लखनऊ उत्तर प्रदेश में किराए के मकानों और दुकानों में रहने वाले किराएदारों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक अहम फैसला सामने आया है। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किराएदारी विनियमन अधिनियम-2021 की पांच महत्वपूर्ण धाराओं को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद मकान मालिक केवल 2021 के कानून का हवाला देकर किराया मनमाने तरीके से नहीं बढ़ा सकेंगे। साथ ही पुराने किराएदारों के मामले में किराया वृद्धि और किराएदारी से जुड़े विवादों को लेकर अब पुरानी कानूनी व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाएगी।हाईकोर्ट ने धारा 8, 9, 10, 38 और 42 को असंवैधानिक करार दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने इंद्र भूषण साहनी व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुनाया।
- हाईकोर्ट के फैसले से क्या बदलेगा?
- 2021 के एक्ट में 5 और 7 प्रतिशत की व्यवस्था
- 1972 का कानून फिर आएगा काम
- रेंट अथॉरिटी की भूमिका पर भी असर
- क्या पुराने किराएदारों को अब मकान से नहीं निकाला जा सकेगा?
- केंद्र और राज्य दोनों बना सकते हैं किराएदारी कानून
- मकान मालिक और किराएदार दोनों के लिए क्या मायने?
- किराएदार इन बातों का रखें ध्यान
- फैसले का व्यापक असर
हाईकोर्ट के फैसले से क्या बदलेगा?
फैसले का सबसे बड़ा असर मकान मालिकों और किराएदारों के बीच किराया बढ़ाने को लेकर पड़ सकता है। 2021 के अधिनियम में किराया संशोधन के लिए अलग प्रावधान किया गया था। अब धारा-9 के असंवैधानिक घोषित होने के बाद मकान मालिक इस धारा को आधार बनाकर किराए में एकतरफा बढ़ोतरी नहीं कर सकेंगे।यानी यदि किसी पुराने आवासीय मकान का किराया 5,000 रुपये प्रतिमाह है तो केवल 2021 के कानून के आधार पर उसे मनमाने ढंग से 7,000 या 10,000 रुपये करने का आधार नहीं रहेगा। किराया बढ़ाने या तय करने के मामले में अब लागू कानूनी व्यवस्था, किराएदारी समझौते और संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा।

2021 के एक्ट में 5 और 7 प्रतिशत की व्यवस्था
उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किराएदारी विनियमन अधिनियम-2021 में पुराने किराएदारों के लिए किराया संशोधन का प्रावधान था। आवासीय परिसर के किराए में 5 प्रतिशत और गैर-आवासीय परिसर यानी दुकानों आदि के किराए में 7 प्रतिशत वार्षिक संशोधन की व्यवस्था की गई थी।अब धारा-9 के रद्द होने के बाद 2021 के एक्ट के आधार पर इस तरह की स्वचालित वार्षिक बढ़ोतरी का सहारा नहीं लिया जा सकेगा।उदाहरण के तौर पर अगर किसी दुकान का किराया 10,000 रुपये प्रतिमाह है तो केवल 2021 के कानून का हवाला देकर हर साल 7 प्रतिशत की वृद्धि करना अब वैधानिक आधार नहीं होगा। किराया वृद्धि के लिए संबंधित किराएदारी समझौते और लागू पुराने कानून की व्यवस्था को देखना होगा।
1972 का कानून फिर आएगा काम
हाईकोर्ट के फैसले के बाद 2021 के कानून की जिन धाराओं को असंवैधानिक घोषित किया गया है, उनसे पैदा हुई कानूनी रिक्तता को भरने के लिए उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराए पर देने, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 की संबंधित व्यवस्था प्रभावी होगी।इसका मतलब यह नहीं है कि सभी किराएदारों के लिए किराया एक निश्चित प्रतिशत पर तय हो जाएगा। किराया तय करने के दौरान कई परिस्थितियों को ध्यान में रखा जा सकता है। इनमें किराएदारी कब शुरू हुई, पहले से कितना किराया तय था, भवन की स्थिति और संबंधित कानूनी प्रावधान जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं।इसलिए पुराने किराएदारों को यह समझना जरूरी है कि हाईकोर्ट के फैसले का अर्थ किराया पूरी तरह फ्रीज हो जाना नहीं है, बल्कि 2021 के कानून की रद्द की गई धाराओं के आधार पर मनमानी बढ़ोतरी का रास्ता बंद होना है।
रेंट अथॉरिटी की भूमिका पर भी असर
2021 के एक्ट की धारा-10 के तहत किराए से जुड़े विवादों में रेंट अथॉरिटी को किराया निर्धारित करने की शक्ति दी गई थी। इस धारा के असंवैधानिक घोषित होने के बाद किराया विवादों को पुराने लागू कानून और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार देखा जाएगा।इससे मकान मालिक और किराएदार दोनों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे अपने किराएदारी दस्तावेज, पुराने समझौते और भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।
क्या पुराने किराएदारों को अब मकान से नहीं निकाला जा सकेगा?
हाईकोर्ट के फैसले को इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि अब किसी किराएदार को मकान से निकाला ही नहीं जा सकता। बेदखली के मामलों में लागू कानून और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन मामलों में किराया विधिवत निर्धारित हो चुका है या जिन किराएदारी समझौतों पर अमल हो चुका है, वे केवल हाईकोर्ट के इस फैसले के कारण अपने आप खत्म नहीं होंगे।यानी पहले से लागू वैध समझौतों और तय किराए के मामलों को केवल इस फैसले के आधार पर स्वतः समाप्त नहीं माना जाएगा।
केंद्र और राज्य दोनों बना सकते हैं किराएदारी कानून
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में किराएदारी को समवर्ती सूची का विषय माना है। इसका अर्थ है कि किराएदारी से जुड़े मामलों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।हालांकि अगर राज्य का कानून पहले से लागू केंद्रीय कानून से टकराता है तो संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता हो सकती है। हाईकोर्ट ने पाया कि उत्तर प्रदेश के 2021 के कानून को इस तरह की संवैधानिक मंजूरी प्राप्त नहीं थी। इसी आधार पर संबंधित प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया गया।
मकान मालिक और किराएदार दोनों के लिए क्या मायने?
इस फैसले के बाद किराएदारों को राहत इसलिए मिल सकती है क्योंकि 2021 के कानून में निर्धारित प्रतिशत को आधार बनाकर किराए में एकतरफा वृद्धि करने का विकल्प अब उपलब्ध नहीं रहेगा। खासतौर पर लंबे समय से किराए पर रह रहे लोगों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण हो सकता है।वहीं मकान मालिकों के लिए इसका मतलब यह नहीं है कि वे किराया कभी नहीं बढ़ा सकते। किराया वृद्धि के लिए किराएदारी समझौते, लागू कानून और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
किराएदार इन बातों का रखें ध्यान
हाईकोर्ट के फैसले के बाद किराएदारों को अपने पुराने दस्तावेज संभालकर रखने चाहिए। किराया समझौता, किराए की रसीद, बैंक ट्रांजेक्शन और मकान मालिक के साथ हुई लिखित बातचीत भविष्य में विवाद की स्थिति में महत्वपूर्ण हो सकती है।अगर मकान मालिक केवल 2021 के एक्ट का हवाला देकर किराए में बड़ी वृद्धि की मांग करता है, तो किराएदार को किसी योग्य कानूनी विशेषज्ञ से सलाह लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। बिना कानूनी जानकारी के किराया रोकना या विवाद बढ़ाना भी उचित नहीं होगा।
फैसले का व्यापक असर
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में चल रही किराएदारी व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर पुराने मकानों, दुकानों और लंबे समय से चली आ रही किराएदारियों में किराया वृद्धि को लेकर अब 1972 के कानून की प्रासंगिकता बढ़ेगी।हालांकि किसी विशेष मकान या दुकान पर कितना किराया लागू होगा, यह केवल इस फैसले के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित किराएदारी की तारीख, समझौते की शर्तें, पहले से तय किराया और लागू कानूनी प्रावधानों को देखना होगा।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किराएदारी विनियमन अधिनियम-2021 की पांच धाराओं को असंवैधानिक घोषित कर किराएदारी कानून में महत्वपूर्ण बदलाव का रास्ता साफ किया है। धारा 8, 9, 10, 38 और 42 के रद्द होने से 2021 के कानून के आधार पर मनमाना किराया बढ़ाने और कुछ किराया विवादों में रेंट अथॉरिटी की भूमिका से जुड़े प्रावधान प्रभावित हुए हैं।अब संबंधित मामलों में 1972 के पुराने कानून की व्यवस्था लागू होगी। हालांकि, पहले से तय वैध किराएदारी समझौते केवल इस फैसले के कारण स्वतः समाप्त नहीं होंगे। इसलिए मकान मालिक और किराएदार दोनों को अपने अधिकारों और दायित्वों को समझते हुए आगे की कार्रवाई करनी चाहिए।
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