लखनऊ उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने समाज में बढ़ते महिला अपराधों, बदलती सामाजिक सोच और युवाओं की जिम्मेदारियों को लेकर बेहद भावुक और स्पष्ट संदेश दिया है। हाल ही में 13 वर्षीय बच्ची के साथ हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि समाज में करुणा, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्य जीवित होते, तो बेटियों के साथ इस तरह की दर्दनाक घटनाएं कभी नहीं होतीं।उन्होंने कहा कि समाज आज दो अलग-अलग तस्वीरें पेश कर रहा है। एक तरफ मासूम बच्चियों के साथ होने वाले जघन्य अपराध हैं, तो दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं, जो इंसानियत की मिसाल बनकर अनजान बच्चों का जीवन संवार देते हैं। यही दोनों घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है और हमें अपने भीतर झांकने की जरूरत है।
“समाज को अपने भीतर झांकना होगा”
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि हाल ही में हुई 13 वर्षीय बच्ची के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और संस्कारों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं।उन्होंने कहा कि यदि लोगों के भीतर करुणा और मानवता का भाव होता तो कोई भी व्यक्ति किसी मासूम बच्ची के साथ इस तरह की अमानवीय हरकत करने की कल्पना भी नहीं कर सकता था।राज्यपाल ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि केवल अपराधियों को दोष देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। हर व्यक्ति को अपने आचरण, सोच और सामाजिक जिम्मेदारी का आत्ममंथन करना होगा।

लावारिस बच्ची से IAS अधिकारी बनने तक का प्रेरक सफर
अपने संबोधन के दौरान राज्यपाल ने एक ऐसी कहानी सुनाई जिसने पूरे कार्यक्रम में मौजूद लोगों को भावुक कर दिया।उन्होंने बताया कि एक नवजात बच्ची को उसके जन्मदाता जन्म के तुरंत बाद लावारिस छोड़कर चले गए थे। उस मासूम को एक सब्जी बेचने वाले व्यक्ति ने अपने घर ले जाकर बेटी की तरह पाला-पोसा। उसने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उसकी पढ़ाई नहीं रुकने दी।राज्यपाल ने बताया कि उसी बच्ची ने कठिन संघर्ष के बाद पढ़ाई में सफलता हासिल की और आगे चलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की अधिकारी बनी।उन्होंने कहा कि एक ओर इंसानियत की यह मिसाल है, जहां एक गरीब व्यक्ति ने बिना किसी स्वार्थ के एक बच्ची का भविष्य संवार दिया, जबकि दूसरी ओर बेटियों के साथ हो रहे अपराध समाज के पतन की तस्वीर दिखाते हैं। यही दोनों घटनाएं समाज का असली आईना हैं।
ज्ञान और तकनीक से बदल रहा है भारत
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने अपने संबोधन में भारत के बदलते शैक्षणिक और तकनीकी परिदृश्य का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की पहल पर देशभर में दुर्लभ पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण का कार्य तेजी से किया जा रहा है, ताकि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा सुरक्षित रह सके और आने वाली पीढ़ियां उससे लाभ उठा सकें।उन्होंने कहा कि भारत आज ज्ञान और तकनीक के समन्वय की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) भाषा, शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है।उन्होंने बताया कि जनवरी 2026 में हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत कई विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में मिलकर कार्य कर रहे हैं।
युवाओं को दी दो टूक सलाह
राज्यपाल ने युवाओं, विशेषकर छात्र-छात्राओं से खुलकर संवाद करते हुए सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की।उन्होंने कहा कि आजकल कई युवा पढ़ाई के दौरान जल्दबाजी में ऐसे फैसले ले लेते हैं, जिनका असर पूरे जीवन पर पड़ता है। उन्होंने राजधानी के सिद्धीखेड़ा बालिका गृह का उल्लेख करते हुए कहा कि कई मामलों में लड़के-लड़कियां घर से भाग जाते हैं। बाद में लड़कियां गर्भवती हो जाती हैं और परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि उन बच्चों की जिम्मेदारी सरकार को उठानी पड़ती है।उन्होंने कहा कि ऐसे कई बच्चे बालगृहों में पहुंच जाते हैं, जिन्हें समाज आसानी से स्वीकार नहीं करता।
“पहले आत्मनिर्भर बनिए, फिर शादी करिए”
राज्यपाल ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में सबसे पहले शिक्षा और आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दें।उन्होंने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब उनका बेटा पढ़ाई के लिए बेंगलुरु गया था तो उन्होंने उससे मजाक में कहा था कि यदि कोई लड़की पसंद हो तो बताना, मैं शादी करवा दूंगी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ।उन्होंने युवाओं से कहा कि यदि जीवनसाथी पसंद भी हो तो पहले अपने पैरों पर खड़े हों, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें और उसके बाद विवाह का निर्णय लें।उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह प्रेम विवाह की विरोधी नहीं हैं, लेकिन बिना आत्मनिर्भर हुए जल्दबाजी में लिया गया फैसला कई बार जीवनभर की परेशानी बन जाता है।
संवेदनशील समाज ही सुरक्षित समाज
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि केवल कानून बनाने या सजा देने से समाज नहीं बदलता। बदलाव तब आएगा जब परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर बच्चों में संस्कार, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का विकास करेंगे।उन्होंने कहा कि बेटियों की सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। हर नागरिक को यह संकल्प लेना होगा कि वह महिलाओं और बच्चियों के सम्मान की रक्षा करेगा और ऐसा वातावरण बनाएगा, जहां हर बेटी बिना डर के अपने सपनों को पूरा कर सके।राज्यपाल का यह संबोधन केवल एक संदेश नहीं, बल्कि समाज के लिए आत्ममंथन का आह्वान था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि करुणा, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाए, तो न केवल बेटियों के खिलाफ अपराध कम होंगे, बल्कि भारत एक अधिक सुरक्षित, शिक्षित और मानवीय समाज के रूप में दुनिया के सामने नई मिसाल पेश करेगा।
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