समिट बिल्डिंग का काला सच: FBI अफसर बनकर विदेशी बुजुर्गों से करोड़ों की ठगी, 100+ हिरासत में

Editorial
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लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक ऐसा साइबर फ्रॉड सामने आया है जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। शहर की चर्चित समिट बिल्डिंग में चल रहे एक फर्जी कॉल सेंटर का पुलिस ने भंडाफोड़ किया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह गिरोह अमेरिकी नागरिकों, खासकर बुजुर्गों और महिलाओं को अपना निशाना बनाकर 250 करोड़ रुपये से अधिक की साइबर ठगी कर चुका है।पुलिस ने मंगलवार देर रात छापा मारकर बड़ी कार्रवाई की। इस दौरान 100 से अधिक युवक-युवतियों को हिरासत में लिया गया, जबकि ऑपरेशन मैनेजर समेत कई लोगों से लगातार पूछताछ की जा रही है। पुलिस का मानना है कि यह सिर्फ एक कॉल सेंटर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध का बड़ा नेटवर्क है, जिसकी जड़ें भारत से लेकर अमेरिका तक फैली हुई हैं।

‘Soleris Solution’ के नाम पर चल रहा था फर्जी कारोबार

जांच में पता चला कि जनवरी 2025 में ‘सोलेरिस सॉल्यूशन’ के नाम से समिट बिल्डिंग में कॉल सेंटर खोला गया था। बाहर से यह पूरी तरह एक वैध कंपनी की तरह दिखाई देता था, लेकिन अंदर बैठकर कर्मचारी विदेशी नागरिकों को ठगने का काम करते थे।पुलिस के अनुसार, गिरोह ने अमेरिकी कंपनियों के टोल-फ्री नंबरों की हूबहू नकली वेबसाइट और नंबर तैयार कर इंटरनेट पर डाल दिए थे। जैसे ही कोई अमेरिकी नागरिक किसी कंपनी का नंबर खोजकर कॉल करता, उसकी कॉल सीधे लखनऊ स्थित इस कॉल सेंटर में ट्रांसफर हो जाती थी।यहीं से शुरू होता था करोड़ों रुपये की ठगी का खेल।

FBI अधिकारी बनकर देते थे जेल भेजने की धमकी

गिरोह के सदस्य खुद को अमेरिकी जांच एजेंसी FBI का अधिकारी बताते थे। कॉल रिसीव करने के बाद वे सामने वाले व्यक्ति को डराते कि उसका नाम पोर्नोग्राफी, मनी लॉन्ड्रिंग या किसी गंभीर अपराध में सामने आया है।इसके बाद गिरफ्तारी, जेल और भारी जुर्माने का डर दिखाकर लोगों से लाखों डॉलर वसूल लिए जाते थे।पुलिस के अनुसार, गिरोह विशेष रूप से विदेशी बुजुर्गों और अकेली महिलाओं को निशाना बनाता था, क्योंकि ऐसे लोग जल्दी घबरा जाते थे और ठगी का शिकार बन जाते थे।

अंग्रेजी अनिवार्य, 40 हजार तक मिलती थी सैलरी

पूछताछ में सामने आया है कि कॉल सेंटर में नौकरी के लिए अंग्रेजी बोलना अनिवार्य था। कर्मचारियों को विदेशी लहजे में बात करने की ट्रेनिंग दी जाती थी ताकि सामने वाले को किसी तरह का शक न हो।टेली कॉलर्स को हर महीने 30 से 40 हजार रुपये तक वेतन दिया जाता था। इसके अलावा सफल ठगी पर अलग से इंसेंटिव भी मिलने की बात सामने आई है।ठगी को अंजाम देने के लिए गिरोह VOIP (Voice Over Internet Protocol) तकनीक का इस्तेमाल करता था, जिससे कॉल अमेरिका की लगती थी जबकि ऑपरेशन लखनऊ से चल रहा था।

अमेरिका से मिलता था पूरा ‘स्क्रिप्ट’ और निर्देश

पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह अकेले काम नहीं कर रहा था। इसके तार अमेरिका में बैठे साइबर अपराधियों से भी जुड़े हैं।विदेश में मौजूद सहयोगी कॉलर्स को बताते थे कि किस तरह बातचीत करनी है, कब डराना है और किस तरीके से पीड़ित से पैसे निकलवाने हैं।यानी पूरा ऑपरेशन एक संगठित अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क के जरिए संचालित किया जा रहा था।

पुलिस पहुंची तो रोने लगीं कई युवतियां

मंगलवार देर रात जब पुलिस टीम ने कॉल सेंटर पर छापा मारा तो अंदर अफरा-तफरी मच गई।ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार शुरुआत में पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करते रहे। वहीं, कई महिला कर्मचारी पुलिस को देखकर रोने लगीं। स्थिति को संभालने के लिए अतिरिक्त महिला पुलिस बल बुलाना पड़ा।पूछताछ के दौरान दोनों मैनेजरों ने गिरोह के सरगना और कई अन्य अहम लोगों के नाम भी बताए हैं। पुलिस अब पूरे नेटवर्क की तलाश में जुटी है।

24 घंटे पुलिस रहती थी, फिर भी नहीं लगी भनक

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस समिट बिल्डिंग में यह फर्जी कॉल सेंटर चल रहा था, वहीं पुलिस चौकी भी मौजूद है।बिल्डिंग में हर समय पुलिस की आवाजाही रहती है और अक्सर अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात रहता है। इसके बावजूद महीनों तक करोड़ों रुपये की साइबर ठगी का धंधा चलता रहा और किसी को भनक तक नहीं लगी।इसी वजह से अब पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

डिजिटल सबूतों की होगी फोरेंसिक जांच

छापेमारी के दौरान पुलिस ने बड़ी संख्या में कंप्यूटर, लैपटॉप, हार्ड डिस्क, मोबाइल फोन, सर्वर, हेडसेट और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद किए हैं।इन सभी डिजिटल उपकरणों को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा जाएगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि गिरोह ने अब तक कितने लोगों को ठगा, पैसे किन खातों में भेजे गए और पूरे नेटवर्क में कौन-कौन शामिल है।

बसों में भरकर मेडिकल के लिए भेजे गए आरोपी

पूरे दिन समिट बिल्डिंग पुलिस छावनी बनी रही। पुलिस मुख्यालय से भी वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और घंटों तक जांच चलती रही।बिल्डिंग को खाली कराकर हिरासत में लिए गए सभी युवक-युवतियों को बसों में बैठाकर मेडिकल परीक्षण के लिए भेजा गया। इसके बाद उनसे अलग-अलग पूछताछ शुरू की गई।

पूरे नेटवर्क तक पहुंचने की तैयारी में पुलिस

विभूतिखंड थाने में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई केवल शुरुआत है।अब जांच इस बात पर केंद्रित है कि इस गिरोह का असली सरगना कौन है, विदेशों में बैठे इसके साथी कौन हैं, ठगी के पैसे किस माध्यम से भारत और अन्य देशों में पहुंचाए गए और क्या देश के अन्य शहरों में भी ऐसे कॉल सेंटर संचालित किए जा रहे हैं।अगर शुरुआती जांच सही साबित होती है, तो यह उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड मामलों में से एक माना जाएगा। आने वाले दिनों में इस नेटवर्क से जुड़े कई और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

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