अज्ञात शवों के नाम पर लाखों का खेल? अंतिम संस्कार के ₹400, लेकिन रेलवे से वसूले जाते हैं ₹7000!

Editorial
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अलीगढ़ मानवता को शर्मसार कर देने वाला एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रेलवे ट्रैक या स्टेशन परिसर में मिलने वाले अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के लिए राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) रेलवे प्रशासन से प्रति शव 7,000 रुपये प्राप्त करती है, लेकिन अंतिम संस्कार करने वाली संस्था को आज भी केवल 400 रुपये ही दिए जाते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि यह व्यवस्था पिछले 22 वर्षों से बिना किसी बदलाव के चल रही है, जबकि इस दौरान रेलवे द्वारा मिलने वाला बजट कई गुना बढ़ चुका है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रति शव मिलने वाले बाकी 6,600 रुपये कहां खर्च किए जा रहे हैं? इस रकम का कोई स्पष्ट हिसाब न तो स्थानीय अधिकारियों के पास है और न ही कोई आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आया है। यही वजह है कि पूरे मामले में कमीशनखोरी और वित्तीय अनियमितताओं की आशंका गहराती जा रही है।

2004 से नहीं बढ़ा अंतिम संस्कार का खर्च

दरअसल अलीगढ़ में वर्षों पहले अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार को लेकर कई विवाद सामने आए थे। आरोप लगते थे कि लावारिस शवों को पोखरों में फेंक दिया जाता था या फिर टायर जलाकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता था। इन आरोपों के बाद जिला प्रशासन के समन्वय से मानव उपकार संस्था को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।वर्ष 2004 में जीआरपी और संस्था के बीच हुए समझौते के तहत तय किया गया कि अंतिम संस्कार के लिए मिलने वाले 400 रुपये संस्था को दिए जाएंगे। तब रेलवे की ओर से जीआरपी को भी कुल 400 रुपये ही मिलते थे। लेकिन समय के साथ रेलवे ने महंगाई को देखते हुए यह राशि लगातार बढ़ाई—400 रुपये से 800, फिर 1200, 2000, 5000 और आखिरकार मई 2026 से इसे बढ़ाकर 7,000 रुपये प्रति शव कर दिया गया।हैरानी की बात यह है कि संस्था को मिलने वाली राशि आज भी वहीं 400 रुपये पर अटकी हुई है।

कैसे होती है पूरी प्रक्रिया?

जब रेलवे ट्रैक या स्टेशन परिसर में कोई अज्ञात शव मिलता है, तो जीआरपी सबसे पहले उसे सुरक्षित करती है। शव को विशेष किट में रखकर ऑटो, टेंपो या अन्य छोटे वाहन से पोस्टमार्टम हाउस भेजा जाता है, जिसके लिए वाहन चालक को करीब 400 से 500 रुपये का भुगतान किया जाता है।यदि शव की पहचान हो जाती है तो पोस्टमार्टम के बाद परिजन उसे ले जाते हैं। लेकिन पहचान नहीं होने पर 72 घंटे तक इंतजार किया जाता है और फिर पोस्टमार्टम के बाद शव मानव उपकार संस्था को अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया जाता है। संस्था को इसके बदले केवल 400 रुपये दिए जाते हैं, जिनमें कफन, पॉलीथिन, लकड़ी और अन्य सभी जरूरी व्यवस्थाएं करनी होती हैं।

22 साल से नहीं बदला भुगतान

मानव उपकार संस्था के अध्यक्ष विष्णु कुमार बंटी का कहना है कि संस्था वर्ष 2004 से जीआरपी द्वारा भेजे जाने वाले अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार कर रही है। तब से लेकर आज तक संस्था को प्रति शव केवल 400 रुपये ही मिल रहे हैं। उन्होंने कई बार मौखिक रूप से महंगाई के अनुसार भुगतान बढ़ाने की मांग की, लेकिन कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई।उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें जानकारी है कि जीआरपी को मिलने वाला बजट कई बार बढ़ चुका है, लेकिन संस्था तक उसका लाभ कभी नहीं पहुंचा।

बाकी रकम का हिसाब नहीं

सूत्रों के मुताबिक जीआरपी इस राशि का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त शवों को उठाने वाले मजदूरों, पोस्टमार्टम के दौरान सिलाई कराने और शव की पहचान के लिए पोस्टर छपवाने जैसे मदों में खर्च दिखाती है। हालांकि इस संबंध में कोई ठोस दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि 7,000 रुपये में से वास्तविक खर्च कितना होता है।यही वजह है कि बाकी बचने वाली राशि को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

अधिकारियों ने भी माना—पूरी जानकारी नहीं

जब इस मामले में जीआरपी अधिकारियों से जवाब मांगा गया तो स्थानीय स्तर पर भी स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी।प्रभारी निरीक्षक जितेंद्र कुमार द्विवेदी ने कहा कि उन्हें हाल ही में जिम्मेदारी मिली है। उन्होंने स्वीकार किया कि पहले पांच हजार रुपये मिलने की जानकारी थी, लेकिन अब बजट बढ़कर सात हजार हो गया है, इसकी उन्हें पूरी जानकारी नहीं थी। उन्होंने व्यवस्था की जांच कराने की बात कही।वहीं सीओ जीआरपी इटावा उदय प्रताप ने भी कहा कि उन्हें इस विषय में पूरी जानकारी नहीं है और तथ्यों की जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।सबसे अहम प्रतिक्रिया डीजी जीआरपी प्रकाश डी की ओर से आई। उन्होंने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी और यदि कहीं अनियमितता पाई गई तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

आंकड़े भी खड़े कर रहे सवाल

पिछले पांच वर्षों में जीआरपी ने 67 अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के लिए रेलवे से लाखों रुपये प्राप्त किए। मई 2026 तक प्रति शव 5,000 रुपये और उसके बाद 7,000 रुपये मिलने लगे। केवल मई के बाद ही पांच शवों के लिए जीआरपी ने कुल 35,000 रुपये प्राप्त किए, जबकि अंतिम संस्कार करने वाली संस्था को सिर्फ 2,000 रुपये दिए गए।

सबसे बड़ा सवाल

यह मामला केवल पैसों का नहीं, बल्कि उन लोगों की गरिमा का भी है जिनकी पहचान तक नहीं हो पाती। जिन अज्ञात शवों को सम्मानजनक विदाई देने के नाम पर सरकारी धन लिया जाता है, यदि उसी धन का बड़ा हिस्सा कहीं और चला जा रहा है, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ भी बड़ा खिलवाड़ है।अब निगाहें डीजी जीआरपी द्वारा घोषित जांच पर टिकी हैं। यदि जांच निष्पक्ष हुई तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि अंतिम संस्कार के नाम पर मिलने वाली हजारों रुपये की राशि आखिर जाती कहां है और पिछले 22 वर्षों से इस व्यवस्था में बदलाव क्यों नहीं किया गया।

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