नई दिल्ली करीब 21 साल पुराना सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस एक बार फिर चर्चा में है। मामले में 22 आरोपियों के बरी होने के बाद अब सोहराबुद्दीन के छोटे भाई नयाबुद्दीन शेख ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के 7 मई 2026 के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें विशेष सीबीआई अदालत द्वारा सभी 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा गया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष कथित साजिश, अपहरण और फर्जी एनकाउंटर के आरोपों को पर्याप्त और ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं कर पाया।यह मामला वर्ष 2005 में सोहराबुद्दीन शेख की मुठभेड़ में मौत, उनकी पत्नी कौसर बी की कथित हत्या और बाद में उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की मौत से जुड़ा है। इस केस में समय के साथ जांच एजेंसियों की थ्योरी बदली, कई पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई, मामला सीबीआई को सौंपा गया और फिर मुंबई में लंबे समय तक सुनवाई चली।
- क्या है सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस?
- सोहराबुद्दीन की मौत पर दो अलग-अलग दावे
- कौसर बी की मौत भी बनी अहम कड़ी
- तुलसीराम प्रजापति की मौत ने बढ़ाया मामला
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई को मिली जांच
- गुजरात से मुंबई पहुंचा मामला
- 2018 में सभी 22 आरोपी बरी
- 2026 में हाईकोर्ट ने भी बरी करने का फैसला रखा बरकरार
- अब सुप्रीम कोर्ट में होगी अगली लड़ाई
क्या है सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस?
मामले की शुरुआत नवंबर 2005 में हुई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सोहराबुद्दीन शेख अपनी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति के साथ हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे। इसी दौरान गुजरात और राजस्थान पुलिस की एक टीम ने उन्हें कथित तौर पर हिरासत में लिया।जांच के अनुसार, पहले तुलसीराम प्रजापति को बस से उतारा गया। इसके बाद सोहराबुद्दीन और कौसर बी को भी अलग-अलग वाहनों से ले जाया गया। सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी को गुजरात लाया गया, जबकि तुलसीराम को राजस्थान ले जाया गया।सीबीआई की बाद की जांच में आरोप लगाया गया कि इन लोगों को कथित तौर पर अगवा किया गया था और पूरी कार्रवाई को बाद में अलग-अलग घटनाओं का रूप दिया गया।

सोहराबुद्दीन की मौत पर दो अलग-अलग दावे
26 नवंबर 2005 को सोहराबुद्दीन अहमदाबाद में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। उस समय पुलिस और एटीएस की ओर से दावा किया गया था कि सोहराबुद्दीन के आतंकी संगठनों से संबंध थे और वह एक बड़े राजनीतिक नेता की हत्या की कथित साजिश के तहत अहमदाबाद आया था।बाद में जांच की दिशा बदल गई। सीबीआई की थ्योरी में आरोप लगाया गया कि सोहराबुद्दीन को लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा आतंकी बताकर उसकी हत्या की गई और इस कार्रवाई को पुलिस मुठभेड़ का रूप दिया गया।हालांकि यह अभियोजन पक्ष की थ्योरी थी, जिसे बाद की न्यायिक कार्यवाही में पर्याप्त सबूतों के अभाव में साबित नहीं किया जा सका।

कौसर बी की मौत भी बनी अहम कड़ी
सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी की मौत भी इस मामले की महत्वपूर्ण कड़ी रही। जांच एजेंसी ने उनकी मौत को भी कथित साजिश से जोड़ा था। जांच में उनकी मौत की परिस्थितियों को लेकर कई सवाल उठे और अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि उनकी हत्या के बाद शव को जला दिया गया।लेकिन ट्रायल और बाद की अपीलीय कार्यवाही में अभियोजन पक्ष इस पूरे घटनाक्रम को ठोस सबूतों के साथ साबित नहीं कर सका।

तुलसीराम प्रजापति की मौत ने बढ़ाया मामला
सोहराबुद्दीन केस में तुलसीराम प्रजापति की मौत को भी अहम माना गया। वह उदयपुर की केंद्रीय जेल में बंद था। दिसंबर 2006 में कथित पुलिस मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई।पुलिस का दावा था कि तुलसीराम ने भागने की कोशिश की और आत्मरक्षा में पुलिस की गोली से उसकी मौत हुई। दूसरी ओर, सीबीआई ने अपनी जांच में आरोप लगाया कि तुलसीराम सोहराबुद्दीन और कौसर बी से जुड़े घटनाक्रम की जानकारी रखने वाला संभावित गवाह था और उसे कथित तौर पर रास्ते से हटाने की साजिश रची गई।बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तुलसीराम प्रजापति की मौत की जांच को सोहराबुद्दीन मामले से जोड़कर देखा गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई को मिली जांच
सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने 2006 में मामले की जांच की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जांच शुरू हुई। बाद में मामला गुजरात सीआईडी के पास गया और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई।2010 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी। जांच एजेंसी ने कथित फर्जी एनकाउंटर और उससे जुड़ी बड़ी साजिश की थ्योरी के आधार पर कई लोगों को आरोपी बनाया।मामले में गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह समेत कई पुलिस अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया था। बाद में उन्हें मामले से आरोपमुक्त कर दिया गया।

गुजरात से मुंबई पहुंचा मामला
2012 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गुजरात से बाहर स्थानांतरित कर मुंबई में सुनवाई का आदेश दिया। सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति से जुड़े मामलों को भी साथ जोड़ दिया गया।2014 में मामला मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत पहुंचा। शुरुआत में मामले में आरोपियों की संख्या ज्यादा थी, लेकिन सुनवाई आगे बढ़ने के दौरान कई आरोपियों को आरोपमुक्त किया गया। आखिरकार 22 आरोपियों के खिलाफ ट्रायल चला।
2018 में सभी 22 आरोपी बरी
29 नवंबर 2017 को ट्रायल शुरू हुआ। अभियोजन पक्ष ने बड़ी संख्या में गवाह पेश किए। सितंबर 2018 तक अभियोजन की गवाही पूरी हो गई। कुल 210 गवाहों की जांच हुई, जिनमें से 92 गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए।21 दिसंबर 2018 को मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष कथित साजिश और फर्जी एनकाउंटर के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेजी और ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया।अदालत ने यह भी माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी आरोपियों को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं थी।
2026 में हाईकोर्ट ने भी बरी करने का फैसला रखा बरकरार
विशेष अदालत के फैसले को सोहराबुद्दीन के भाइयों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। लंबी सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 7 मई 2026 को 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित थी, लेकिन इन साक्ष्यों में कई महत्वपूर्ण कड़ियां कमजोर थीं। अदालत को ऐसा कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिला, जो आरोपियों को कथित एनकाउंटर की साजिश से जोड़ सके।अदालत ने कथित अपहरण, अवैध हिरासत और फर्जी एनकाउंटर की साजिश को भी अभियोजन द्वारा पर्याप्त सबूतों से साबित नहीं माना।
अब सुप्रीम कोर्ट में होगी अगली लड़ाई
अब नयाबुद्दीन शेख ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इससे करीब दो दशक पुराने इस मामले में एक बार फिर न्यायिक बहस शुरू होने की संभावना है।फिलहाल महत्वपूर्ण बात यह है कि निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों ने आरोपियों को बरी किया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि क्या निचली अदालत और हाईकोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है।सोहराबुद्दीन केस की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जांच की अलग-अलग थ्योरी, पुलिस कार्रवाई, सीबीआई की जांच, गवाहों के बयान, न्यायिक समीक्षा और लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया सभी शामिल हैं। अब नयाबुद्दीन की याचिका के बाद 21 साल पुराने इस मामले की कानूनी कहानी एक बार फिर देश की नजरों में है।
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