India GDP Growth: ईरान युद्ध के बीच 7.8% GDP ग्रोथ, ऐसे बढ़ी अर्थव्यवस्था

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पश्चिम एशिया में तनाव, महंगे कच्चे तेल, टैरिफ की चुनौतियों और कमजोर मानसून के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने शानदार प्रदर्शन किया है। अप्रैल-जून 2026 तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही। आखिर किन वजहों से तमाम वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूती से आगे बढ़ी? आइए 5 बड़े सवालों के जरिए समझते हैं।

मुश्किल हालात के बीच 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ

एक तरफ पश्चिम एशिया में संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दीं, वहीं दूसरी तरफ कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, एलपीजी-एलएनजी की उपलब्धता पर दबाव, अमेरिका की टैरिफ नीति और कमजोर मानसून जैसी परिस्थितियों ने भारत के सामने भी मुश्किलें बढ़ाईं।इसके बावजूद अप्रैल-जून 2026 की पहली तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी। यह प्रदर्शन इसलिए खास है क्योंकि कई आर्थिक संस्थानों के अनुमान से भी यह विकास दर ज्यादा रही।सवाल यह है कि जब बाहरी दबाव इतने ज्यादा थे तो भारत की अर्थव्यवस्था ने इतनी तेज रफ्तार कैसे बनाए रखी?

सवाल नंबर-1: भारत के सामने इतनी बड़ी चुनौतियां क्या थीं?

पश्चिम एशिया के तनाव ने भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आयात लागत से जुड़ी चिंताएं बढ़ाईं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर परिवहन से लेकर उद्योग तक दिखाई दे सकता है।महंगे कच्चे माल ने कंपनियों की लागत बढ़ाई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक विनिर्माण क्षेत्र में कच्चे माल की लागत में 25.3 फीसदी और बिजली एवं ईंधन खर्च में 19.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।इसके अलावा महंगाई का दबाव भी बना रहा। जुलाई में खुदरा महंगाई 4.45 फीसदी तक पहुंचने की बात सामने आई। वहीं थोक कीमतों पर आधारित महंगाई भी ऊंचे स्तर पर रही।

सवाल नंबर-2: कमजोर मानसून और अल नीनो का असर क्यों नहीं पड़ा?

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र और ग्रामीण मांग की बड़ी भूमिका है। ऐसे में कमजोर मानसून चिंता का कारण बन सकता था।इस दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से करीब 14 फीसदी कम रहने का दावा किया गया। इसका असर कृषि क्षेत्र की विकास दर पर भी पड़ा और यह पिछले साल के 4.4 फीसदी से घटकर 3.6 फीसदी रह गई।इसके बावजूद पूरी अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनी रही। इसकी बड़ी वजह यह रही कि कृषि क्षेत्र में कमजोरी की भरपाई अर्थव्यवस्था के दूसरे महत्वपूर्ण सेक्टरों ने की। खास तौर पर सेवा, विनिर्माण, निवेश और घरेलू मांग ने GDP को मजबूती दी।

सवाल नंबर-3: आखिर GDP को सबसे ज्यादा ताकत कहां से मिली?

भारत की आर्थिक विकास कहानी में घरेलू मांग सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक बनकर सामने आई है।पहली तिमाही में निजी खपत की वृद्धि दर पिछले साल के 6.8 फीसदी से बढ़कर 7.1 फीसदी रही। यानी वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता और मांग में मजबूती बनी रही।इसके साथ ही निवेश में भी तेज बढ़ोतरी हुई। पहली तिमाही में ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन यानी GFCF में 11.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह वृद्धि केवल 5.8 फीसदी थी।इसका मतलब है कि भारतीय अर्थव्यवस्था सिर्फ लोगों की खरीदारी के भरोसे नहीं चल रही, बल्कि निवेश और उत्पादन भी इसकी रफ्तार को मजबूत कर रहे हैं।

सवाल नंबर-4: बैंकिंग और उद्योग ने कैसे दिया सहारा?

अर्थव्यवस्था में पैसे का प्रवाह बढ़ने का असर बैंक लोन पर भी दिखाई दिया। जून के अंत तक बैंक ऋण में सालाना आधार पर 18.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।उद्योगों को दिए गए कर्ज में 19.2 फीसदी और सेवा क्षेत्र के कर्ज में 21.4 फीसदी की बढ़ोतरी बताई गई। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां विस्तार, उत्पादन और कारोबारी गतिविधियों के लिए कर्ज का इस्तेमाल कर रही हैं।विनिर्माण क्षेत्र ने भी चुनौतीपूर्ण माहौल में बेहतर प्रदर्शन किया। मैन्युफैक्चरिंग की विकास दर 9.2 फीसदी रही, जो पिछले साल की 8.3 फीसदी की दर से अधिक है।वहीं वित्तीय सेवाओं, रियल एस्टेट, आईटी और प्रोफेशनल सर्विसेज से जुड़े क्षेत्रों में 12.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

सवाल नंबर-5: सरकार की नीतियों ने कैसे संभाली अर्थव्यवस्था?

वैश्विक ऊर्जा संकट का सीधा असर आम लोगों पर न पड़े, इसके लिए सरकार ने कई स्तरों पर राहत देने की कोशिश की।खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम से जुड़ी सब्सिडी बढ़ाने से लागत के दबाव को कम करने का प्रयास किया गया। उर्वरक सब्सिडी में भी बड़ी वृद्धि की गई, जिससे किसानों पर बढ़ती लागत का बोझ कुछ हद तक नियंत्रित रखने में मदद मिली।ईंधन कीमतों को भी अपेक्षाकृत स्थिर रखने की कोशिश की गई। इसका फायदा परिवहन लागत और महंगाई के मोर्चे पर मिला।इसके अलावा पिछली GST कटौतियों का असर भी घरेलू मांग पर दिखाई दिया। कर राहत से लोगों की खरीदारी क्षमता को सहारा मिला और निजी खपत की रफ्तार मजबूत बनी रही।सरकार के बुनियादी ढांचे पर खर्च और निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने भी आर्थिक गतिविधियों को गति देने में भूमिका निभाई।

विशेषज्ञों को आगे भी मजबूत ग्रोथ की उम्मीद

पहली तिमाही के 7.8 फीसदी के आंकड़े के बाद कई अर्थशास्त्रियों ने पूरे वित्त वर्ष के लिए भारत की विकास दर के अनुमान में सुधार किया है।एचडीएफसी बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा से जुड़े विशेषज्ञों ने पूरे वित्त वर्ष की GDP ग्रोथ का अनुमान करीब 7 फीसदी तक बढ़ाया है। वहीं कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आने वाली तिमाहियों में रफ्तार थोड़ी कम होने के बावजूद पूरे साल में 7 से 7.2 फीसदी की वास्तविक GDP ग्रोथ हासिल की जा सकती है।हालांकि विशेषज्ञों ने जोखिमों को लेकर भी चेताया है। लगातार महंगा कच्चा तेल, रुपये पर दबाव, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां और भू-राजनीतिक तनाव आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बने रह सकते हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए 7.8% ग्रोथ क्यों अहम?

भारत की 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ यह दिखाती है कि वैश्विक संकटों के बीच अर्थव्यवस्था का घरेलू आधार मजबूत बना हुआ है। निजी खपत, निवेश, बैंकिंग गतिविधियों, सेवा क्षेत्र और मैन्युफैक्चरिंग ने मिलकर विकास की रफ्तार को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत वैश्विक जोखिमों से पूरी तरह सुरक्षित हो गया है। तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया की स्थिति जैसे बाहरी कारक आगे भी विकास की राह को प्रभावित कर सकते हैं।फिलहाल 7.8 फीसदी की GDP ग्रोथ ने यह जरूर संकेत दिया है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के घरेलू इंजन मजबूत हैं। आने वाली तिमाहियों में असली चुनौती इस रफ्तार को कायम रखने की होगी।

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