उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से आई एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ इंसानियत को शर्मसार करने वाली दरिंदगी ने मासूम की जिंदगी छीन ली, तो दूसरी ओर एक बेजुबान जानवर ने ऐसी संवेदनशीलता दिखाई कि हर किसी की आंखें नम हो गईं। निर्माणाधीन मॉल में मासूम बच्ची के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के मामले में जहां सुरक्षाकर्मी पर लापरवाही के गंभीर आरोप लगे हैं, वहीं बस्ती में घूमने वाले एक आवारा कुत्ते ने पीड़ित परिवार को बच्ची के शव तक पहुंचाकर इंसानियत की ऐसी मिसाल पेश की, जिसकी हर ओर चर्चा हो रही है।यह घटना केवल एक जघन्य अपराध नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलता और मानवीय संवेदनाओं पर भी बड़ा सवाल बनकर सामने आई है।
चीखें गूंजती रहीं… लेकिन किसी इंसान ने नहीं सुनी
पीड़ित परिवार के अनुसार, आरोपी बच्ची को निर्माणाधीन मॉल के भीतर से लेकर गए। आरोप है कि वहां मौजूद सुरक्षाकर्मी ने बच्ची को आरोपियों के साथ जाते देखा और उसकी चीख-पुकार भी सुनी, लेकिन उसने इसे सामान्य घटना समझकर नजरअंदाज कर दिया।बताया जा रहा है कि सुरक्षाकर्मी अपने मोबाइल फोन में व्यस्त था। उसने न तो बच्ची की आवाज सुनकर मौके पर जाने की कोशिश की और न ही बाद में परिवार की तलाश में कोई मदद की। यदि समय रहते उसने सतर्कता दिखाई होती, तो शायद मासूम की जान बचाई जा सकती थी।

जब इंसान हार गया, तब बेजुबान बना सहारा
बेटी की तलाश में रातभर भटक रहे परिवार के साथ एक ऐसा साथी था, जिसने बिना कुछ बोले उनका दर्द समझ लिया। वह बस्ती में घूमने वाला एक आवारा कुत्ता था, जिसे परिवार अक्सर रोटी खिलाया करता था।परिवार का कहना है कि कुत्ता लगातार उनके साथ बना रहा। कभी वह आगे-आगे चलता, कभी लौटकर परिवार के पास आ जाता, मानो किसी दिशा में ले जाना चाहता हो। शुरुआत में किसी ने उसकी हरकतों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन कुछ देर बाद उसी बेजुबान ने वह कर दिखाया, जो कोई इंसान नहीं कर सका।
भौंकते-भौंकते पहुंचा दिया उस दर्दनाक मंज़र तक
पीड़ित पिता ने बताया कि रात करीब 11 बजे जब परिवार लगभग उम्मीद छोड़ चुका था, तभी कुत्ता अचानक तेज़-तेज़ भौंकते हुए निर्माणाधीन मॉल के बेसमेंट की ओर दौड़ पड़ा।परिजन उसके पीछे गए तो वहां का दृश्य देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। बेसमेंट में उनकी मासूम बेटी का शव पड़ा था। बताया जाता है कि शव मिलने के बाद भी कुत्ता काफी देर तक वहीं बैठा रहा, जैसे किसी अपने की रखवाली कर रहा हो।उस मार्मिक दृश्य को देखने वाले हर व्यक्ति की आंखें भर आईं। परिवार के लोगों का कहना है कि जिस वक्त इंसानों ने मुंह मोड़ लिया, उस वक्त एक बेजुबान ने उनका सबसे बड़ा सहारा बनकर साथ निभाया।
75 वर्षीय सुरक्षाकर्मी के भरोसे थी करोड़ों की परियोजना
घटना के बाद निर्माणाधीन मॉल की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। जानकारी के अनुसार, करोड़ों रुपये की इस परियोजना की सुरक्षा केवल 75 वर्षीय एक बुजुर्ग सुरक्षाकर्मी के भरोसे थी।मॉल परिसर में पर्याप्त सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे। दोनों ओर के गेट खुले थे और कोई भी बिना रोक-टोक अंदर प्रवेश कर सकता था। घटना वाली रात निर्माण कार्य भी बंद था, फिर भी आरोपियों को रोकने या उनकी गतिविधियों पर नजर रखने की कोशिश नहीं की गई।
‘अगर सुरक्षा होती, तो बेटी आज जिंदा होती’
पूरे घटनाक्रम के बाद झुग्गी बस्ती के लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिला। रविवार तड़के गुस्साए लोगों ने सुरक्षाकर्मी की पिटाई भी कर दी। लोगों का कहना था कि यदि सुरक्षाकर्मी बच्ची की चीख सुनते ही सक्रिय हो जाता या आरोपियों से पूछताछ करता, तो शायद यह दर्दनाक घटना टाली जा सकती थी।पीड़ित परिवार भी बार-बार यही सवाल उठा रहा है कि अगर किसी ने समय रहते जिम्मेदारी निभाई होती, तो आज उनकी बेटी उनके बीच होती।
बेजुबान ने निभाया इंसानियत का सबसे बड़ा फर्ज
इस घटना ने लोगों को भावुक कर दिया है। जिस कुत्ते को परिवार कभी-कभार रोटी खिलाता था, उसी ने संकट की घड़ी में उनका साथ नहीं छोड़ा। परिवार का कहना है कि शायद उसने उसी अपनापन का कर्ज उतारा।सोशल मीडिया पर भी इस घटना को लेकर लोग भावुक प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि जहां इंसान अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा, वहीं एक बेजुबान ने संवेदनशीलता, वफादारी और इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल पेश कर दी।
जांच जारी, इंसाफ की उम्मीद
फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है। साथ ही निर्माणाधीन मॉल की सुरक्षा व्यवस्था और सुरक्षाकर्मी की भूमिका की भी जांच की जा रही है।इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा व्यवस्था कब मजबूत होगी, ताकि भविष्य में किसी मासूम की चीख यूं अनसुनी न रह जाए। वहीं, एक बेजुबान कुत्ते की वफादारी ने यह संदेश भी दे दिया कि संवेदनाएं केवल शब्दों से नहीं, कर्मों से पहचानी जाती हैं।
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