उत्तर प्रदेश में पहली बार लैब में तैयार सेल्स से यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर का सफल इलाज, अपोलोमेडिक्स ने रचा इतिहास

Editorial
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लखनऊ उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। लखनऊ स्थित अपोलोमेडिक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल ने पहली बार लैब में तैयार किए गए सेल्स (Cell-Based Therapy) की मदद से यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर (Urethral Stricture) का सफल इलाज कर चिकित्सा जगत में नया इतिहास रच दिया है। यह आधुनिक तकनीक न केवल कम चीरफाड़ वाली है, बल्कि मरीज के लिए कम दर्द, तेज रिकवरी और बेहतर परिणाम देने वाली भी मानी जा रही है।इस अत्याधुनिक प्रक्रिया के जरिए 30 वर्षीय मरीज का सफल ऑपरेशन किया गया और सबसे खास बात यह रही कि मरीज को अगले ही दिन अस्पताल से छुट्टी (डिस्चार्ज) दे दी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में यूरोलॉजी के क्षेत्र में उपचार की दिशा बदल सकती है।

उत्तर प्रदेश में पहली बार हुआ सेल-आधारित उपचार

अपोलोमेडिक्स अस्पताल के डायरेक्टर एवं हेड, यूरोलॉजी और किडनी ट्रांसप्लांट विभाग, डॉ. मयंक मोहन अग्रवाल, एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. वेद भास्कर और डॉ. शैलेंद्र गुप्ता की विशेषज्ञ टीम ने इस जटिल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।मरीज तीन सेंटीमीटर लंबी बुलबर यूरिथ्रा स्ट्रिक्चर से पीड़ित था। पारंपरिक इलाज की तुलना में इस नई तकनीक को अपनाया गया, जिसमें टिश्यू इंजीनियरिंग और सेल थेरेपी का उपयोग किया गया।

क्या होती है यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर की समस्या?

यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर वह स्थिति होती है, जिसमें पेशाब की नली (यूरेथ्रा) सिकुड़ जाती है। इसके कारण मरीज को पेशाब करने में कठिनाई, बार-बार संक्रमण, दर्द और कई अन्य गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या संक्रमण, चोट, दुर्घटना या पहले किए गए किसी चिकित्सकीय उपचार के कारण भी हो सकती है।

पारंपरिक इलाज में होती थी बड़ी परेशानी

अब तक इस बीमारी के इलाज के लिए सबसे सामान्य विकल्प बक्कल म्यूकोसा ग्राफ्ट यूरेथ्रोप्लास्टी (BMGU) माना जाता था।इस प्रक्रिया में मरीज के मुंह के अंदर से लगभग 5 से 6 सेंटीमीटर टिशू निकालना पड़ता है। इसके बाद कई सप्ताह तक मरीज को खाने-पीने में परेशानी होती है और गर्म या मसालेदार भोजन से परहेज करना पड़ता है।दूसरा विकल्प ऑप्टिकल इंटरनल यूरेथ्रोटॉमी (OIU) है, लेकिन इसमें बीमारी दोबारा होने का खतरा अपेक्षाकृत अधिक रहता है। कई मरीजों को लंबे समय तक स्वयं कैथेटर लगाने की आवश्यकता भी पड़ती है।

सिर्फ छोटे से टिशू से तैयार किए गए 50 लाख सेल्स

इस आधुनिक तकनीक के तहत मरीज के गाल के अंदर से केवल 10 मिलीमीटर लंबा और 5 मिलीमीटर चौड़ा छोटा सा ऊतक (टिशू) लिया गया।इस प्रक्रिया में कोई बड़ा घाव नहीं हुआ और मरीज पहले दिन से सामान्य भोजन करने में सक्षम रहा।इसके बाद इस टिशू को हवाई मार्ग से पुणे की विशेष लैब भेजा गया, जहां लगभग दो सप्ताह तक अत्याधुनिक टिश्यू इंजीनियरिंग तकनीक के माध्यम से करीब 50 लाख सेल्स तैयार किए गए।इन सेल्स की उपयोग अवधि केवल 72 घंटे होती है। इसलिए इन्हें विशेष कोल्ड-चेन व्यवस्था के साथ सुरक्षित तरीके से वापस लखनऊ लाया गया।

दूरबीन तकनीक से किया गया सफल ऑपरेशन

तैयार किए गए सेल्स को लिक्विड थ्रोम्बिन के साथ मिलाकर एंडोस्कोपिक (दूरबीन) तकनीक की मदद से सिकुड़ी हुई पेशाब की नली पर लगाया गया।इससे पहले प्रभावित हिस्से को विशेष तकनीक से तैयार किया गया ताकि सेल्स वहां मजबूती से चिपक सकें।ये सेल्स शरीर की प्राकृतिक उपचार प्रक्रिया को तेज करते हैं और दोबारा निशान बनने या नली के फिर से सिकुड़ने की संभावना को काफी हद तक कम कर देते हैं।

सिर्फ 15 से 20 मिनट में पूरी हुई प्रक्रिया

डॉ. मयंक मोहन अग्रवाल के अनुसार इस नई तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शरीर पर कोई बड़ा चीरा नहीं लगाया जाता।

उन्होंने बताया कि—

  • पूरी प्रक्रिया केवल 15 से 20 मिनट में पूरी हो जाती है।
  • मरीज के मुंह से केवल बेहद छोटा टिशू लिया जाता है।
  • मरीज पहले दिन से सामान्य भोजन कर सकता है।
  • जहां पारंपरिक सर्जरी में 2–3 सप्ताह तक कैथेटर रखना पड़ता है, वहीं इस तकनीक में सिर्फ एक सप्ताह बाद कैथेटर हटाया जा सकता है।
  • मरीज की रिकवरी तेजी से होती है और अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि भी कम हो जाती है।

अगले ही दिन अस्पताल से मिली छुट्टी

ऑपरेशन के बाद मरीज की स्थिति पूरी तरह स्थिर रही और उसे अगले ही दिन अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।डॉक्टरों के अनुसार इस तकनीक से मरीज को कम दर्द, कम असुविधा और जल्दी सामान्य जीवन में लौटने का अवसर मिलता है।

70 से 80 प्रतिशत तक सफलता दर

एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. वेद भास्कर ने बताया कि यह तकनीक हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होती, लेकिन जिन मरीजों का चयन सही तरीके से किया जाता है, उनमें इसकी सफलता दर 70 से 80 प्रतिशत तक है।यह परिणाम पारंपरिक ओपन सर्जरी के बराबर माने जाते हैं, जबकि इसमें मरीज को कहीं कम तकलीफ होती है।

कम चीरफाड़ वाली चिकित्सा की दिशा में बड़ी उपलब्धि

अपोलोमेडिक्स अस्पताल के एमडी एवं सीईओ डॉ. मयंक सोमानी ने कहा कि अस्पताल का उद्देश्य मरीजों तक विश्वस्तरीय और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है।उन्होंने कहा कि लैब में तैयार सेल्स पर आधारित यह तकनीक भविष्य में कम चीरफाड़ वाली सर्जरी (Minimally Invasive Surgery) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित होगी।

उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए मील का पत्थर

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि केवल एक सफल ऑपरेशन नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में एडवांस्ड रीजेनरेटिव मेडिसिन और सेल थेरेपी के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत है।यदि भविष्य में यह तकनीक व्यापक स्तर पर उपलब्ध होती है, तो हजारों मरीजों को पारंपरिक जटिल सर्जरी से राहत मिल सकती है।लखनऊ के अपोलोमेडिक्स अस्पताल द्वारा लैब में तैयार 50 लाख सेल्स की मदद से यूरिथ्रल स्ट्रिक्चर का सफल इलाज उत्तर प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है। कम चीरफाड़, तेज रिकवरी और बेहतर सफलता दर वाली यह तकनीक भविष्य में यूरोलॉजी के उपचार को नई दिशा दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि राज्य को आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने वाली साबित हो सकती है।

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