बालों को सीधा और चमकदार बनाने के लिए केमिकल हेयर स्ट्रेटनर का चलन तेजी से बढ़ा है, खासकर शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में महिलाएं साल में कई बार सैलून जाकर यह ट्रीटमेंट करवा रही हैं। लेकिन अब हालिया रिसर्च ने इस सौंदर्य प्रक्रिया से जुड़े एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम की ओर इशारा किया है।
जर्नल ऑफ द नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट और वर्ल्ड साइकियाट्री में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, जो महिलाएं साल में चार बार या उससे अधिक केमिकल हेयर स्ट्रेटनर का उपयोग करती हैं, उनमें गर्भाशय (एंडोमेट्रियल) कैंसर का खतरा उन महिलाओं की तुलना में ज्यादा पाया गया है जो इन उत्पादों का इस्तेमाल नहीं करतीं।
रिसर्च में क्या सामने आया?
रिसर्च के मुताबिक, केमिकल हेयर स्ट्रेटनर का बार-बार इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में जीवनकाल में गर्भाशय कैंसर होने का जोखिम लगभग 4 प्रतिशत पाया गया, जबकि इन उत्पादों का उपयोग न करने वाली महिलाओं में यह जोखिम करीब 1.6 प्रतिशत है।
हालांकि आंकड़ों के हिसाब से यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के दौर में यह इजाफा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खासतौर पर तब, जब महिलाएं पहले से ही हार्मोनल असंतुलन, मोटापा और डायबिटीज जैसी समस्याओं से जूझ रही हों।
केमिकल स्ट्रेटनर में कौन से खतरनाक तत्व होते हैं?
ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. कस्तूरी बरुआ के अनुसार, केमिकल हेयर स्ट्रेटनर में कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं:
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फॉर्मलडिहाइड
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पैराबेन्स
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फ्थेलेट्स
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भारी धातुएं (Heavy Metals)
डॉ. बरुआ कहती हैं,
“हम अक्सर खानपान, व्यायाम और नियमित जांच पर बात करते हैं, लेकिन बालों और सौंदर्य उत्पादों को उतनी गंभीरता से नहीं लेते। ये केमिकल शरीर में हार्मोनल गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं, जो लंबे समय में कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं।”
उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां शादी-ब्याह और त्योहारों के दौरान सैलून ट्रीटमेंट का चलन ज्यादा है, वहां यह जोखिम और भी अहम हो जाता है।
फॉर्मलडिहाइड को लेकर अंतरराष्ट्रीय चेतावनी
इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने फॉर्मलडिहाइड को पहले ही ज्ञात कार्सिनोजेन (कैंसर पैदा करने वाला तत्व) की श्रेणी में रखा है। इसके अलावा, अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (US FDA) ने भी केमिकल हेयर ट्रीटमेंट्स को लेकर चेतावनी जारी की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सैलून में स्ट्रेटनिंग के दौरान निकलने वाली गैसों को सांस के जरिए अंदर लेना भी खतरनाक हो सकता है। जो महिलाएं या ब्यूटीशियन नियमित रूप से इन केमिकल्स के संपर्क में आती हैं, उनके लिए जोखिम और बढ़ सकता है।
उत्तर प्रदेश में क्यों ज्यादा जरूरी है जागरूकता?
उत्तर प्रदेश में सैलून इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है। छोटे शहरों और कस्बों तक में अब हेयर स्ट्रेटनिंग, स्मूदनिंग और केराटिन ट्रीटमेंट आम हो चुके हैं। लेकिन कई जगहों पर न तो सही वेंटिलेशन होता है और न ही इस्तेमाल किए जा रहे प्रोडक्ट्स की पूरी जानकारी ग्राहकों को दी जाती है।
ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में महिलाएं अक्सर सस्ते केमिकल ट्रीटमेंट की ओर आकर्षित होती हैं, जिससे अनजाने में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।
गर्भाशय कैंसर के अन्य जोखिम कारक
डॉक्टरों के अनुसार, केमिकल हेयर स्ट्रेटनर के अलावा भी कई कारण गर्भाशय कैंसर के खतरे को बढ़ाते हैं, जैसे:
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मोटापा
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डायबिटीज
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हार्मोनल असंतुलन
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देर से मेनोपॉज
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शारीरिक गतिविधि की कमी
अगर इन जोखिम कारकों के साथ केमिकल एक्सपोजर जुड़ जाए, तो खतरा और बढ़ सकता है।
जोखिम कम करने के लिए क्या करें?
केमिकल स्ट्रेटनर का सीमित उपयोग करें
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि केमिकल हेयर स्ट्रेटनर को केवल खास मौकों तक सीमित रखें। रोजमर्रा के लिए नेचुरल या हीट-फ्री हेयर स्टाइलिंग विकल्प अपना
सुरक्षित प्रोडक्ट चुनें
हमेशा फॉर्मलडिहाइड-फ्री प्रोडक्ट्स का चयन करें। सैलून में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स की जानकारी जरूर लें और अच्छी तरह हवादार जगह पर ही ट्रीटमेंट करवाएं।
स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं
वजन नियंत्रित रखना, नियमित व्यायाम और डायबिटीज पर नियंत्रण गर्भाशय कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है।
नियमित जांच और सतर्कता
अगर असामान्य ब्लीडिंग, पेट दर्द या अन्य कोई लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। नियमित हेल्थ चेकअप को नजरअंदाज न करें।
डॉक्टर को पूरी जानकारी दें
अपने डॉक्टर को अपनी ब्यूटी रूटीन और केमिकल प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल के बारे में ईमानदारी से बताएं, ताकि वे सही सलाह दे सकें।
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि सौंदर्य और सेहत के बीच संतुलन जरूरी है। केमिकल हेयर स्ट्रेटनर पूरी तरह छोड़ना हर किसी के लिए संभव न हो, लेकिन इसके जोखिमों को समझना और सीमित, सुरक्षित उपयोग करना बेहद जरूरी है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, जहां महिलाओं की आबादी बड़ी है, वहां इस तरह की स्वास्थ्य जानकारी का प्रसार समय की मांग है। जागरूकता, सही विकल्प और नियमित जांच से ही इस संभावित खतरे को कम किया जा सकता है।

