वाराणसी देश के सबसे संवेदनशील धार्मिक और कानूनी विवादों में शामिल ज्ञानवापी प्रकरण में समाधान की दिशा में उठाया गया पहला बड़ा कदम शुरुआती दौर में ही अटक गया। सुप्रीम कोर्ट की पहल पर लोक अदालत के माध्यम से विवाद सुलझाने की कोशिश मंगलवार को वाराणसी जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर में हुई, लेकिन दोनों पक्षों ने साफ शब्दों में मध्यस्थता से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप पहली बैठक किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचे बिना समाप्त हो गई और अब एक बार फिर मामला पूरी तरह अदालत की चौखट पर लौटता दिखाई दे रहा है।0मंगलवार को जिला न्यायालय के मनोरंजन कक्ष में आयोजित बैठक में हिंदू और मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधि मौजूद रहे। शुरुआती बातचीत के दौरान ही यह स्पष्ट हो गया कि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। यही वजह रही कि मध्यस्थता की पहल पहले ही चरण में असफल साबित हुई।
हिंदू पक्ष का स्पष्ट रुख—’ज्ञानवापी हमारी है, समझौते का सवाल ही नहीं’
बैठक के बाद हिंदू पक्ष के प्रतिनिधियों ने दो टूक कहा कि ज्ञानवापी परिसर पर उनका दावा पूर्ण रूप से कायम है और वे किसी भी प्रकार की मध्यस्थता या समझौते के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि यह केवल किसी संपत्ति का विवाद नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और धार्मिक अधिकारों का विषय है।ज्ञानवापी मामले की प्रमुख वादिनी लक्ष्मी देवी ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिंदू पक्ष किसी “बीच के रास्ते” की तलाश में नहीं है। उनका कहना है कि उपलब्ध साक्ष्य और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर पूरे ज्ञानवापी परिसर पर मंदिर का अधिकार मिलना चाहिए। ऐसे में मध्यस्थता का कोई औचित्य नहीं बनता।हिंदू पक्ष का मानना है कि जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है और वे अपने दावों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत कर चुके हैं, तो समझौते के बजाय न्यायिक निर्णय ही अंतिम रास्ता होना चाहिए।

मुस्लिम पक्ष भी अडिग—’कानूनी लड़ाई जारी रहेगी’
दूसरी ओर अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी और मुस्लिम पक्ष ने भी मध्यस्थता के प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कमेटी के सचिव एस.एम. यासीन ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वे शांतिपूर्ण समाधान का सम्मान करते हैं, लेकिन ज्ञानवापी जैसा संवेदनशील और संवैधानिक विवाद लोक अदालत के माध्यम से नहीं सुलझाया जा सकता।मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह मामला केवल धार्मिक भावनाओं का नहीं, बल्कि मालिकाना हक, संवैधानिक अधिकारों और पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे मामलों का निर्णय केवल सक्षम न्यायालय ही कर सकता है।उन्होंने दोहराया कि वे किसी भी परिस्थिति में अपना दावा नहीं छोड़ेंगे और पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत में अपनी बात रखते रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट की पहल को शुरुआती झटका
ज्ञानवापी विवाद वर्षों से विभिन्न अदालतों में विचाराधीन है। लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सौहार्दपूर्ण समाधान की संभावना तलाशने के उद्देश्य से लोक अदालत के माध्यम से मध्यस्थता का सुझाव दिया था।इसी पहल के तहत वाराणसी जिला एवं सत्र न्यायालय में पहली बैठक आयोजित की गई थी। उम्मीद जताई जा रही थी कि बातचीत की शुरुआत भविष्य में किसी सकारात्मक दिशा का रास्ता खोल सकती है, लेकिन पहले ही दौर में दोनों पक्षों के कड़े रुख के कारण यह संभावना फिलहाल धूमिल होती नजर आई।
अब अदालत में ही होगी अगली लड़ाई
मध्यस्थता की पहली कोशिश विफल होने के बाद अब यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि ज्ञानवापी विवाद का समाधान फिलहाल केवल न्यायिक प्रक्रिया के जरिए ही आगे बढ़ेगा।दोनों पक्षों ने संकेत दे दिए हैं कि वे अपने-अपने दावों पर कायम रहेंगे और अदालत में कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। ऐसे में आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई और न्यायालय के आदेशों पर पूरे देश की नजर बनी रहेगी।
देशभर की निगाहें वाराणसी पर
ज्ञानवापी विवाद केवल वाराणसी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे चर्चित धार्मिक और संवैधानिक मामलों में से एक माना जाता है। हर सुनवाई और हर न्यायिक प्रक्रिया पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती रही है। यही कारण है कि मंगलवार की मध्यस्थता बैठक को भी बेहद अहम माना जा रहा था।हालांकि पहली कोशिश सफल नहीं हो सकी, लेकिन यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि दोनों पक्ष अपने-अपने कानूनी अधिकारों और दावों को लेकर पूरी मजबूती से खड़े हैं। अब आगे की दिशा न्यायालय की कार्यवाही और भविष्य में आने वाले आदेश तय करेंगे।
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