लखनऊ उत्तर प्रदेश भाजपा ने आखिरकार लंबे इंतजार के बाद अपनी नई प्रदेश कार्यकारिणी का ऐलान कर दिया। करीब छह महीने तक चली बैठकों, मंथन और दिल्ली-लखनऊ के बीच कई दौर की चर्चाओं के बाद घोषित हुई इस टीम ने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। पार्टी ने जहां 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए नए चेहरों, जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय संतुलन को साधने की कोशिश की है, वहीं कई ऐसे फैसले भी लिए गए हैं जो राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गए हैं। नई टीम को देखकर साफ संकेत मिलते हैं कि भाजपा ने चुनावी रणनीति के तहत ‘संतुलन, समझौता और संदेश’—तीनों पर एक साथ काम करने की कोशिश की है। हालांकि यह प्रयोग हर स्तर पर सफल होता नहीं दिख रहा।
- पुराने दिग्गजों की छुट्टी, नए चेहरों को मिली बड़ी जिम्मेदारी
- दलबदलुओं पर मेहरबानी, पार्टी बदलने वालों को मिला बड़ा इनाम
- 2027 चुनाव के लिए साधा जातीय समीकरण, लेकिन दिखा असंतुलन
- ब्राह्मणों को कम, भूमिहारों को ज्यादा प्रतिनिधित्व
- महिलाओं को भी नहीं मिली पूरी भागीदारी
- लखनऊ और बाराबंकी को मिली विशेष अहमियत
- उपेंद्र रावत की वापसी बनी सबसे बड़ा सरप्राइज
- संदेश साफ—2027 की तैयारी शुरू
- अब इस टीम पर होगी 2027 की अग्निपरीक्षा
पुराने दिग्गजों की छुट्टी, नए चेहरों को मिली बड़ी जिम्मेदारी
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने अपनी पहली टीम में वर्षों से संगठन के अहम पदों पर काबिज कई नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया है। पार्टी ने आधे से अधिक पुराने चेहरों को बदलकर संगठन में नई ऊर्जा भरने का संदेश देने की कोशिश की है।सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि विधान परिषद सदस्य विजय बहादुर पाठक और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे एवं नोएडा विधायक पंकज सिंह को नई टीम में जगह नहीं मिली। हालांकि पंकज सिंह की जगह उनके छोटे भाई नीरज सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाकर यह भी संकेत दे दिया गया कि संगठन में बड़े नेताओं का प्रभाव अब भी बरकरार है।
दलबदलुओं पर मेहरबानी, पार्टी बदलने वालों को मिला बड़ा इनाम
नई कार्यकारिणी का सबसे चर्चित पहलू उन नेताओं को अहम जिम्मेदारी देना रहा, जो दूसरे दलों से भाजपा में आए थे।2022 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीतने वाली पूजा पाल को भाजपा ने प्रदेश उपाध्यक्ष बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। माना जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में मतदान करने का उन्हें राजनीतिक इनाम मिला है।वहीं भाजपा के हिंदुत्व चेहरे माने जाने वाले पूर्व मंत्री सुरेश राणा की भी लंबे समय बाद संगठन में दमदार वापसी हुई है। उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। राजनीतिक हलकों में इसे पश्चिम बंगाल चुनाव में संगठन के लिए किए गए कार्य का पुरस्कार माना जा रहा है।

2027 चुनाव के लिए साधा जातीय समीकरण, लेकिन दिखा असंतुलन
भाजपा ने पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित वर्ग को संगठन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देकर अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति अपनाई है। साथ ही अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है।लेकिन नई टीम पर नजर डालने से कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जातीय प्रतिनिधित्व में संतुलन पूरी तरह नहीं बन पाया है।
ब्राह्मणों को कम, भूमिहारों को ज्यादा प्रतिनिधित्व
नई 48 सदस्यीय प्रदेश टीम में ब्राह्मण नेताओं की हिस्सेदारी उनकी आबादी के अनुपात में कम मानी जा रही है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है, जबकि भूमिहार और त्यागी समुदाय की आबादी लगभग एक प्रतिशत के आसपास है।इसके बावजूद नई टीम में चार भूमिहार नेताओं को प्रमुख जिम्मेदारी दी गई है। इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है कि क्या संगठन ने सामाजिक समीकरणों से ज्यादा प्रभावशाली नेताओं की पसंद को प्राथमिकता दी है।
महिलाओं को भी नहीं मिली पूरी भागीदारी
भाजपा लंबे समय से महिलाओं को संगठन में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की बात करती रही है। लेकिन नई कार्यकारिणी इस कसौटी पर भी पूरी तरह खरी नहीं उतरती।48 सदस्यीय टीम में केवल 12 महिलाओं को जगह मिली है, जबकि 33 प्रतिशत हिस्सेदारी के हिसाब से कम से कम 16 महिलाओं को संगठन में स्थान मिलना चाहिए था। इससे महिला प्रतिनिधित्व को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
लखनऊ और बाराबंकी को मिली विशेष अहमियत
नई टीम में क्षेत्रीय संतुलन साधने का प्रयास भी पूरी तरह सफल नहीं माना जा रहा। लखनऊ और बाराबंकी जैसे जिलों को एक से अधिक पदाधिकारी मिले हैं, जबकि कई जिले पूरी तरह प्रतिनिधित्व से वंचित रह गए।बाराबंकी से प्रियंका रावत को प्रदेश उपाध्यक्ष, उपेंद्र रावत को प्रदेश महामंत्री और अवधेश श्रीवास्तव को प्रदेश मंत्री बनाया गया है। एक ही जिले से तीन बड़े पद मिलने पर राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि संगठन में संतुलन से ज्यादा प्रभावशाली नेताओं के बीच सामंजस्य को महत्व दिया गया।
उपेंद्र रावत की वापसी बनी सबसे बड़ा सरप्राइज
नई टीम में सबसे चौंकाने वाला नाम पूर्व सांसद उपेंद्र रावत का रहा। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले एक विवादित वीडियो वायरल होने के बाद उनका टिकट काट दिया गया था। हालांकि बाद में फोरेंसिक जांच में वीडियो में उनकी आवाज की पुष्टि नहीं हुई।अब उन्हें प्रदेश महामंत्री बनाकर भाजपा ने साफ संकेत दिया है कि संगठन उनके प्रति भरोसा बरकरार रखे हुए है। इसे पार्टी के भीतर उनकी मजबूत पकड़ और शीर्ष नेतृत्व के विश्वास के रूप में देखा जा रहा है।
संदेश साफ—2027 की तैयारी शुरू
नई कार्यकारिणी को सिर्फ संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीतिक टीम माना जा रहा है। भाजपा ने नए चेहरों को मौका देकर कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने, दलबदलुओं को सम्मान देकर राजनीतिक संदेश देने और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है।हालांकि कई फैसले ऐसे भी हैं, जिन पर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह सवाल उठ रहे हैं। जातीय प्रतिनिधित्व, महिला भागीदारी, दिग्गज नेताओं की विदाई और विवादित चेहरों की वापसी आने वाले दिनों में भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है।
अब इस टीम पर होगी 2027 की अग्निपरीक्षा
भाजपा ने अपनी नई प्रदेश कार्यकारिणी के जरिए साफ कर दिया है कि अब उसका पूरा फोकस 2027 विधानसभा चुनाव पर है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि नई टीम में लिए गए कई फैसले राजनीतिक बहस का विषय बन चुके हैं।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संतुलन, समझौते और नए चेहरों के इस फार्मूले के सहारे भाजपा 2027 का चुनावी किला फतह कर पाएगी, या फिर यही फैसले चुनाव से पहले पार्टी के लिए नई चुनौतियां खड़ी करेंगे। आने वाले महीनों में इसका जवाब प्रदेश की राजनीति तय करेगी।
or advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

