एक ही सत्र में बिल पास कराने का बढ़ा चलन, 18वीं लोकसभा में 53% विधेयक उसी सत्र में पारित; बहस पर उठे सवाल

Editorial
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नई दिल्ली संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। 18वीं लोकसभा में पेश किए जा रहे विधेयकों को उसी सत्र में पारित कराने का चलन तेजी से बढ़ा है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, 18वीं लोकसभा में अब तक पेश किए गए 64 विधेयकों में से 34 यानी करीब 53 फीसदी विधेयक उसी सत्र में लोकसभा और राज्यसभा से पारित हो चुके हैं। इस रफ्तार ने जहां सरकार के विधायी एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाने की तस्वीर पेश की है, वहीं विपक्ष और संसदीय प्रक्रिया से जुड़े विशेषज्ञों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा और समीक्षा हो पा रही है।

18वीं लोकसभा में तेजी से बढ़ी बिल पास होने की रफ्तार

आंकड़ों पर नजर डालें तो संसद में एक ही सत्र में विधेयक पारित होने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है। 16वीं लोकसभा के दौरान पेश किए गए 189 विधेयकों में से 63 यानी करीब 33 फीसदी विधेयक उसी सत्र में पारित हुए थे। 17वीं लोकसभा में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 62 फीसदी हो गया था, जब 190 में से 117 विधेयक उसी सत्र में पारित किए गए।18वीं लोकसभा में अब तक 64 विधेयक पेश किए गए हैं, जिनमें 34 विधेयक उसी सत्र में दोनों सदनों से पारित हो चुके हैं। यानी करीब आधे से अधिक विधेयकों को पेश किए जाने के बाद उसी सत्र में कानून बनाने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई।

2024 में धीमी शुरुआत, 2025 से बदला ट्रेंड

18वीं लोकसभा की शुरुआत में इस तरह की तेजी देखने को नहीं मिली थी। वर्ष 2024 के बजट और शीतकालीन सत्र में पेश किए गए किसी भी विधेयक को उसी सत्र में पारित नहीं किया गया था। हालांकि, 2025 से तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दी।2025 के बजट सत्र में पेश किए गए पांच विधेयकों में से तीन उसी सत्र में पारित हुए। मानसून सत्र में 13 में से आठ विधेयक और शीतकालीन सत्र में नौ में से सात विधेयक उसी सत्र में पारित कर दिए गए।इसके बाद 2026 में भी यह रफ्तार बनी रही। 2026 के बजट सत्र में पेश किए गए 10 विधेयकों में से पांच को उसी सत्र में मंजूरी मिली।

मानसून सत्र में सबसे ज्यादा तेजी

13 अगस्त  को समाप्त हुए संसद के मानसून सत्र में विधेयकों को जल्द पारित कराने का यह रुझान सबसे ज्यादा दिखाई दिया। इस सत्र में सरकार ने 12 विधेयक पेश किए, जिनमें से 11 विधेयक संसद से पारित हो गए। केवल भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026 लंबित रहा।खास बात यह रही कि पारित किए गए 11 विधेयकों में से छह ऐसे थे, जो सरकार के मूल विधायी एजेंडे में शामिल नहीं थे। वहीं पहले से सूचीबद्ध दो पुराने विधेयकों में से कोई भी पारित नहीं हो सका। इनमें विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 समिति के पास है, जबकि विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को विरोध के बाद संयुक्त समिति को भेजा गया।

कुछ विधेयक महज कुछ मिनट में पारित

पीआरएस के विश्लेषण के मुताबिक मानसून सत्र में कानून बनाने की प्रक्रिया की गति को लेकर सबसे बड़ा सवाल बहस के समय को लेकर है। इस दौरान नौ विधेयक ऐसे रहे, जिन पर किसी अन्य सांसद ने बोलने के बाद चर्चा नहीं की, जबकि सात विधेयकों को पारित होने में पांच मिनट या उससे भी कम समय लगा।यही वजह है कि संसद में विधेयकों पर विस्तृत चर्चा, विशेषज्ञों की राय और हितधारकों से परामर्श को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कानून बनने से पहले उसके संभावित प्रभावों का अध्ययन करने के लिए सांसदों को पर्याप्त समय मिलना संसदीय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

सांसदों को अध्ययन और चर्चा का कितना समय?

पीआरएस के अनुसार, विधेयक को पेश किए जाने और पारित होने के बीच समय कम होने से सांसदों को उसके प्रावधानों का विस्तार से अध्ययन करने और संबंधित हितधारकों से चर्चा करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता।संसदीय समितियां विधेयकों की विस्तृत जांच के लिए महत्वपूर्ण मंच मानी जाती हैं। समिति के स्तर पर विशेषज्ञों, संगठनों और प्रभावित पक्षों की राय सामने आ सकती है। लेकिन जब विधेयक तेजी से पारित होते हैं तो ऐसी विस्तृत समीक्षा की गुंजाइश कम हो सकती है।

हंगामे से संसद का कामकाज भी प्रभावित

दूसरी ओर संसद में लगातार होने वाले हंगामे ने भी विधायी कामकाज को प्रभावित किया है। 2026 के मानसून सत्र में लोकसभा में उपलब्ध समय का करीब 15 फीसदी, जबकि राज्यसभा में करीब 33 फीसदी ही कामकाज हो सका।लोकसभा में प्रश्नकाल भी काफी प्रभावित रहा। पूरे सत्र में प्रश्नकाल महज करीब नौ मिनट चला और 380 में से केवल दो मौखिक सवालों के जवाब दिए जा सके।ऐसे में एक तरफ विपक्ष संसद में चर्चा के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलने का मुद्दा उठाता है, वहीं सरकार की ओर से कई बार यह तर्क दिया जाता है कि हंगामे और व्यवधान के कारण सदन का कामकाज प्रभावित होता है।

तेज कानून निर्माण बनाम विस्तृत संसदीय बहस

एक ही सत्र में विधेयकों को पारित करने की बढ़ती प्रवृत्ति को केवल एकतरफा तरीके से देखना भी उचित नहीं होगा। सरकार के लिए जरूरी कानूनों को तेजी से लागू करना कई परिस्थितियों में आवश्यक हो सकता है। इससे नीतियों को लागू करने में देरी कम होती है और विधायी प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी की जा सकती है।लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानूनों की गुणवत्ता और उन पर पर्याप्त चर्चा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी कानून का प्रभाव लंबे समय तक आम नागरिकों, कारोबार, राज्यों और विभिन्न संस्थाओं पर पड़ सकता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने विधेयक कितनी जल्दी पारित हुए, बल्कि यह भी है कि उन पर कितनी सार्थक चर्चा हुई।

आम जनता से जुड़ा है मामला

संसद में बनने वाले कानून सीधे आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। ऐसे में विधेयकों की जल्दबाजी में मंजूरी और पर्याप्त संसदीय समीक्षा के बीच संतुलन जरूरी माना जाता है। 18वीं लोकसभा में सामने आए आंकड़ों ने इसी संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।अब देखना होगा कि आने वाले सत्रों में सरकार विधायी कामकाज की गति और विस्तृत संसदीय चर्चा के बीच किस तरह संतुलन बनाती है। साथ ही विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी कि वह व्यवधान के बजाय सदन में प्रभावी बहस और वैकल्पिक सुझावों के जरिए विधेयकों की समीक्षा में कितना योगदान देता है।

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