“10 साल में 7वां प्रधानमंत्री! लेबर पार्टी में बगावत के बाद बदलेगा UK का चेहरा”

Editorial
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ब्रिटेन की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। लेबर पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष, चुनावी झटकों और नेतृत्व पर उठते सवालों के बीच प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने पद छोड़ने का फैसला कर लिया है। इस फैसले के साथ ही ब्रिटेन एक बार फिर नए प्रधानमंत्री की तलाश में जुट गया है। खास बात यह है कि अगर नया नेता चुना जाता है तो ब्रिटेन पिछले एक दशक में अपना सातवां प्रधानमंत्री देखेगा। 2024 के आम चुनाव में लेबर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाने वाले स्टार्मर कभी बदलाव और स्थिरता की उम्मीद माने जा रहे थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद बढ़ती महंगाई, आर्थिक दबाव और पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष ने उनके नेतृत्व को कटघरे में खड़ा कर दिया। आखिरकार पार्टी के सांसदों और वरिष्ठ नेताओं का दबाव इतना बढ़ गया कि स्टार्मर को पद छोड़ने का एलान करना पड़ा।

क्यों घिर गए स्टार्मर?

स्टार्मर के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा स्थानीय चुनावों में मिली करारी हार बनी। इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड में हुए स्थानीय चुनावों में लेबर पार्टी को कई महत्वपूर्ण सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। दूसरी ओर नाइजल फराज की रिफॉर्म यूके पार्टी तेजी से उभरकर सामने आई। लेबर सांसदों को डर सताने लगा कि उनका पारंपरिक श्रमिक वर्ग का वोट बैंक खिसक रहा है। पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हुई कि स्टार्मर रिफॉर्म यूके की बढ़ती लोकप्रियता का प्रभावी जवाब देने में नाकाम रहे हैं।

महंगाई और आर्थिक संकट ने बढ़ाई मुश्किलें

जनता को उम्मीद थी कि नई सरकार अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगी, लेकिन महंगाई, आवास संकट और धीमी आर्थिक वृद्धि ने सरकार की लोकप्रियता को नुकसान पहुंचाया। जीवन-यापन की बढ़ती लागत से परेशान लोगों का गुस्सा सीधे सरकार पर फूटा। लेबर पार्टी के कई सांसदों का मानना था कि स्टार्मर बड़े फैसले लेने के बजाय सिर्फ हालात संभालने की कोशिश करते रहे, जिससे जनता का भरोसा कमजोर हुआ।

विवादित फैसलों ने गिराई साख

सरकार को कई नीतियों पर यू-टर्न लेना पड़ा। शीतकालीन ईंधन भत्ते में कटौती और सामाजिक कल्याण से जुड़े फैसलों ने जनता के बीच नाराजगी पैदा की। इसके अलावा अमेरिका में ब्रिटेन के राजदूत के तौर पर पीटर मैंडेलसन की नियुक्ति ने भी विवाद खड़ा कर दिया। इस फैसले को लेकर स्टार्मर की राजनीतिक समझ और निर्णय क्षमता पर सवाल उठाए गए।

कैबिनेट में बगावत, सांसदों का खुला विरोध

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब सरकार के कई बड़े चेहरों ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया। स्वास्थ्य, रक्षा और सुरक्षा से जुड़े वरिष्ठ नेताओं ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए अपने पद छोड़ दिए। बताया जा रहा है कि दर्जनों लेबर सांसद सार्वजनिक और निजी तौर पर स्टार्मर से पद छोड़ने की मांग कर रहे थे। पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की मांग लगातार तेज होती जा रही थी।

एंडी बर्नहैम की एंट्री से बदल गया खेल

राजनीतिक संकट के बीच सबसे बड़ी चुनौती एंडी बर्नहैम के रूप में सामने आई। मेकरफील्ड उपचुनाव में उनकी बड़ी जीत ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। लेबर पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि नाइजल फराज और रिफॉर्म यूके की चुनौती का मुकाबला केवल बर्नहैम ही कर सकते हैं। यही वजह है कि उन्हें प्रधानमंत्री पद की दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

अब आगे क्या होगा?

स्टार्मर के इस्तीफे के बाद लेबर पार्टी नए नेता के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगी। तब तक या तो कोई कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाएगा या फिर नया नेता चुने जाने तक अंतरिम व्यवस्था लागू रहेगी। चूंकि संसद में लेबर पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत है, इसलिए फिलहाल आम चुनाव की जरूरत नहीं पड़ेगी। पार्टी का नया नेता स्वतः ब्रिटेन का अगला प्रधानमंत्री बन जाएगा।

PM की रेस में कौन-कौन?

एंडी बर्नहैम

सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। श्रमिक वर्ग में उनकी अच्छी पकड़ है और पार्टी के भीतर भी उन्हें व्यापक समर्थन मिल रहा है।

वेस स्ट्रीटिंग

पूर्व स्वास्थ्य मंत्री। तेज-तर्रार वक्ता और पार्टी का प्रमुख चेहरा। नेतृत्व की दौड़ में उतरने के संकेत दे चुके हैं।

एंजेला रेनर

लेबर पार्टी के सॉफ्ट-लेफ्ट गुट की लोकप्रिय नेता। सांसदों के एक बड़े वर्ग का समर्थन उनके साथ माना जाता है।

शबाना महमूद

पार्टी की प्रभावशाली नेताओं में गिनी जाती हैं। ब्रिटेन के एशियाई और पाकिस्तानी मूल के वोटरों के बीच उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।

अल कार्न्स

पूर्व सैन्य अधिकारी और मजबूत छवि वाले नेता। हालिया घटनाक्रम के बाद उनका नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल है।

ब्रिटेन की राजनीति फिर चौराहे पर

ब्रिटेन की राजनीति पिछले एक दशक से लगातार अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। प्रधानमंत्री बदलते रहे हैं, लेकिन आर्थिक चुनौतियां और जनता की अपेक्षाएं जस की तस बनी हुई हैं। अब सबकी निगाहें लेबर पार्टी पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, बल्कि यह भी है कि क्या नया नेतृत्व ब्रिटेन को राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक दबाव से बाहर निकाल पाएगा या नहीं।

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