महाराष्ट्र में सरकारी छात्रावासों को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने ऐसा खुलासा किया है जिसने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में छह ऐसे ‘घोस्ट हॉस्टल’ (सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में संचालित छात्रावास) पाए गए, जहां वर्षों से कोई छात्र नहीं रह रहा था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें लगातार सरकारी फंड मिलता रहा। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन हॉस्टलों को लगातार चार वर्षों तक कुल 1.62 करोड़ रुपये की सरकारी सहायता जारी की गई।10 जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में पेश की गई कंप्लायंस ऑडिट रिपोर्ट-2024 में पिछड़े वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए संचालित सरकारी एवं सहायता प्राप्त छात्रावासों की व्यवस्था में कई गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार यह मामला केवल फर्जी फंडिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्र सुविधाओं, वित्तीय प्रबंधन, सुरक्षा, स्वच्छता और प्रशासनिक निगरानी की व्यापक विफलता को भी सामने लाता है।
कागजों में छात्र, जमीनी हकीकत में वीरानी
CAG की जांच के दौरान कई ऐसे छात्रावास मिले जिनकी इमारतें जर्जर थीं, कमरों में धूल जमी हुई थी और बिस्तर लंबे समय से खाली पड़े थे। इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में इन हॉस्टलों में छात्र रह रहे थे और नियमित खर्च भी दिखाया जा रहा था।रिपोर्ट के अनुसार सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग ने चार वर्षों तक ऐसे छह संस्थानों को सरकारी धन जारी रखा, जो वास्तव में संचालित ही नहीं हो रहे थे। CAG ने इसे सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला बताया है।
जालना का मोदीखान हॉस्टल बना सबसे बड़ा उदाहरण
ऑडिट रिपोर्ट में जालना जिले के मोदीखान हॉस्टल का विशेष उल्लेख किया गया है। जांच के दौरान यह हॉस्टल पूरी तरह बंद और जर्जर मिला। वहां किसी छात्र के रहने के कोई संकेत नहीं थे, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में 38 छात्र और एक अधीक्षक तैनात दिखाए गए थे।और भी हैरानी की बात यह रही कि इस हॉस्टल को चार वर्षों तक 18 लाख रुपये मानदेय के रूप में जारी किए गए। इसी तरह जाफराबाद स्थित एक छात्रावास में भी 24 छात्रों की क्षमता होने के बावजूद कमरे खाली मिले और बिस्तरों पर धूल जमी थी। इसके अलावा जालना के चार अन्य तथा बुलढाणा और लातूर के एक-एक हॉस्टल भी ‘घोस्ट हॉस्टल’ के रूप में चिन्हित किए गए।

करोड़ों का खर्च, फिर भी नहीं मिली बुनियादी सुविधाएं
CAG रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में मार्च 2024 तक 443 सरकारी और 2,388 सहायता प्राप्त छात्रावास संचालित थे, जिनमें करीब 1.62 लाख छात्र-छात्राएं रह रहे थे। ऑडिट अवधि के दौरान इन छात्रावासों पर 2,321 करोड़ रुपये खर्च किए गए।इसके बावजूद कई छात्रावासों में डाइनिंग हॉल, पुस्तकालय, कंप्यूटर लैब, सीसीटीवी कैमरे, बिजली बैकअप, समाचार पत्र और टेलीविजन जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं। कई जगह नियमित स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था नहीं मिली, जबकि चार छात्रावासों में छात्रों को टेबल-कुर्सी के अभाव में जमीन पर बैठकर भोजन करना पड़ता था।
दिव्यांग छात्रों के अधिकारों की भी अनदेखी
रिपोर्ट में दिव्यांग छात्रों की सुविधाओं को लेकर भी गंभीर लापरवाही सामने आई। अहिल्यानगर, धाराशिव, जालना और नागपुर के कुछ छात्रावासों में दिव्यांग छात्रों को नियमों के विपरीत ऊपरी मंजिलों पर कमरे आवंटित किए गए, जबकि नियमानुसार उन्हें भूतल पर आवास मिलना चाहिए था।CAG ने इसे दिव्यांग अधिकारों से जुड़े प्रावधानों का उल्लंघन माना है।
बायोमेट्रिक सिस्टम भी साबित हुआ फेल
सरकार ने छात्रों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए 280 सरकारी छात्रावासों में बायोमेट्रिक मशीनें लगाई थीं, लेकिन ऑडिट में पता चला कि इनमें से केवल 46 मशीनें ही चालू हालत में थीं। बाकी अधिकांश मशीनें या तो खराब थीं या उनका उपयोग नहीं किया जा रहा था।रिपोर्ट में साफ-सफाई की खराब स्थिति, घटिया भोजन, स्वच्छ पेयजल की कमी और खाद्यान्न का अनिवार्य बफर स्टॉक न रखने जैसी कमियों का भी उल्लेख किया गया है।
56 करोड़ रुपये का बजट खर्च ही नहीं हुआ
CAG ने वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023-24 में सरकारी छात्रावासों के लिए 487 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया था, लेकिन उसमें से 56.65 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए गए।यानी जहां एक ओर कई छात्र बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर उपलब्ध बजट का पूरा उपयोग भी नहीं किया गया।

हजारों छात्र आज भी हॉस्टल से वंचित
राज्य सरकार की योजना थी कि प्रत्येक तालुका में कम से कम एक सरकारी छात्रावास स्थापित किया जाए, लेकिन यह लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो सका। परिणामस्वरूप 117 तालुकाओं के लगभग 8,930 छात्र छात्रावास सुविधा से वंचित रह गए।रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 49 सरकारी हॉस्टल बिना अधीक्षक के संचालित हो रहे थे, जबकि पांच छात्राओं के छात्रावासों में पुरुष अधीक्षकों को प्रभारी बना दिया गया था, जिसे प्रशासनिक दृष्टि से गंभीर चूक माना गया है।
सरकारी सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
CAG की रिपोर्ट ने महाराष्ट्र के छात्रावास तंत्र की निगरानी, जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि जहां एक ओर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, वहीं दूसरी ओर छात्रों को मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिल सकीं और कई स्थानों पर ऐसे छात्रावासों को भी फंड मिलता रहा जो केवल सरकारी फाइलों में ही मौजूद थे।अब सबकी नजर इस बात पर है कि रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्षों के बाद राज्य सरकार जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई करती है और भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
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