टेलीविजन और हिंदी सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्री किटू गिडवानी ने बॉलीवुड और भारतीय एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ बदलते किरदारों को लेकर खुलकर अपनी राय रखी है। चार दशक से ज्यादा लंबे करियर में अलग-अलग तरह के किरदार निभा चुकीं किटू का कहना है कि उम्रदराज महिला कलाकारों के लिए स्क्रीन पर आज भी सीमित भूमिकाएं लिखी जाती हैं। अभिनेत्री के मुताबिक, महिलाएं सिर्फ मां, दादी या मौसी के किरदारों तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि उन्हें भी प्यार, ताकत, कॉमेडी और एक्शन जैसे अलग-अलग रंगों वाले किरदार मिलने चाहिए।किटू गिडवानी ने एक इंटरव्यू में भारतीय फिल्म और टेलीविजन इंडस्ट्री के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कलाकारों की रॉयल्टी, काम के अधिकार और उम्र बढ़ने के साथ मिलने वाले अवसरों को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

उम्र बढ़ने के साथ क्यों बदल जाते हैं महिला कलाकारों के रोल?
किटू गिडवानी का कहना है कि भारतीय मनोरंजन जगत में महिलाओं के किरदारों को उम्र के आधार पर देखने की एक तय सोच बनी हुई है। उनके मुताबिक, जैसे-जैसे अभिनेत्री की उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे उसके किरदार भी सीमित होते चले जाते हैं।उन्होंने उम्रदराज महिलाओं के लिए लिखे जाने वाले किरदारों पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे सिर्फ सामान्य मां या मौसी का रोल नहीं करना चाहतीं। उनके अनुसार, अनुभवी अभिनेत्रियों में अभिनय की क्षमता और अनुभव दोनों होते हैं, इसलिए उन्हें ऐसे किरदार दिए जाने चाहिए जिनमें कहानी को आगे बढ़ाने की ताकत हो।किटू चाहती हैं कि उम्रदराज महिला कलाकारों को भी ऐसे रोल मिलें, जिनमें प्यार, पावर, कॉमेडी, ड्रामा और एक्शन जैसे अलग-अलग पहलू नजर आएं। उनका मानना है कि उम्र किसी कलाकार की रचनात्मक क्षमता को सीमित करने का आधार नहीं होनी चाहिए।
‘दादी और मौसी का किरदार नहीं करना चाहती’
किटू गिडवानी ने महिलाओं को स्क्रीन पर दिखाने के तरीके पर खास तौर पर बात की। उन्होंने कहा कि टेलीविजन धारावाहिकों में कई बार महिलाओं की उम्र को लेकर अजीब तरह की कहानी दिखाई जाती है।अभिनेत्री ने डेली सोप्स का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे ही किसी महिला का किरदार 30 साल का होता है, उसे दादी बना दिया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसी किरदार के चेहरे पर उम्र बढ़ने के कोई स्पष्ट संकेत नहीं हैं, तो उसे अचानक बुजुर्ग भूमिका में क्यों दिखाया जाता है।किटू के इस बयान ने भारतीय टीवी और फिल्मों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर एक पुरानी बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। खासतौर पर महिला कलाकारों के लिए उम्र के साथ कम होते अवसरों पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।

बॉलीवुड को लेकर भी किटू ने रखी बेबाक राय
किटू गिडवानी ने सिर्फ महिला कलाकारों के किरदारों पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि उन्होंने पूरी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के काम करने के तरीके पर अपनी राय रखी।अभिनेत्री ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को लेकर कहा कि यह कई अस्पष्ट नियमों के आधार पर चलती है। उन्होंने इसकी तुलना पश्चिमी मनोरंजन उद्योग से करते हुए कलाकारों के अधिकारों और रॉयल्टी व्यवस्था का मुद्दा उठाया।किटू के मुताबिक, कलाकार कई वर्षों तक मेहनत करते हैं और फिल्मों तथा टेलीविजन प्रोजेक्ट्स को अपनी प्रतिभा देते हैं। ऐसे में उनके काम से भविष्य में मिलने वाले आर्थिक लाभ और रॉयल्टी की व्यवस्था को भी मजबूत होना चाहिए।उनका सवाल है कि किसी कलाकार को लंबे समय तक काम करने के बाद भी लगातार नए प्रोजेक्ट्स के लिए संघर्ष क्यों करना पड़े? अभिनेत्री का मानना है कि कलाकारों को उनके पुराने काम से भी उचित लाभ मिलना चाहिए।
रॉयल्टी को लेकर क्या बोलीं किटू?
किटू गिडवानी ने कलाकारों के लिए रॉयल्टी सिस्टम को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। उन्होंने पश्चिमी इंडस्ट्री में मौजूद कलाकार संगठनों और अधिकारों की व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि भारत में ऐसी मजबूत व्यवस्था की कमी महसूस होती है।अभिनेत्री के मुताबिक, कलाकारों को अपने काम का उचित आर्थिक लाभ लंबे समय तक मिलना चाहिए। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि चार दशक से ज्यादा समय तक काम करने के बावजूद कलाकारों को लगातार काम करते रहने की जरूरत पड़ती है।उनकी यह टिप्पणी खास तौर पर उन कलाकारों के लिए महत्वपूर्ण है, जो वर्षों तक फिल्मों और टीवी शो में काम करने के बाद भी आर्थिक सुरक्षा को लेकर चुनौतियों का सामना करते हैं।
चार दशक से ज्यादा लंबा है किटू गिडवानी का करियर
किटू गिडवानी का फिल्म और टेलीविजन करियर काफी लंबा रहा है। उन्होंने वर्ष 1984 में फिल्म ‘होली’ से सिनेमा की दुनिया में कदम रखा था। इसके बाद उन्होंने फिल्मों के साथ-साथ टेलीविजन पर भी अपनी अलग पहचान बनाई।वर्ष 1986 में दूरदर्शन पर प्रसारित टीवी सीरीज ‘एयर होस्टेस’ में उनके काम को काफी पहचान मिली। इसके बाद किटू ने अलग-अलग फिल्मों और टीवी प्रोजेक्ट्स में काम किया।उनकी फिल्मोग्राफी में ‘रुखमावती की हवेली’, ‘डांस ऑफ द विंड’, ‘अर्थ’, ‘फैशन’, ‘अभय’, ‘जाने तू या जाने ना’ और ‘देहम’ जैसी फिल्में शामिल हैं। अलग-अलग तरह के किरदारों के जरिए उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया है।
उम्र नहीं, किरदार की गहराई हो मायने
किटू गिडवानी की बातों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह उम्र के बजाय किरदार की गुणवत्ता पर जोर देती हैं। उनका कहना है कि अनुभवी महिला कलाकारों को केवल उम्र के आधार पर मां, दादी या मौसी जैसे किरदारों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।आज दर्शकों के बीच ऐसी कहानियों की मांग बढ़ रही है, जिनमें अलग-अलग उम्र के किरदारों को अपनी पूरी पहचान और कहानी मिलती है। ऐसे में अनुभवी अभिनेत्रियों के लिए भी मजबूत और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं लिखना इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा बदलाव हो सकता है।किटू की टिप्पणी इसी बदलाव की जरूरत की ओर इशारा करती है। उनका कहना है कि उम्रदराज महिला कलाकार भी रोमांस, कॉमेडी, एक्शन और पावरफुल ड्रामा का हिस्सा बन सकती हैं।
किटू की बेबाकी ने छेड़ी नई बहस
किटू गिडवानी का यह बयान सिर्फ उनके व्यक्तिगत अनुभव तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय मनोरंजन जगत में महिलाओं की बदलती भूमिका पर एक बड़ी बहस को जन्म देता है। एक तरफ फिल्मों और वेब सीरीज में मजबूत महिला किरदारों की संख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर उम्रदराज अभिनेत्रियों को मिलने वाले अवसरों को लेकर सवाल अब भी बने हुए हैं।किटू गिडवानी ने अपने लंबे अनुभव के आधार पर इस मुद्दे को सामने रखा है। उनकी बात का सार यही है कि कलाकार की उम्र उसके किरदार की सीमा तय नहीं करनी चाहिए। अगर कहानी और किरदार मजबूत हों तो अनुभवी अभिनेत्री भी पर्दे पर नई ऊर्जा और अलग प्रभाव पैदा कर सकती है।किटू गिडवानी का बयान ऐसे समय में आया है, जब भारतीय सिनेमा और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कंटेंट तेजी से बदल रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में उम्रदराज महिला कलाकारों के लिए किस तरह के नए और दमदार किरदार लिखे जाते हैं।
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