
रात को जब पूरा संसार ठहर जाता है और हम दिनभर की थकान मिटाकर बिस्तर पर सुकून की नींद सोने जाते हैं, ठीक उसी वक्त हमारे दिमाग के अंदर विचारों का एक तूफ़ान सा उठ खड़ा होता है। जैसे ही कमरे की बत्तियां गुल होती हैं, वैसे ही अतीत की पुरानी यादें, भविष्य की अनगिनत चिंताएं और अधूरे पड़े कामों की एक लंबी फेहरिस्त दिमाग में चक्कर काटने लगती है। हैरानी की बात यह है कि जिस समय को शरीर और मस्तिष्क को शांत होना चाहिए, उसी समय दिमाग में सबसे ज्यादा शोर और बेचैनी महसूस होती है। आंखें बंद करते ही विचारों की इस अंतहीन बाढ़ के पीछे कोई जादुई ताकत नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की जीवनशैली और इंसानी मनोविज्ञान से जुड़े कुछ बेहद ठोस कारण छिपे हुए हैं।इस समस्या की सबसे पहली और मुख्य वजह है रात के समय बाहरी दुनिया का पूरी तरह शांत हो जाना। दिन के उजाले में हमारा दिमाग ऑफिस की फाइलों, फोन कॉल्स, सोशल मीडिया की रील्स, दोस्तों के साथ बातचीत और सड़कों के ट्रैफिक के शोर में बुरी तरह उलझा रहता है। इतने सारे बाहरी विकर्षणों के बीच हमारे पास अपने खुद के बारे में गहराई से सोचने का वक्त ही नहीं बचता। लेकिन जैसे ही रात का सन्नाटा पसरता है और डिजिटल दुनिया के नोटिफिकेशन्स बंद होते हैं, दिमाग को बाहरी उद्दीपनों से अचानक एक बड़ा ब्रेक मिल जाता है। जब ध्यान बाहर की चीजों पर लगना बंद हो जाता है, तो यह स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर झांकने लगता है। यही वह वक्त होता है जब दिनभर से दबी हुई भावनाएं और छोटी-मोटी परेशानियां भी बहुत विकराल और बड़ी नजर आने लगती हैं। इसके अलावा आज की बेहद तेज रफ्तार और भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अपने वास्तविक इमोशन्स यानी भावनाओं को ठीक से प्रोसेस करने का समय ही नहीं निकाल पाते। जब भी हमें दिन में कोई तनाव, दुख या उलझन होती है, तो हम अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर या फिर फोन की स्क्रीन पर स्क्रॉलिंग करके तुरंत अपना ध्यान भटका लेते हैं। लेकिन हमारा दिमाग इन अनसुलझी और अधूरी भावनाओं को भूलता नहीं है, बल्कि उन्हें भीतर ही भीतर दबाए रखता है। रात के शांत माहौल में जब हम बिल्कुल अकेले होते हैं, तो दिमाग इन सारी पुरानी और अधूरी बातों को एक-एक करके बाहर निकालने लगता है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘रुमिनेशन’ कहा जाता है, जिसका सीधा मतलब है किसी एक ही नकारात्मक बात को दिमाग में बार-बार दोहराना या जुगाली करना। दिनभर का यही छिपा हुआ मानसिक तनाव रात को गहरी बेचैनी और ओवरथिंकिंग बनकर हमारे सामने आ खड़ा होता है।इस मानसिक खेल को और ज्यादा खतरनाक बनाने का काम करते हैं हमारे आधुनिक गैजेट्स। सोने से ठीक पहले तक फोन चलाना, लैपटॉप पर काम करना या टीवी देखना इस समस्या को कई गुना बढ़ा देता है। इन सभी इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन्स से निकलने वाली नीली रोशनी यानी ‘ब्लू लाइट’ हमारे शरीर में मेलाटोनिन नामक हार्मोन के प्राकृतिक रिसाव को रोक देती है। मेलाटोनिन वही हार्मोन है जो हमारे शरीर को यह संकेत देता है कि अब सोने का वक्त हो गया है। जब यह हार्मोन नहीं बनता, तो हमारा दिमाग भ्रमित हो जाता है और उसे लगता है कि अभी भी दिन ही चल रहा है। इस भ्रम के कारण दिमाग पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ जाता है, जिससे विचार और तेजी से भागने लगते हैं और हम न चाहते हुए भी ओवरथिंकिंग के जाल में बुरी तरह फंस जाते हैं।

बिस्तर पर लेटे-लेटे लगातार घंटों तक सोचना सिर्फ हमारी नींद ही खराब नहीं करता, बल्कि यह हमारे पूरे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी दीमक की तरह चाटने लगता है। जब रात की नींद पूरी नहीं होती, तो दिमाग को जरूरी आराम नहीं मिल पाता जिससे अगले ही दिन मानसिक तनाव का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है। नतीजा यह होता है कि सुबह उठते ही स्वभाव में चिड़चिड़ापन, काम में फोकस की भारी कमी और पूरे शरीर में एक अजीब सी थकान बनी रहती है। अगर कोई इंसान लंबे समय तक इसी चक्र में फंसा रहे, तो धीरे-धीरे वह गंभीर एंग्जायटी का शिकार हो सकता है। नींद की इस कमी से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है और आगे चलकर दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है।इस थका देने वाले मानसिक चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए हमें अपनी कुछ आदतों में थोड़ा बदलाव करना होगा। सबसे पहले हमें ‘डिजिटल डिटॉक्स’ को अपनाना होगा, जिसके तहत सोने से कम से कम आधे से एक घंटे पहले ही फोन, लैपटॉप और टीवी जैसी सभी स्क्रीन्स को खुद से दूर कर देना चाहिए। इसके साथ ही ‘जर्नलिंग’ यानी डायरी लिखने की आदत इस समस्या में एक रामबाण इलाज की तरह काम करती है\ सोने से पहले उन सभी बातों या विचारों को कागज पर लिख देना चाहिए जो दिमाग में उथल-पुथल मचा रहे हैं, इससे दिमाग हल्का महसूस करने लगता है। बिस्तर पर जाने के बाद कुछ मिनटों के लिए की जाने वाली गहरी और धीमी सांसों की एक्सरसाइज हमारे नर्वस सिस्टम को सुरक्षित होने का अहसास कराती है, जिससे दिमाग तुरंत शांत होने लगता है। इसके साथ ही, शाम के बाद चाय, कॉफी या किसी भी तरह के कैफीन वाले पेय पदार्थों से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए, क्योंकि ये हमारे दिमाग को जबरन जगाए रखते हैं। इन छोटे-छोटे मगर प्रभावी बदलावों को अपनाकर हम रात के इस मानसिक शोर को थाम सकते हैं और एक बेहद सुकून भरी और गहरी नींद का आनंद ले सकते हैं।
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