यश फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका लुक, स्क्रीन प्रेजेंस, एक्शन और स्टाइल उनके प्रशंसकों को जरूर पसंद आ सकता है। फिल्म में उन्हें अलग-अलग अंदाज में देखने का मौका मिलता है।लेकिन किरदार के स्तर पर समस्या दिखाई देती है। कभी वह बेहद आक्रामक नजर आते हैं तो अगले ही पल भावुक या रोमांटिक अंदाज में दिखाई देते हैं। फिल्म इन बदलावों के पीछे की भावनाओं को पर्याप्त समय नहीं देती।नतीजा यह होता है कि दर्शक यश की स्टार पावर को तो महसूस करता है, लेकिन उनके किरदार से भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाता।

नयनतारा और कियारा के किरदारों को नहीं मिला पर्याप्त विस्तार

नयनतारा जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्री की मौजूदगी के बावजूद उनका किरदार कहानी को वह भावनात्मक गहराई नहीं दे पाता जिसकी उम्मीद की जा सकती थी। उनके और यश के बीच भाई-बहन के रिश्ते को ज्यादा प्रभावी ढंग से दिखाया जा सकता था।वहीं कियारा आडवाणी का किरदार फिल्म में ग्लैमर और स्टाइल से भरपूर है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी है, लेकिन उनके किरदार को पर्याप्त गहराई नहीं मिलती।हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत जैसे कलाकार भी फिल्म में मौजूद हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले कई जगह उनके किरदारों की संभावनाओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाता।

निर्देशन में भव्यता, लेकिन कहानी पर पकड़ कमजोर

निर्देशक गीतू मोहनदास ने फिल्म को बड़े स्तर पर बनाने की कोशिश की है। गोवा की पृष्ठभूमि, सर्कस का सेटअप, शानदार लोकेशन, बड़े सेट और एक्शन सीक्वेंस फिल्म को भव्य बनाते हैं।फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसकी मजबूत कड़ियों में शामिल है। कई फ्रेम देखने में बेहद आकर्षक हैं। VFX और प्रोडक्शन डिजाइन भी फिल्म के बड़े कैनवास को मजबूत करते हैं।लेकिन केवल खूबसूरत फ्रेम किसी फिल्म को यादगार नहीं बनाते। ‘टॉक्सिक’ में यही समस्या नजर आती है। कई बार ऐसा लगता है कि फिल्म कहानी आगे बढ़ाने के बजाय दर्शकों को लगातार विजुअल ट्रीट देने में व्यस्त है।

कमजोर स्क्रीनप्ले ने बिगाड़ा खेल

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी राइटिंग और स्क्रीनप्ले है। कहानी में कई संभावनाएं थीं, लेकिन उन्हें सही तरीके से विकसित नहीं किया गया।एक के बाद एक घटनाएं आती रहती हैं, लेकिन किरदार ऐसा क्यों कर रहे हैं और उनके फैसलों के पीछे की भावना क्या है, इसे समझने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता।तीन घंटे से अधिक लंबी फिल्म होने के बावजूद कहानी कई जगह बिखरी हुई महसूस होती है। एडिटिंग भी फिल्म की गति को बेहतर बनाने के बजाय कई बार उलझन बढ़ाती है।

एक्शन और म्यूजिक में दम

अगर फिल्म का कोई हिस्सा यश के फैंस को सबसे ज्यादा आकर्षित कर सकता है तो वह है इसका एक्शन। बड़े स्तर पर फिल्माए गए एक्शन सीक्वेंस और यश का अंदाज थिएटर में तालियां और सीटियां बटोर सकता है।हालांकि, कुछ जगह एक्शन कहानी का हिस्सा बनने के बजाय केवल तमाशा नजर आता है।रवि बसरूर का संगीत फिल्म के मूड को ऊर्जावान बनाए रखता है, लेकिन कई जगह बैकग्राउंड म्यूजिक जरूरत से ज्यादा तेज महसूस होता है।

तकनीकी पक्ष फिल्म की सबसे बड़ी ताकत

‘टॉक्सिक’ का तकनीकी पक्ष काफी मजबूत है। राजीव रवि की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को बड़े पर्दे पर शानदार बनाती है। गोवा की दुनिया, सर्कस, एक्शन सीक्वेंस और यश के क्लोजअप प्रभाव पैदा करते हैं।फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइन और VFX भी इसके बड़े स्केल को दर्शाते हैं। यही वजह है कि फिल्म कई दृश्यों में आंखों को प्रभावित करती है, भले ही कहानी उतना असर नहीं छोड़ पाती।

Toxic Movie Review: देखें या नहीं?

अगर आप यश के जबरदस्त फैन हैं और बड़े पर्दे पर एक्शन, स्वैग, ग्लैमर और शानदार विजुअल्स देखना चाहते हैं तो ‘टॉक्सिक’ आपको कुछ हद तक पसंद आ सकती है। फिल्म में यश की स्क्रीन प्रेजेंस और कई एक्शन सीक्वेंस आकर्षित करते हैं।लेकिन अगर आप मजबूत कहानी, दमदार स्क्रीनप्ले और गहरे भावनात्मक किरदारों वाली फिल्म की उम्मीद लेकर जा रहे हैं तो निराशा हो सकती है।‘टॉक्सिक’ देखने में भव्य जरूर है, लेकिन इसकी कमजोर कहानी, बिखरा स्क्रीनप्ले और लंबी अवधि फिल्म की सबसे बड़ी कमियां बन जाती हैं। चार साल के लंबे इंतजार के बाद यश की वापसी से जिस स्तर की उम्मीद थी, फिल्म उस पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।

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