प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंडोनेशिया दौरे के दौरान दिया गया एक बयान सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ बातचीत के दौरान 26 जनवरी और 17 तारीख को जोड़ते हुए ‘8’ नंबर का जिक्र किया।मोदी ने कहा कि भारत का गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मनाया जाता है। अगर 2 और 6 को जोड़ा जाए तो योग 8 आता है। वहीं, राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो का जन्मदिन 17 अक्टूबर को आता है, जिसमें 1 और 7 जोड़ने पर भी योग 8 आता है। प्रधानमंत्री ने इसी समानता को मजाकिया अंदाज में “same same” कहते हुए दोनों देशों के रिश्तों से जोड़ दिया।इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर एक वर्ग ने प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाना शुरू कर दिया। कुछ यूजर्स ने इसे अजीब तर्क बताते हुए सवाल उठाए और कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऐसी बातें करने का क्या मतलब है। कई लोगों ने इसे लेकर मीम्स और टिप्पणियां भी कीं।
- लेकिन पूरी तस्वीर जानना भी जरूरी है, सिर्फ वायरल क्लिप से नहीं समझ आता संदर्भ
- डिप्लोमेसी में सिर्फ गंभीर मुद्दे नहीं, मानवीय जुड़ाव भी होता है अहम
- ट्रोलिंग की संस्कृति पर भी उठे सवाल, क्या हर बात को विवाद बनाना सही है?
- ‘डार्क ह्यूमर’ बनाम सकारात्मक हास्य, बदलती सोच पर भी चर्चा
- बयान से ज्यादा जरूरी है उसका संदर्भ समझना
लेकिन पूरी तस्वीर जानना भी जरूरी है, सिर्फ वायरल क्लिप से नहीं समझ आता संदर्भ
हालांकि इस पूरे मामले को सिर्फ कुछ सेकंड के वायरल वीडियो के आधार पर समझना अधूरा हो सकता है। दरअसल, राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो पहले भी कई मौकों पर बता चुके हैं कि नंबर 8 उनके लिए बेहद खास है।प्रबोवो इंडोनेशिया के आठवें राष्ट्रपति हैं और वह कई बार अपने जीवन में नंबर 8 के महत्व का जिक्र कर चुके हैं। उनके अनुसार यह अंक उनके लिए शुभ और भाग्यशाली रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसी व्यक्तिगत पसंद और सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में बातचीत की।कूटनीतिक मुलाकातों में नेताओं के बीच ऐसी सहज बातचीत अक्सर देखने को मिलती है। कई बार नेता किसी देश, संस्कृति या व्यक्ति की पसंद से जुड़ी छोटी-छोटी बातों को बातचीत का हिस्सा बनाकर माहौल को दोस्ताना बनाने की कोशिश करते हैं।
डिप्लोमेसी में सिर्फ गंभीर मुद्दे नहीं, मानवीय जुड़ाव भी होता है अहम
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं की बातचीत हमेशा केवल आर्थिक समझौते, सुरक्षा और रणनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहती। कई बार व्यक्तिगत अनुभव, संस्कृति, परंपरा और हल्के-फुल्के संवाद भी देशों के रिश्तों को मजबूत करने का माध्यम बनते हैं।प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान भी इसी तरह के एक दोस्ताना संवाद के रूप में देखा जा सकता है। इसका उद्देश्य कोई वैज्ञानिक सिद्धांत स्थापित करना नहीं था, बल्कि राष्ट्रपति प्रबोवो की पसंद और उनके विश्वास से जुड़ी बात को मजाकिया अंदाज में सामने रखना था।
ट्रोलिंग की संस्कृति पर भी उठे सवाल, क्या हर बात को विवाद बनाना सही है?
इस घटना ने सोशल मीडिया की एक बड़ी समस्या को भी सामने ला दिया है। आज के दौर में कई बार कोई भी बयान बिना पूरे संदर्भ के वायरल हो जाता है और लोग तुरंत अपनी प्रतिक्रिया देने लगते हैं।राजनीतिक पसंद और विचारधारा अलग-अलग हो सकती है, लेकिन किसी भी बयान पर प्रतिक्रिया देने से पहले उसके पीछे का संदर्भ समझना जरूरी होता है। आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन अधूरी जानकारी के आधार पर किसी व्यक्ति या घटना का मजाक उड़ाना कई बार गलत धारणा पैदा कर सकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया के दौर में सूचना की गति बहुत तेज हो गई है, लेकिन सत्यापन की आदत कमजोर पड़ती जा रही है। यही वजह है कि कई बार सामान्य बातचीत भी विवाद का रूप ले लेती है।

‘डार्क ह्यूमर’ बनाम सकारात्मक हास्य, बदलती सोच पर भी चर्चा
इस पूरे मामले के बाद इंटरनेट पर हास्य के बदलते स्वरूप को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। आज सोशल मीडिया पर डार्क ह्यूमर और विवादित कंटेंट को काफी लोकप्रियता मिलती है। कई बार आपत्तिजनक भाषा और अश्लील मजाक को भी मनोरंजन के नाम पर स्वीकार कर लिया जाता है।वहीं साधारण शब्दों का खेल, सांस्कृतिक संदर्भ या हल्का-फुल्का मजाक कई लोगों को पसंद नहीं आता। सवाल यह है कि क्या मनोरंजन की परिभाषा इतनी बदल गई है कि सामान्य और सकारात्मक हास्य भी लोगों को असहज लगने लगा है?
बयान से ज्यादा जरूरी है उसका संदर्भ समझना
प्रधानमंत्री मोदी का ‘8 नंबर’ वाला बयान सोशल मीडिया पर भले ही विवाद का विषय बना हो, लेकिन पूरे संदर्भ को देखने पर यह एक दोस्ताना बातचीत का हिस्सा नजर आता है। राष्ट्रपति प्रबोवो के नंबर 8 के प्रति विश्वास को ध्यान में रखते हुए किया गया यह शब्दों का खेल था, न कि कोई तर्क या दावा।लोकतंत्र में सवाल पूछना और आलोचना करना जरूरी है, लेकिन किसी भी मुद्दे पर राय बनाने से पहले पूरी जानकारी हासिल करना उससे भी ज्यादा जरूरी है। वायरल क्लिप के दौर में सच और भ्रम के बीच अंतर करना ही सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
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