सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल: आरोपियों की पहचान ऑनलाइन उजागर करने पर रोक की मांग, केंद्र और सोशल मीडिया कंपनियों को नोटिस

Editorial
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नई दिल्ली  आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उनकी तस्वीरें, वीडियो और पहचान सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम रुख अपनाया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा तथा एक्स को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में पुलिस संगठनों के सोशल मीडिया हैंडल से ऐसे कंटेंट पोस्ट किए जाने पर रोक लगाने की मांग की गई है, जिनसे किसी आरोपी की पहचान सार्वजनिक होती है या उसे अपमानजनक और अमानवीय स्थिति में दिखाया जाता है।यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पुलिस की कार्रवाई से जुड़े फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होते हैं। याचिका में सवाल उठाया गया है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगना और अदालत द्वारा उसे दोषी ठहराया जाना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। ऐसे में मुकदमे के दौरान किसी आरोपी की पहचान या उसकी गरिमा को प्रभावित करने वाली तस्वीरें सार्वजनिक किए जाने के क्या मानक होने चाहिए, इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जरूरी हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को जारी किया नोटिस

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मेटा तथा एक्स को नोटिस जारी किया।याचिकाकर्ता हेमेंद्र पटेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत के समक्ष अपनी दलीलें रखीं। याचिका में पुलिस के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर एक समान और स्पष्ट व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

पुलिस सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर उठे सवाल

याचिका में कहा गया है कि पुलिस विभागों के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से कई बार ऐसे फोटो और वीडियो साझा किए जाते हैं, जिनमें आरोपियों का चेहरा या पहचान साफ तौर पर दिखाई देती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसी सामग्री किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी जीवन पर गंभीर असर डाल सकती है।याचिका में राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे अपने पुलिस संगठनों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए उचित गाइडलाइंस तैयार करें। इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी आरोपी की पहचान उजागर करने वाली या उसे अपमानजनक तरीके से प्रस्तुत करने वाली सामग्री को सोशल मीडिया पर पोस्ट न किया जाए।

हथकड़ी और रस्सियों में दिखाने पर भी आपत्ति

याचिका में पुलिस कार्रवाई से संबंधित कई तरह की तस्वीरों और वीडियो का उल्लेख किया गया है। इनमें आरोपियों को हथकड़ी पहने, रस्सियों से बंधे, जमीन पर घुटनों के बल बैठे या पुलिस कार्रवाई के दौरान असम्मानजनक स्थिति में दिखाए जाने वाली सामग्री शामिल है।याचिकाकर्ता ने ऐसी सामग्री को लेकर आपत्ति जताते हुए कहा है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों के आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किसी आरोपी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के लिए नहीं होना चाहिए। पुलिस की कार्रवाई और जांच की जानकारी जनता तक पहुंचाना अलग बात है, लेकिन किसी व्यक्ति की गरिमा प्रभावित करने वाली सामग्री को सार्वजनिक करना अलग विषय है।

दोष साबित होने से पहले पहचान सार्वजनिक करने का मुद्दा

इस याचिका के पीछे एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल यह भी है कि किसी आरोपी को अदालत से दोषी ठहराए जाने से पहले किस तरह सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। आपराधिक मामलों में आरोपी और दोषी के बीच कानूनी अंतर होता है। किसी व्यक्ति पर आरोप लगना अपने आप में उसके दोषी होने का प्रमाण नहीं माना जाता।ऐसे में याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि पुलिस और सरकारी एजेंसियों के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से प्रकाशित सामग्री में आरोपी की पहचान और गरिमा की रक्षा के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए।

सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने की मांग

याचिका में केवल पुलिस और राज्य सरकारों को ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों को भी जिम्मेदार बनाने की मांग की गई है। इसमें मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक और एक्स कॉर्प को भी उचित पॉलिसी और यूजर गाइडलाइंस तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई है।याचिका के मुताबिक सोशल मीडिया कंपनियों के स्तर पर ऐसा तंत्र होना चाहिए, जिसके जरिए आरोपी की पहचान उजागर करने या उसे अमानवीय, अपमानजनक अथवा बेइज्जती भरे व्यवहार में दिखाने वाली सामग्री के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।

यूजर की शिकायत पर कंटेंट हटाने की मांग

याचिका में एक औपचारिक, पारदर्शी और व्यवस्थित शिकायत व्यवस्था बनाने की मांग भी की गई है। इसके तहत यदि कोई यूजर ऐसे कंटेंट की शिकायत करता है, जिसमें आरोपी की पहचान अनावश्यक रूप से सार्वजनिक की गई हो या उसे अपमानजनक तरीके से दिखाया गया हो, तो शिकायत की समीक्षा कर उचित स्थिति में सामग्री को तत्काल हटाने की व्यवस्था हो।इस मांग का उद्देश्य सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक या अनुचित सामग्री के प्रसार को रोकना है। याचिका में कहा गया है कि शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया स्पष्ट और पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि आम यूजर को यह पता हो कि ऐसी सामग्री के खिलाफ कहां और कैसे शिकायत की जा सकती है।

केंद्र और राज्यों के सामने क्या चुनौती?

अगर अदालत इस मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करती है तो इसका असर देशभर में पुलिस के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पड़ सकता है। पुलिस विभागों को अपराध और जांच से जुड़ी जानकारी साझा करते समय आरोपी की पहचान, निजता और गरिमा से जुड़े पहलुओं का भी ध्यान रखना पड़ सकता है।वहीं सोशल मीडिया कंपनियों के लिए भी कंटेंट मॉडरेशन और शिकायत निवारण की प्रक्रिया को लेकर अतिरिक्त जिम्मेदारी तय हो सकती है। हालांकि, इस मामले में अंतिम निर्णय आने से पहले केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।

सोशल मीडिया के दौर में क्यों अहम है यह मामला?

आज पुलिस की कार्रवाई से जुड़े वीडियो और तस्वीरें कुछ ही समय में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकती हैं। एक बार कोई तस्वीर या वीडियो वायरल होने के बाद उसे पूरी तरह इंटरनेट से हटाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में किसी व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक होने का प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है।यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाया गया यह मुद्दा पुलिस की सोशल मीडिया नीति, आरोपियों के अधिकार, निजता, मानवीय गरिमा और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल बन गया है।फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अब केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और सोशल मीडिया कंपनियों के जवाब के बाद यह स्पष्ट होगा कि अदालत इस मामले में आगे किस तरह की व्यवस्था या दिशा-निर्देश तय करती है।

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