उद्धव गुट की सुप्रीम कोर्ट में बड़ी दलील, ‘असली पार्टी तय करने से पहले अयोग्यता पर हो निष्पक्ष फैसला’

Editorial
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मुंबई महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े शिवसेना विवाद में उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण दलील रखी है। उद्धव गुट का कहना है कि किसी गुट को ‘असली राजनीतिक दल’ के रूप में मान्यता देने से पहले विधायकों की अयोग्यता के सवाल पर निष्पक्ष और प्रभावी निर्णय होना जरूरी है। गुट की ओर से अदालत में यह तर्क ऐसे समय रखा गया है, जब महाराष्ट्र में शिवसेना से जुड़े राजनीतिक विवाद और विधायकों की सदस्यता का मुद्दा लंबे समय से कानूनी बहस का विषय बना हुआ है।उद्धव गुट ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि पूरे मामले को केवल राजनीतिक दल की पहचान तक सीमित न देखा जाए, बल्कि पहले यह स्पष्ट किया जाए कि संबंधित विधायकों की स्थिति संवैधानिक और कानूनी रूप से क्या है।

‘असली पार्टी’ तय करने से पहले अयोग्यता पर फैसला जरूरी

उद्धव ठाकरे गुट की मुख्य दलील यही है कि किसी राजनीतिक दल पर अधिकार या उसके वास्तविक प्रतिनिधित्व का फैसला करने से पहले विधायकों की अयोग्यता से जुड़े प्रश्न को निष्पक्ष तरीके से तय किया जाना चाहिए।गुट का कहना है कि यदि अयोग्यता के मामले पर अंतिम निर्णय से पहले ही किसी गुट को असली पार्टी मान लिया जाता है, तो इससे आगे की पूरी संवैधानिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष यह सवाल भी उठाया गया कि पार्टी की पहचान और विधायकों की सदस्यता से जुड़े मामलों को किस क्रम में देखा जाना चाहिए। उद्धव गुट चाहता है कि इस पूरे विवाद में संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

महाराष्ट्र के सत्ता संघर्ष से जुड़ा है मामला

शिवसेना का यह विवाद महाराष्ट्र में हुए बड़े राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ा है। वर्ष 2022 में शिवसेना में विभाजन के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला था। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों के एक समूह ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व से अलग होकर नई सरकार के गठन का रास्ता तैयार किया।इसके बाद शिवसेना के दोनों गुटों के बीच पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और राजनीतिक विरासत को लेकर विवाद खड़ा हुआ। मामला चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।इसी पूरे विवाद के दौरान विधायकों की अयोग्यता का मुद्दा भी सामने आया। उद्धव गुट लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि दलबदल और अयोग्यता से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का सही तरीके से पालन होना चाहिए।

अयोग्यता का फैसला क्यों है अहम?

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की सदस्यता पर सवाल उठ सकता है। ऐसे मामलों में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद में भी यही सवाल प्रमुख रहा है कि संबंधित विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही किस आधार पर और किस समय तय की जानी चाहिए।उद्धव गुट का तर्क है कि जब तक इस सवाल का निष्पक्ष समाधान नहीं हो जाता, तब तक पार्टी के वास्तविक प्रतिनिधित्व से जुड़े फैसले को अंतिम रूप देना उचित नहीं होगा।

उद्धव गुट ने निष्पक्ष प्रक्रिया पर दिया जोर

सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट की ओर से दलील का केंद्र निष्पक्षता और संवैधानिक प्रक्रिया है। गुट का कहना है कि राजनीतिक विवादों का समाधान केवल संख्या बल या तत्काल राजनीतिक स्थिति के आधार पर नहीं होना चाहिए।याचिकाकर्ता पक्ष का मानना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए कानून और संविधान के प्रावधानों का पालन जरूरी है।उद्धव गुट की ओर से यह भी संकेत दिया गया कि पार्टी के भीतर विभाजन और नेतृत्व के दावे को विधायकों की अयोग्यता के मुद्दे से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

शिवसेना विवाद में ‘असली पार्टी’ का मुद्दा

महाराष्ट्र के राजनीतिक विवाद में सबसे बड़ा सवाल यह रहा है कि आखिर शिवसेना का वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधि कौन है। दोनों पक्षों ने पार्टी पर अपना दावा पेश किया था।इस विवाद में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई चली। चुनाव आयोग ने एक चरण पर एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न देने का फैसला किया था। इसके बाद उद्धव गुट ने इस फैसले को चुनौती दी।अब सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी प्रक्रिया इस विवाद के संवैधानिक पहलुओं को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

सत्ता संघर्ष के बाद बदली महाराष्ट्र की राजनीति

शिवसेना में विभाजन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह बदल गई। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में नई सरकार बनी।इसके बाद शिवसेना और उसके समर्थकों के बीच राजनीतिक विरासत को लेकर विवाद लगातार जारी रहा। यह विवाद केवल पार्टी संगठन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विधानसभा में विधायकों की स्थिति और सरकार के गठन की संवैधानिक वैधता से भी जुड़ा।इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर महाराष्ट्र की राजनीति के साथ-साथ देशभर की नजर रहती है।

आगे क्या होगा?

अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और उसके संभावित फैसले पर टिकी हैं। अयोग्यता, पार्टी की पहचान और विधायकों की संवैधानिक स्थिति जैसे मुद्दों पर अदालत की व्याख्या भविष्य में दूसरे राजनीतिक मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।उद्धव गुट की ताजा दलील का सार यही है कि पहले अयोग्यता के सवाल पर निष्पक्ष फैसला हो और उसके बाद ही किसी गुट को असली राजनीतिक पार्टी के रूप में मान्यता देने के मुद्दे पर अंतिम निर्णय किया जाए।महाराष्ट्र का शिवसेना विवाद अब सिर्फ दो राजनीतिक गुटों की लड़ाई नहीं रह गया है। यह मामला दल-बदल कानून, विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका, राजनीतिक दल की पहचान और संवैधानिक लोकतंत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों को सामने ला रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इसलिए भी अहम है क्योंकि इसका असर महाराष्ट्र की राजनीति से आगे देश में भविष्य के राजनीतिक विवादों पर पड़ सकता है।

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