वाराणसी में नशा मुक्ति के नाम पर चल रहे कथित खेल ने स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले में 17 ऐसे नशा मुक्ति केंद्रों की पहचान हुई है जो बिना मान्यता और तय मानकों के संचालित हो रहे हैं। जांच में सामने आया है कि इन केंद्रों में मरीजों को भर्ती करने से लेकर इलाज तक की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हैं। आरोप हैं कि मानसिक रोगियों और नशे की लत से जूझ रहे लोगों को अमानवीय परिस्थितियों में रखा जा रहा है। कई केंद्रों में मरीजों को जंजीरों से बांधने, मारपीट करने और जबरन रोककर रखने जैसी शिकायतें भी सामने आई हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन केंद्रों में कई मरीजों को बिना उचित मेडिकल जांच के भर्ती किया जा रहा है। इतना ही नहीं, मानसिक रोग विशेषज्ञों की अनुपस्थिति में नारकोटिक और अन्य गंभीर दवाएं भी दी जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का इलाज मरीजों की मानसिक और शारीरिक स्थिति को और खराब कर सकता है।

हाल ही में सारनाथ स्थित एक नशा मुक्ति केंद्र में बीएचयू के छात्र आदित्य गोस्वामी की संदिग्ध मौत ने पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया। परिजनों ने छात्र की पीट-पीटकर हत्या किए जाने का आरोप लगाया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चोटों के निशान मिलने के बाद केंद्र संचालक समेत कई लोगों की गिरफ्तारी हुई। इस घटना ने नशा मुक्ति केंद्रों के भीतर की भयावह तस्वीर को उजागर कर दिया। जांच में यह भी सामने आया है कि जिले में केवल दो नशा मुक्ति केंद्र ही ऐसे हैं जिन्हें भारत सरकार और राज्य सरकार की मान्यता प्राप्त है। बाकी 17 केंद्रों को मद्यनिषेध एवं समाजोत्थान विभाग ने अवैध घोषित करते हुए नोटिस जारी किए हैं। हालांकि नोटिस जारी होने के महीनों बाद भी इन केंद्रों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।स्थानीय लोगों और प्रभावित परिवारों का आरोप है कि कुछ केंद्र आर्थिक लाभ के लिए मरीजों को लंबे समय तक भर्ती रख रहे हैं। परिवारों से मनमाना शुल्क वसूला जाता है और मरीजों को बाहर निकलने की अनुमति भी नहीं दी जाती। कई मामलों में मरीजों के साथ दुर्व्यवहार और हिंसा की शिकायतें भी मिली हैं।
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम-2017 के अनुसार किसी भी नशा मुक्ति केंद्र को स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी में पंजीकृत होना आवश्यक है। इसके अलावा प्रशिक्षित डॉक्टर, मनोचिकित्सक, इमरजेंसी सुविधाएं, डिटॉक्सिफिकेशन प्रोटोकॉल और निर्धारित स्टाफ की उपलब्धता भी जरूरी है। लेकिन जांच में सामने आया है कि अधिकांश केंद्र इन मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं।mइसी तरह एनडीपीएस एक्ट के तहत नियंत्रित दवाओं का इस्तेमाल भी कड़े नियमों के अधीन होता है। यदि बिना मानसिक रोग विशेषज्ञ की निगरानी के मरीजों को नारकोटिक दवाएं दी जा रही हैं तो यह गंभीर कानूनी उल्लंघन माना जाएगा।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभागीय जांच में 17 केंद्र अवैध पाए जा चुके हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हो रही है। हजारों मरीजों की जिंदगी दांव पर लगी है और प्रशासनिक कार्रवाई अभी भी कागजों तक सीमित दिखाई दे रही है।
अधिकारी क्या बोले?

राकेश रोशन, मद्यनिषेध अधिकारी
“जिले में कुल 25 नशा मुक्ति केंद्र संचालित हैं। इनमें 17 केंद्र अवैध पाए गए हैं। जांच रिपोर्ट जिलाधिकारी को भेज दी गई है। पांच केंद्र अंडरग्राउंड हैं जिनकी तलाश की जा रही है। सात केंद्रों में करीब 300 मरीज भर्ती हैं, जबकि 17 केंद्रों में मरीजों की संख्या लगभग 1000 तक हो सकती है। ऐसे में मरीजों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट करना भी एक बड़ी चुनौती है।”

चंद्रेश द्विवेदी, ड्रग इंस्पेक्टर
“यदि बिना मानसिक रोग विशेषज्ञ की निगरानी के नारकोटिक दवाएं दी जा रही हैं तो यह बेहद गंभीर मामला है। इसकी जांच के लिए टीम गठित की जा रही है। दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”

डॉ. मुकेश कुमार, मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ), वाराणसी
“मानसिक चिकित्सालयों से मरीजों को बहलाकर नशा मुक्ति केंद्रों में ले जाने और बिना मानकों के भर्ती करने की शिकायतें मिली हैं। मामले की जांच के लिए कमेटी बनाई जा रही है। जल्द ही सभी केंद्रों की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।”
वाराणसी में अवैध नशा मुक्ति केंद्रों का यह नेटवर्क केवल नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं है, बल्कि मरीजों की जिंदगी और मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। जांच एजेंसियों और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर अब सैकड़ों परिवारों की नजरें टिकी हुई हैं।
or advertisement visit our office:http://3RD FLOOR, lekhraj market, bansal Complex, Lucknow, Uttar Pradesh 226016

