कभी भारतीय सभ्यता की गौरवशाली पहचान मानी जाने वाली मोहनजोदड़ो की मशहूर कांस्य प्रतिमा ‘डांसिंग गर्ल’ अब एक नए विवाद के केंद्र में आ गई है। यह विवाद किसी नई खोज या पुरातात्विक बहस को लेकर नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी शैक्षणिक संस्था एनसीईआरटी की एक पाठ्यपुस्तक में प्रकाशित तस्वीर को लेकर खड़ा हुआ है। इतिहासकारों और कला विशेषज्ञों का आरोप है कि हजारों साल पुरानी इस ऐतिहासिक धरोहर की मूल छवि के साथ छेड़छाड़ की गई है, जिससे उसकी प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हो गए हैं। यही वजह है कि अब यह मामला केवल एक तस्वीर तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि भारतीय इतिहास, कला और शिक्षा के दृष्टिकोण पर बड़ी बहस का रूप ले चुका है। दरअसल एनसीईआरटी की कक्षा 9 की नई कला शिक्षा पुस्तक ‘मधुरिमा‘ में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध प्रतिमा डांसिंग गर्ल की तस्वीर प्रकाशित की गई है। लेकिन इस तस्वीर को देखकर इतिहासकार और कला विशेषज्ञ हैरान रह गए। आरोप है कि पुस्तक में प्रकाशित तस्वीर में प्रतिमा के ऊपरी हिस्से को इस तरह से शेडिंग के जरिए ढका गया है कि उसका मूल स्वरूप स्पष्ट नहीं दिखाई देता। जबकि वास्तविक मूर्ति में शरीर के जो हिस्से स्वाभाविक रूप से दिखाई देते हैं, उन्हें तस्वीर में अस्पष्ट बना दिया गया है। यही बदलाव अब विवाद की सबसे बड़ी वजह बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक कलाकृति की तस्वीर को इस तरह बदलना उसकी मौलिकता के साथ खिलवाड़ है। उनका तर्क है कि इतिहास को उसी रूप में दिखाया जाना चाहिए, जैसा वह वास्तव में है, न कि उसे आधुनिक सोच या सामाजिक धारणाओं के अनुसार बदल दिया जाए। इस पूरे विवाद ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया क्योंकि एनसीईआरटी की ही कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में यही डांसिंग गर्ल प्रतिमा लगभग अपने मूल स्वरूप में दिखाई गई है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि एक ही संस्था की दो अलग-अलग पुस्तकों में एक ही ऐतिहासिक धरोहर को अलग-अलग तरीके से क्यों प्रस्तुत किया गया? आखिर ऐसा क्या बदल गया कि कक्षा 9 की कला पुस्तक में प्रतिमा की तस्वीर को संशोधित करने की जरूरत महसूस हुई? इस मुद्दे पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया इतिहासकार और शिक्षाविद मिशेल डैनिनो की ओर से आई है। डैनिनो एनसीईआरटी की नई कक्षा 6 सामाजिक विज्ञान पुस्तकों की विकास समिति के प्रमुख भी रह चुके हैं। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने नई पुस्तक में प्रकाशित तस्वीर देखी तो उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। उनका कहना है कि यदि भारतीय कला और इतिहास के अध्याय में भी एक प्रसिद्ध कलाकृति को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं दिखाया जा सकता, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

डैनिनो ने साफ शब्दों में कहा कि ऐतिहासिक कलाकृतियों की तस्वीरों में इस तरह का बदलाव करना गलत परंपरा की शुरुआत हो सकती है। उनके अनुसार, अगर किसी क्षतिग्रस्त मूर्ति के संभावित पुनर्निर्माण को दिखाने के लिए बदलाव किया जाए तो बात अलग है, लेकिन मूल कलाकृति के स्वरूप को बदलना उसकी वास्तविकता को विकृत करने जैसा है। उन्होंने इसे इतिहास के प्रति गलत दृष्टिकोण करार दिया। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि उन्हें पहले बताया गया था कि डांसिंग गर्ल की तस्वीर को कुछ लोगों ने “आयु के अनुकूल नहीं” माना था। हालांकि उन्होंने और उनकी टीम ने इस तर्क से सहमति नहीं जताई थी। डैनिनो के अनुसार, कक्षा 6 के शिक्षकों से भी राय ली गई थी और शिक्षकों ने कहा था कि इस प्रतिमा को लेकर कभी कोई समस्या सामने नहीं आई। उन्होंने यह भी कहा कि नग्नता को अनुपयुक्त मानना एक पुरानी विक्टोरियन मानसिकता का हिस्सा है, जबकि भारतीय कला और संस्कृति का इतिहास इससे कहीं अधिक व्यापक और उदार रहा है। दरअसल मोहनजोदड़ो से प्राप्त डांसिंग गर्ल प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे चर्चित और प्रतिष्ठित कलाकृतियों में से एक मानी जाती है। लगभग 2600 ईसा पूर्व की यह कांस्य प्रतिमा ‘लॉस्ट वैक्स तकनीक‘ से बनाई गई थी, जो आज भी भारत के कई हिस्सों में प्रचलित है। करीब 11 सेंटीमीटर ऊंची इस मूर्ति की खासियत उसकी आत्मविश्वास से भरी मुद्रा है। एक हाथ कमर पर, दूसरा हाथ नीचे की ओर और ठोड़ी हल्की ऊपर उठी हुई दिखाई देती है। यही मुद्रा उसे हजारों वर्षों बाद भी जीवंत और आकर्षक बनाती है। पुरातत्वविदों और इतिहासकारों ने समय-समय पर इस प्रतिमा की अलग-अलग व्याख्याएं की हैं। कुछ इसे नृत्यांगना मानते हैं तो कुछ इसे उस दौर की किसी प्रभावशाली महिला का प्रतीक बताते हैं। हालांकि, इसके वास्तविक उद्देश्य और संदर्भ को लेकर अब भी पूरी तरह स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। फिर भी, इसमें कोई दो राय नहीं कि यह प्रतिमा भारतीय सभ्यता की कलात्मक उत्कृष्टता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतिहास और कला का उद्देश्य समाज को अतीत से परिचित कराना होता है, न कि उसे बदलकर प्रस्तुत करना। यदि किसी ऐतिहासिक धरोहर की छवि को आधुनिक मानकों के आधार पर संशोधित किया जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों तक इतिहास का अधूरा और बदला हुआ स्वरूप पहुंचेगा। यही वजह है कि डांसिंग गर्ल की तस्वीर में किए गए बदलाव को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। अब सबकी निगाहें एनसीईआरटी पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या संस्था इस विवाद पर कोई स्पष्टीकरण देगी? क्या भविष्य में इस तस्वीर को उसके मूल स्वरूप में प्रकाशित किया जाएगा? या फिर यह बहस भारतीय शिक्षा व्यवस्था में इतिहास और संस्कृति को प्रस्तुत करने के तरीके पर एक नई बहस की शुरुआत साबित होगी? फिलहाल इतना तय है कि हजारों साल पुरानी यह छोटी-सी कांस्य प्रतिमा एक बार फिर पूरे देश में बड़े सवाल खड़े कर रही है।
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