N Chandrasekaran: इंटर्न से Tata Sons के चेयरमैन तक का सफर, अब क्यों छोड़ रहे पद? जानिए पूरी कहानी

Editorial
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मुंबई टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस में नेतृत्व को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने संकेत दिया है कि उनका मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद वह दोबारा चेयरमैन पद के लिए पुनर्नियुक्ति की मांग नहीं करेंगे। उनका वर्तमान कार्यकाल 20 फरवरी 2027 तक है। ऐसे में टाटा समूह में उनके उत्तराधिकारी को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं।एन. चंद्रशेखरन की कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने टाटा समूह में एक इंटर्न के तौर पर करियर की शुरुआत की और वर्षों की मेहनत, नेतृत्व क्षमता और कारोबारी रणनीति के दम पर टाटा संस के पहले गैर-पारसी चेयरमैन बने। उनके कार्यकाल में टाटा समूह ने एयर इंडिया की वापसी से लेकर सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, डिजिटल कारोबार और नए औद्योगिक क्षेत्रों में बड़े कदम उठाए।आइए जानते हैं एन. चंद्रशेखरन कौन हैं, उनकी पढ़ाई कहां हुई, टाटा समूह में उनका सफर कैसे शुरू हुआ और अब उनके पद छोड़ने की वजह क्या बताई जा रही है।

तमिल माध्यम स्कूल से शुरू हुई पढ़ाई

एन. चंद्रशेखरन का जन्म तमिलनाडु के एक साधारण परिवार में हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई नमक्कल जिले के पैतृक गांव में स्थित तमिल माध्यम के सरकारी स्कूल से हुई। परिवार के अनुसार, बचपन में वह अपने भाइयों के साथ स्कूल जाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलते थे।उनके परिवार की पृष्ठभूमि बेहद सामान्य थी। चंद्रशेखरन के बड़े भाई एन. श्रीनिवासन कॉरपोरेट क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं, जबकि उनके दूसरे भाई एन. गणपति सुब्रमण्यम टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर रह चुके हैं।उच्च शिक्षा के लिए चंद्रशेखरन ने कोयंबटूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एप्लाइड साइंसेज में स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने 1986 में तत्कालीन रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशंस (एमसीए) की डिग्री हासिल की। यही संस्थान बाद में एनआईटी तिरुचिरापल्ली के नाम से जाना गया।

1986 में इंटर्न बनकर शुरू किया टाटा समूह का सफर

एन. चंद्रशेखरन की टाटा समूह से जुड़ने की कहानी काफी दिलचस्प है। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने से पहले ही टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में इंटर्न के रूप में काम शुरू कर दिया था।एमसीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1987 में वह टीसीएस के साथ नियमित रूप से जुड़ गए। शुरुआती दौर में उन्होंने चेन्नई में काम किया। उनके काम करने के तरीके को लेकर कहा जाता है कि वह बेहद मेहनती और अनुशासित थे। शुरुआती दिनों में वह अपने भाई के साथ रहते थे और काम के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी मजबूत थी कि वह सुबह जल्दी कार्यालय के लिए निकलते और देर रात घर लौटते थे।एक इंटर्न के रूप में शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे टीसीएस के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा।

TCS में बनाई अपनी अलग पहचान

टीसीएस में चंद्रशेखरन ने करीब तीन दशक का सफर तय किया। अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते हुए उन्होंने कंपनी के कारोबार और वैश्विक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में वह टीसीएस के सीईओ और एमडी बने।उनके नेतृत्व में टीसीएस ने वैश्विक आईटी सेवा बाजार में अपनी स्थिति मजबूत की। कंपनी का कारोबार तेजी से बढ़ा और वह भारत की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल हुई। टीसीएस में उनके प्रदर्शन को ही आगे चलकर टाटा संस के शीर्ष पद के लिए उनकी सबसे बड़ी ताकत माना गया।

2017 में बने Tata Sons के चेयरमैन

टाटा समूह के इतिहास में 2016-17 का दौर काफी महत्वपूर्ण था। साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद समूह में नेतृत्व को लेकर काफी चर्चा हुई।अक्तूबर 2016 में एन. चंद्रशेखरन को टाटा संस के बोर्ड में शामिल किया गया। जनवरी 2017 में उन्हें टाटा संस का कार्यकारी चेयरमैन नियुक्त किया गया और 21 फरवरी 2017 को उन्होंने आधिकारिक रूप से पदभार संभाला।इस नियुक्ति के साथ चंद्रशेखरन ने टाटा समूह के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा। वह समूह के पहले पेशेवर और गैर-पारसी चेयरमैन बने।

‘One Tata’ रणनीति से समूह को दी नई दिशा

टाटा संस की जिम्मेदारी संभालने के बाद चंद्रशेखरन के सामने सबसे बड़ी चुनौती समूह के अलग-अलग कारोबारों को एक रणनीतिक दिशा देने की थी। उन्होंने इसके लिए ‘One Tata’ की सोच पर जोर दिया।इस रणनीति के तहत समूह की विभिन्न कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ाने, पूंजी के बेहतर इस्तेमाल और भविष्य के कारोबारों पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की गई। कमजोर प्रदर्शन वाले कारोबारों की समीक्षा और गैर-प्रमुख संपत्तियों से बाहर निकलने पर भी जोर दिया गया।उनके कार्यकाल में टाटा समूह ने कई बड़े कारोबारी फैसले लिए।

Air India की वापसी बनी बड़ी उपलब्धि

एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल की सबसे चर्चित उपलब्धियों में एयर इंडिया का टाटा समूह में वापस आना शामिल है। सरकार द्वारा एयर इंडिया के निजीकरण की प्रक्रिया के बाद टाटा समूह ने इस एयरलाइन का अधिग्रहण किया।इसके बाद एयर इंडिया, विस्तारा और एयरएशिया इंडिया से जुड़े कारोबारों के पुनर्गठन और एकीकरण की दिशा में बड़े कदम उठाए गए। इसका उद्देश्य टाटा समूह के विमानन कारोबार को अधिक मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनाना था।

नए कारोबारों में टाटा की एंट्री

चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा समूह ने पारंपरिक कारोबार से आगे बढ़कर कई नए क्षेत्रों पर भी जोर दिया। इनमें सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, बैटरी, डिजिटल सेवाएं और रक्षा क्षेत्र प्रमुख हैं।टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के माध्यम से सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में बड़े निवेश की योजनाएं सामने आईं। गुजरात के धोलेरा में सेमीकंडक्टर फैब और असम के जागीरोड में असेंबली प्लांट जैसी परियोजनाओं को समूह की भविष्य की रणनीति से जोड़ा गया।इसी तरह टाटा समूह ने एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग और रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भी अपनी गतिविधियां बढ़ाईं। गुजरात के साणंद में बैटरी सेल निर्माण की योजनाएं भी इसी विस्तार का हिस्सा हैं।

Tata Neu और डिजिटल विस्तार

चंद्रशेखरन के कार्यकाल में टाटा समूह ने डिजिटल क्षेत्र में भी बड़ा कदम उठाया। समूह की अलग-अलग डिजिटल सेवाओं को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से Tata Neu सुपरऐप लॉन्च किया गया।इसके अलावा बिगबास्केट और 1एमजी जैसे डिजिटल और उपभोक्ता कारोबारों में निवेश तथा अधिग्रहण के जरिए टाटा समूह ने तेजी से बदलते डिजिटल बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की।

वित्तीय अनुशासन पर भी रहा जोर

एन. चंद्रशेखरन के नेतृत्व में समूह की कंपनियों में वित्तीय अनुशासन बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। टाटा मोटर्स के लिए भारत में शून्य-शुद्ध-ऋण जैसे लक्ष्य तय किए गए। टाटा स्टील के कर्ज को कम करने और कमजोर या गैर-प्रमुख कारोबारों की समीक्षा की दिशा में भी कदम उठाए गए।इसी दौर में टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स को मजबूत करने के लिए कारोबारों का पुनर्गठन और अधिग्रहण किए गए। कैपिटल फूड्स और ऑर्गेनिक इंडिया जैसे सौदों ने टाटा के उपभोक्ता कारोबार को विस्तार दिया।

अब क्यों पद छोड़ रहे हैं एन. चंद्रशेखरन?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि एन. चंद्रशेखरन Tata Sons का चेयरमैन पद क्यों छोड़ रहे हैं?उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने कहा है कि उनका मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होने के बाद वह पुनर्नियुक्ति की मांग नहीं करेंगे। उन्होंने बोर्ड से अपने उत्तराधिकारी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को कहा है।इस फैसले के पीछे टाटा संस के बोर्ड और शेयरधारकों के स्तर पर पुनर्नियुक्ति को लेकर बनी अनिश्चितता को एक प्रमुख वजह माना जा रहा है। टाटा संस में चेयरमैन के पद पर बने रहने के लिए उनका निदेशक के तौर पर पुनर्नियुक्त होना भी महत्वपूर्ण है।रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि समूह के भीतर कुछ कारोबारी मुद्दों और नए कारोबारों के प्रदर्शन को लेकर मतभेद सामने आए हैं। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा समूह के सबसे बड़े शेयरधारक पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं और ऐसे में उनके रुख को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।हालांकि इन मतभेदों को लेकर सार्वजनिक रूप से सामने आई जानकारी सीमित है। इसलिए इसे चंद्रशेखरन के पद छोड़ने का एकमात्र कारण मानना उचित नहीं होगा।

10 साल के कार्यकाल के बाद क्या होगी अगली तस्वीर?

एन. चंद्रशेखरन का टाटा संस के शीर्ष पद पर करीब एक दशक का कार्यकाल समूह के लिए बड़े बदलावों का दौर रहा है। टीसीएस में इंटर्न से शुरू हुआ उनका सफर टाटा समूह की सबसे शक्तिशाली कारोबारी संस्था के नेतृत्व तक पहुंचा।अब उनके उत्तराधिकारी को लेकर फैसला टाटा समूह के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा। अगला चेयरमैन न केवल मौजूदा कारोबारों को आगे बढ़ाएगा, बल्कि सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, एआई, डिजिटल सेवाओं, विमानन, बैटरी और नए औद्योगिक क्षेत्रों में टाटा की महत्वाकांक्षी योजनाओं को भी दिशा देगा।फिलहाल एन. चंद्रशेखरन का कार्यकाल फरवरी 2027 तक जारी है। इसलिए टाटा संस में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया आने वाले समय में समूह की रणनीति और भविष्य की दिशा के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है।

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