देरी मतलब खतरा’— स्ट्रोक को लेकर डॉक्टरों का बड़ा अलर्ट, हाई बीपी और डायबिटीज पर रखें सख्त नियंत्रण

Editorial
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रिपोर्ट: विजय गुप्ता

लखनऊ “अगर अचानक किसी व्यक्ति का चेहरा टेढ़ा हो जाए, एक हाथ या पैर काम करना बंद कर दे या बोलने में परेशानी होने लगे, तो एक पल भी इंतजार न करें… क्योंकि स्ट्रोक में हर मिनट की देरी जिंदगीभर की विकलांगता या मौत का कारण बन सकती है।” यह चेतावनी मेदांता हॉस्पिटल, लखनऊ में आयोजित स्ट्रोक जागरूकता कार्यक्रम के दौरान देश के वरिष्ठ न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी विशेषज्ञों ने दी।विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में हर साल करीब 18 से 20 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं, लेकिन समय पर पहचान और इलाज मिलने से हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है और स्थायी विकलांगता से भी बचा जा सकता है। डॉक्टरों ने साफ कहा कि स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें हर सेकंड की कीमत होती है।

‘FAST’ पहचानिए… जिंदगी बचाइए

कार्यक्रम में मौजूद डॉ. अनूप कुमार ठक्कर, डायरेक्टर न्यूरोलॉजी ने कहा कि स्ट्रोक की पहचान के लिए लोगों को FAST फॉर्मूले की जानकारी होना बेहद जरूरी है।

  • F (Face): चेहरा टेढ़ा होना
  • A (Arm): हाथ या पैर में अचानक कमजोरी
  • S (Speech): बोलने में कठिनाई या शब्द स्पष्ट न निकलना
  • T (Time): बिना देर किए तुरंत अस्पताल पहुंचना

उन्होंने कहा कि यदि इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे तो मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। थोड़ी-सी देरी भी मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है।

सिर्फ साढ़े चार घंटे… यही है गोल्डन टाइम

डॉ. अनूप कुमार ठक्कर ने बताया कि स्ट्रोक के इलाज में शुरुआती साढ़े चार घंटे (Golden Hour Window) सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान यदि मरीज को आईवी थ्रोम्बोलाइसिस जैसी आधुनिक चिकित्सा मिल जाए तो मस्तिष्क की क्षति को काफी हद तक रोका जा सकता है और मरीज सामान्य जीवन की ओर लौट सकता है।उन्होंने बताया कि मेदांता लखनऊ में आधुनिक तकनीकों की मदद से जटिल मामलों में भी मरीजों का इलाज किया जा रहा है और गंभीर मरीजों को बेहतर न्यूरोलॉजिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

हर जिला अस्पताल में होनी चाहिए स्ट्रोक की सुविधा

विशेषज्ञों ने जोर देते हुए कहा कि केवल बड़े शहरों तक इलाज सीमित नहीं रहना चाहिए। हर जिला अस्पताल में सीटी स्कैन, ब्लड प्रेशर जांच, ब्लड शुगर जांच और आईवी थ्रोम्बोलाइसिस जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।उन्होंने ‘ड्रिप एंड शिप’ मॉडल को भी प्रभावी बताया, जिसके तहत मरीज को प्राथमिक इलाज देकर तुरंत सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल भेजा जा सकता है। इससे इलाज में होने वाली देरी कम होगी और मरीज की जान बचने की संभावना बढ़ेगी।

‘हर सेकंड मायने रखता है’— मेडिकल डायरेक्टर की अपील

मेदांता हॉस्पिटल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. राकेश कपूर ने कहा कि स्ट्रोक ऐसी मेडिकल इमरजेंसी है जिसमें हर सेकंड मरीज के भविष्य का फैसला करता है।उन्होंने कहा कि समय पर इलाज मिलने से न केवल मरीज की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसे जीवनभर की विकलांगता से भी बचाया जा सकता है। स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, नियमित स्वास्थ्य जांच कराना और शुरुआती लक्षणों को पहचानना ही स्ट्रोक के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है।

हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज सबसे बड़े खतरे

विशेषज्ञों ने बताया कि उच्च रक्तचाप (हाई बीपी), मधुमेह, धूम्रपान, मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली स्ट्रोक के सबसे बड़े जोखिम कारक हैं। यदि इन पर समय रहते नियंत्रण कर लिया जाए तो स्ट्रोक के हजारों मामलों को रोका जा सकता है।डॉक्टरों ने बताया कि कई विकसित देशों में केवल ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने से ही स्ट्रोक के मामलों में लगभग 45 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। इससे हृदय रोगों का खतरा भी काफी कम हो जाता है।

इलाज के बाद पुनर्वास भी उतना ही जरूरी

विशेषज्ञों ने कहा कि स्ट्रोक का इलाज केवल अस्पताल में भर्ती होने तक सीमित नहीं है। मरीज के पूरी तरह सामान्य जीवन में लौटने के लिए फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता बेहद महत्वपूर्ण है।उन्होंने सुझाव दिया कि देशभर में विशेष पुनर्वास केंद्र विकसित किए जाएं, जहां स्ट्रोक से उबर रहे मरीजों को एक ही स्थान पर सभी जरूरी सेवाएं मिल सकें। इसके लिए मेडिकल संस्थानों और तकनीकी संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने की भी आवश्यकता बताई गई।

जागरूकता ही सबसे बड़ी दवा

कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. रवि शंकर (डायरेक्टर न्यूरोसर्जरी), डॉ. रतीश जुयाल (डायरेक्टर न्यूरोलॉजी), डॉ. कमलेश सिंह भैसोरा (डायरेक्टर न्यूरोसर्जरी) और डॉ. रोहित अग्रवाल (डायरेक्टर इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी) ने भी लोगों से नियमित स्वास्थ्य जांच कराने, संतुलित आहार लेने, व्यायाम करने, धूम्रपान से दूरी बनाने और ब्लड प्रेशर व ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने की अपील की।विशेषज्ञों ने कहा कि स्ट्रोक केवल एक व्यक्ति की बीमारी नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। यह दुनिया में विकलांगता का दूसरा सबसे बड़ा कारण है, इसलिए जागरूकता बढ़ाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

‘हर जीवन की रक्षा, हर सेकंड की कीमत’

कार्यक्रम का समापन एक मजबूत संदेश के साथ हुआ— “हर जीवन की रक्षा, हर सेकंड की कीमत।” डॉक्टरों ने लोगों से अपील की कि यदि किसी व्यक्ति में स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण दिखाई दें तो घरेलू उपचार या इंतजार करने के बजाय तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचें। विशेषज्ञों का कहना है कि स्ट्रोक में समय पर लिया गया एक सही फैसला किसी व्यक्ति की जान बचा सकता है, उसे जीवनभर की विकलांगता से बचा सकता है और उसके परिवार को बड़ी मुश्किल से उबार सकता है।

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