पटना बिहार की राजनीति में शुक्रवार को एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जिसने सत्ता और संगठन दोनों के भीतर हलचल मचा दी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बिहार सरकार से पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने को लेकर संवैधानिक आधार पूछे जाने के एक दिन बाद भारतीय जनता पार्टी के विधान परिषद सदस्य देवेश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस इस्तीफे के साथ ही लगभग सभी राजनीतिक अटकलों पर विराम लग गया और यह साफ संकेत मिल गया कि अब दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजकर उनका मंत्री पद बरकरार रखा जाएगा।हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने एक नया सवाल भी खड़ा कर दिया है—आखिर देवेश कुमार की ही कुर्बानी क्यों दी गई? क्या यह केवल संवैधानिक संकट से निकलने का रास्ता है या इसके पीछे भाजपा की बड़ी राजनीतिक रणनीति छिपी हुई है? इन सवालों पर अब बिहार का राजनीतिक गलियारा गर्म है।
सुप्रीम कोर्ट के सवाल ने बढ़ाई सरकार की मुश्किल
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बिहार सरकार से पूछा था कि दीपक प्रकाश किस संवैधानिक प्रावधान के तहत छह महीने से अधिक समय तक विधायक या विधान परिषद सदस्य बने बिना मंत्री बने हुए हैं।संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई व्यक्ति मंत्री तो बन सकता है, लेकिन यदि वह छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं बनता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।शीर्ष अदालत ने सरकार से इस विषय पर स्पष्ट जवाब मांगा और संकेत दिया कि मामले की जल्द सुनवाई होगी। अदालत की इस सख्त टिप्पणी के बाद बिहार सरकार और भाजपा दोनों के सामने संवैधानिक और राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई थी।
एक दिन में बदल गई पूरी तस्वीर
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अगले ही दिन भाजपा के एमएलसी देवेश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनका कार्यकाल अभी मार्च 2027 तक था, यानी करीब सात महीने का कार्यकाल बाकी था। इसके बावजूद उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया।राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि अब इस रिक्त सीट पर दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजा जाएगा, जिससे वे संवैधानिक रूप से मंत्री बने रह सकेंगे।इस कदम ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाजपा किसी भी कीमत पर दीपक प्रकाश को मंत्रिमंडल से बाहर नहीं करना चाहती।

देवेश कुमार की ही क्यों हुई ‘बलि’?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा ने देवेश कुमार को ही इस्तीफा देने के लिए क्यों चुना?राजनीतिक जानकारों के अनुसार इसके कई संभावित कारण हो सकते हैं।पहला उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत समाप्ति के करीब था। दूसरा, संगठन में उनकी मजबूत भूमिका होने के कारण पार्टी नेतृत्व को भरोसा हो सकता है कि भविष्य में उन्हें दूसरी जिम्मेदारी दी जा सकती है। तीसरा, भाजपा नेतृत्व संवैधानिक संकट को तुरंत समाप्त करना चाहता था और उपलब्ध विकल्पों में यह सबसे आसान रास्ता माना गया।हालांकि पार्टी की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
कौन हैं देवेश कुमार?
देवेश कुमार बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं।30 अगस्त 1964 को समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड के मोहम्मदपुर देवपाट गांव में जन्मे देवेश कुमार स्वतंत्रता सेनानी और किसान नेता पंडित यमुना कारजी के पौत्र हैं।वे छात्र जीवन से ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े रहे। जेएनयू में पढ़ाई के दौरान उनकी सक्रिय राजनीतिक पहचान बनी। इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता में भी लंबा समय बिताया और कई प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में संपादकीय जिम्मेदारियां संभालीं।भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें पहले प्रदेश प्रवक्ता बनाया गया, फिर प्रदेश उपाध्यक्ष और संगठन में कई अहम जिम्मेदारियां सौंपी गईं।वर्ष 2021 में राज्यपाल कोटे से उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाया गया था। इसके बाद वे भाजपा संगठन और विधान परिषद दोनों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे।
दीपक प्रकाश को लेकर भाजपा क्यों गंभीर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दीपक प्रकाश भाजपा के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल हैं और बिहार विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी उन्हें मंत्रिमंडल में बनाए रखना चाहती है।यदि छह महीने की संवैधानिक अवधि पूरी होने के बाद भी वे सदन के सदस्य नहीं बनते, तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता था, जिससे सरकार और पार्टी दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा होती।इसी कारण तेजी से राजनीतिक समाधान निकाला गया।
विपक्ष को मिला नया मुद्दा
इस घटनाक्रम के बाद विपक्ष भी सरकार पर हमलावर हो गया है।विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार संवैधानिक दबाव में फैसले ले रही है। उनका कहना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट सवाल नहीं उठाता, तो सरकार इस विषय पर कोई कदम नहीं उठाती।हालांकि भाजपा का कहना है कि पूरी प्रक्रिया संविधान और कानून के दायरे में हो रही है तथा आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं।
अगली सुनवाई पर रहेगी नजर
अब इस पूरे मामले पर सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है।यदि दीपक प्रकाश समय रहते विधान परिषद के सदस्य बन जाते हैं, तो सरकार अदालत के सामने यह कह सकेगी कि संवैधानिक प्रक्रिया पूरी कर ली गई है।ऐसे में अदालत का रुख भी महत्वपूर्ण होगा।
बिहार की राजनीति में क्या संदेश?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक मंत्री को बचाने का मामला नहीं है, बल्कि यह भाजपा की राजनीतिक प्राथमिकताओं को भी दर्शाता है।एक ओर पार्टी ने अपने मंत्री को बचाने के लिए तुरंत संगठनात्मक निर्णय लिया, वहीं दूसरी ओर उसने यह संदेश देने की कोशिश की कि संवैधानिक विवाद को लंबा नहीं खींचा जाएगा।हालांकि देवेश कुमार का इस्तीफा आने वाले समय में संगठनात्मक समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद बिहार की राजनीति में तेजी से घटनाक्रम बदला। दीपक प्रकाश के मंत्री पद को संवैधानिक आधार देने के लिए भाजपा एमएलसी देवेश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे उनके विधान परिषद पहुंचने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। लेकिन इस फैसले ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी छोड़ दिया है—आखिर देवेश कुमार की ही कुर्बानी क्यों दी गई? आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और भाजपा के अगले कदम इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेंगे।
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