
लखनऊ के डालीबाग इलाके से सामने आया घटनाक्रम प्रदेश की राजनीति, प्रशासनिक दावों और सरकारी परियोजनाओं को लेकर एक नई बहस छेड़ गया है। जिस परियोजना को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ड्रीम प्रोजेक्ट के तौर पर प्रचारित किया गया, जिस योजना को माफिया राज के अंत और सुशासन की मिसाल बताया गया, उसी परियोजना पर अब अवैध निर्माण का सवाल खड़ा हो गया है। मामला तब और ज्यादा गंभीर हो गया जब सिंचाई विभाग ने परियोजना परिसर में नोटिस चस्पा कर निर्माण को अपनी जमीन पर किया गया अतिक्रमण बताया और कार्रवाई की चेतावनी दे डाली। इसके बाद बृहस्पतिवार को जब विभागीय टीम मौके पर पहुंची तो वहां तनावपूर्ण स्थिति बन गई और स्थानीय लोगों के साथ अधिकारियों की तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली। डालीबाग स्थित यह आवासीय परियोजना पिछले कई महीनों से चर्चा का विषय रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह वही जमीन बताई जाती है, जिसे कभी माफिया मुख्तार अंसारी के कब्जे से मुक्त कराया गया था। प्रदेश सरकार ने इसे कानून के राज और माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रतीक बताते हुए व्यापक प्रचार किया था। बाद में इसी जमीन पर लखनऊ विकास प्राधिकरण ने सरदार वल्लभभाई पटेल आवासीय योजना विकसित की। इस योजना में बनाए गए फ्लैटों को सरकार की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया गया और मुख्यमंत्री ने स्वयं आवंटियों को आवंटन पत्र वितरित किए थे। लेकिन अब इस पूरी कहानी में ऐसा मोड़ आया है जिसने प्रशासनिक तंत्र के भीतर समन्वय और भूमि स्वामित्व के दावों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सिंचाई विभाग का कहना है कि जिस जमीन पर यह निर्माण हुआ है, वह उसकी संपत्ति है और वहां बिना अनुमति निर्माण किया गया है। विभाग की ओर से लगाए गए नोटिस में स्पष्ट रूप से निर्माण को अवैध बताया गया है। यदि यह दावा सही साबित होता है तो करोड़ों रुपये की लागत से बनी पूरी योजना कानूनी विवाद में फंस सकती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, नोटिस लगाए जाने के बाद पूरे क्षेत्र में हलचल मच गई। जिन लोगों को इस योजना के तहत आवंटन मिला है, उनमें भी चिंता बढ़ गई है। कई आवंटी लंबे समय से अपने घर का इंतजार कर रहे हैं। कुछ परिवारों ने तो गृह प्रवेश की तैयारी तक कर ली थी, लेकिन अभी तक उन्हें पूर्ण रूप से कब्जा नहीं मिल सका है। अब अवैध निर्माण का विवाद सामने आने के बाद उनकी चिंता और बढ़ गई है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि जमीन वास्तव में सिंचाई विभाग की थी तो निर्माण कार्य शुरू होने से पहले यह विवाद क्यों नहीं सामने आया? परियोजना के लिए नक्शे, स्वीकृतियां, तकनीकी अनुमतियां और विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी की गई थीं। ऐसे में अब निर्माण पूरा होने के बाद विभागों के बीच भूमि स्वामित्व को लेकर टकराव कई सवाल पैदा कर रहा है।

बृहस्पतिवार को जब सिंचाई विभाग की टीम मौके पर पहुंची तो माहौल अचानक गर्म हो गया। विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी और संभावित कार्रवाई की खबर फैलते ही स्थानीय लोगों की भीड़ जमा हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अधिकारियों और स्थानीय लोगों के बीच तीखी बहस हुई। कुछ लोगों ने कार्रवाई का विरोध किया, जबकि विभागीय अधिकारी अपने दावे पर अड़े रहे। स्थिति कुछ समय के लिए तनावपूर्ण बनी रही, हालांकि बाद में मामला शांत कराया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ा दी है। क्योंकि यह परियोजना केवल एक आवासीय योजना नहीं, बल्कि सरकार के उस अभियान का प्रतीक मानी जाती रही है जिसमें माफियाओं से कब्जा मुक्त कराई गई जमीन पर जनहित के कार्यों को बढ़ावा देने का दावा किया गया था। ऐसे में अब यदि इसी परियोजना पर अवैध निर्माण का सवाल उठ रहा है तो विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिल सकता है। विशेष बात यह भी है कि लगभग छह महीने पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं इस योजना के लाभार्थियों को आवंटन पत्र वितरित किए थे। उस कार्यक्रम को सुशासन और माफिया मुक्त उत्तर प्रदेश की मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लाभार्थियों को गृह प्रवेश से जुड़ी सामग्री भी उपलब्ध कराई गई थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि आवंटी अपने घरों में प्रवेश तक नहीं कर पाए हैं और अब पूरी योजना पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
सिंचाई विभाग का पक्ष
“निर्माण को लेकर विभागीय स्तर पर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। संबंधित भूमि पर विभाग अपना दावा कर रहा है और नियमानुसार कार्रवाई की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।”
यह बयान विवाद की गंभीरता को और बढ़ाता है, क्योंकि इससे साफ संकेत मिलता है कि विभाग इस मामले को केवल औपचारिक आपत्ति तक सीमित नहीं मान रहा, बल्कि आगे भी कार्रवाई की संभावना बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों और आवंटियों का कहना है कि यदि सरकारी विभागों के बीच किसी प्रकार का भूमि विवाद था तो उसका समाधान निर्माण शुरू होने से पहले किया जाना चाहिए था। अब जब परियोजना तैयार हो चुकी है और लोगों को आवंटन भी मिल चुका है, तब इस तरह के विवाद से आम नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
फिलहाल पूरे मामले पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर सच क्या है? क्या वास्तव में परियोजना विवादित भूमि पर बनाई गई है, या फिर यह विभागों के बीच अधिकार क्षेत्र का मामला है? आने वाले दिनों में प्रशासन और सरकार की ओर से जो भी निर्णय लिया जाएगा, वह न केवल इस परियोजना का भविष्य तय करेगा बल्कि यह भी बताएगा कि सरकारी विभागों के बीच समन्वय और जवाबदेही की वास्तविक स्थिति क्या है। फिलहाल डालीबाग की यह परियोजना एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में है और इसके भविष्य को लेकर सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं।
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