यरुशलम इजरायल के आम चुनाव के नतीजों ने देश की राजनीति में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है। हालांकि, सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद नेतन्याहू के लिए सत्ता में बने रहना आसान नहीं होगा। उनके नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को कुल 53 सीटें मिली हैं, जो बहुमत के आंकड़े से आठ सीट कम हैं। विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिली हैं। दूसरी तरफ अरब नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों ने संयुक्त रूप से 19 सीटें हासिल कर चुनाव के बाद सत्ता के समीकरण में अपनी अहमियत बढ़ा दी है। इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि फिलहाल कोई भी बड़ा राजनीतिक खेमा अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। इजरायल में अगली सरकार किसकी बनेगी, इसका फैसला अब राजनीतिक दलों के बीच होने वाली बातचीत और संभावित गठबंधन पर निर्भर करेगा।
इजरायल की संसद को नेसेट (Knesset) कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं और किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। इस बार के चुनाव में लिकुड पार्टी ने 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया है, लेकिन उसके सहयोगी दलों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं। दूसरी ओर गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे ने 48 सीटें हासिल की हैं। अरब नेतृत्व वाले जॉइंट लिस्ट और राम पार्टी को मिलाकर 19 सीटें मिली हैं। यही 19 सीटें अब सरकार गठन की पूरी राजनीतिक तस्वीर को प्रभावित कर सकती हैं।


अरब दलों के हाथ में सत्ता की चाबी
इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अरब नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों का प्रदर्शन माना जा रहा है। इन दलों ने कुल 19 सीटें जीतकर संसद में अपनी स्थिति मजबूत की है। पिछले सदन की तुलना में यह संख्या काफी अधिक है। ऐसे में सरकार बनाने की कोशिश कर रहे दोनों प्रमुख खेमों के लिए इन दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।विपक्ष यदि अरब दलों के समर्थन को लेकर सहमति बना लेता है, तो उसके पास बहुमत तक पहुंचने का गणित मौजूद है। हालांकि, ऐसा गठबंधन बनाना राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा। विपक्षी खेमे में शामिल कुछ दलों के लिए अरब पार्टियों के साथ सरकार में शामिल होना या उनका समर्थन स्वीकार करना एक बड़ा राजनीतिक फैसला होगा।दूसरी तरफ नेतन्याहू पहले ही अरब दलों के साथ गठबंधन की संभावना को खारिज करते रहे हैं। ऐसे में उनके सामने अपने मौजूदा सहयोगियों के अलावा अन्य राजनीतिक विकल्प तलाशने की चुनौती होगी।
किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं?
चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रदर्शन ने संसद की तस्वीर बदल दी है। प्रमुख पार्टियों को मिली सीटों का गणित इस प्रकार है:
| राजनीतिक दल | सीटें |
|---|---|
| लिकुड | 27 |
| यशार | 21 |
| बी’याचद | 12 |
| जॉइंट लिस्ट | 11 |
| द डेमोक्रेट्स | 8 |
| राम | 8 |
| इजरायल बेतेनु | 7 |
| यूनाइटेड टोरा यहूदीवाद | 7 |
| ओत्जमा येहुदित | 7 |
| शास | 6 |
| रिलीजियस जियोनिज्म | 6 |
इन नतीजों में लिकुड सबसे बड़ी पार्टी बनी है, जबकि गादी आइजनकोट की यशार पार्टी 21 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। नफ्ताली बेनेट की बी’याचद पार्टी को 12 सीटें मिली हैं। चुनाव में मतदान प्रतिशत 77.9 फीसदी रहा, जिसे पिछले कई दशकों के सबसे अधिक मतदान प्रतिशतों में गिना जा रहा है।
नेतन्याहू के सामने क्या हैं विकल्प?
चुनाव परिणामों के बाद नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने गठबंधन को बहुमत तक पहुंचाने की है। 53 सीटों के साथ उनका खेमा बहुमत से आठ सीट पीछे है। ऐसे में उन्हें नए राजनीतिक सहयोगियों की जरूरत होगी।एक विकल्प यह है कि नेतन्याहू अपने मौजूदा सहयोगी दलों के साथ मिलकर अन्य छोटे दलों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करें। दूसरा विकल्प विपक्षी खेमे के साथ किसी तरह का राजनीतिक समझौता हो सकता है। हालांकि, दोनों ही रास्ते आसान नहीं दिखाई दे रहे हैं।विपक्ष के सामने भी कमोबेश यही स्थिति है। 48 सीटों के साथ विपक्ष को बहुमत तक पहुंचने के लिए 13 अतिरिक्त सीटों की जरूरत है। अरब दलों का समर्थन मिलने पर यह गणित संभव हो सकता है, लेकिन वैचारिक मतभेद और राजनीतिक शर्तें इस प्रक्रिया में बाधा बन सकती हैं।
सरकार नहीं बनी तो फिर हो सकते हैं चुनाव
इजरायल में सरकार गठन की प्रक्रिया अब राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की भूमिका के साथ आगे बढ़ेगी। चुनाव परिणामों के औपचारिक प्रमाणीकरण के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करेंगे और सरकार बनाने के लिए किसी उम्मीदवार को जिम्मेदारी सौंपेंगे।सरकार बनाने के लिए निर्धारित समय में बहुमत जुटाना जरूरी होगा। यदि कोई भी नेता आवश्यक समर्थन हासिल करने में सफल नहीं होता है, तो दूसरी कोशिश और अंततः नए चुनाव की स्थिति पैदा हो सकती है।चुनाव आयोग के मुताबिक, अंतिम परिणामों को 4 नवंबर को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना है। वहीं, नई संसद यानी 26वीं नेसेट का शपथ ग्रहण 10 नवंबर को निर्धारित है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में इजरायल की राजनीति में गठबंधन को लेकर गतिविधियां तेज हो सकती हैं।
गाजा, ईरान और अमेरिका पर भी पड़ेगा असर
इजरायल में नई सरकार का गठन केवल देश की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पश्चिम एशिया की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है। खासतौर पर गाजा, फिलिस्तीन, ईरान और लेबनान के साथ इजरायल के संबंधों को लेकर नई सरकार की नीतियां महत्वपूर्ण होंगी।नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार की नीतियों और सैन्य रणनीति को लेकर पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस होती रही है। ऐसे में यदि नई सरकार में राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, तो गाजा में संघर्ष, फिलिस्तीन के साथ बातचीत और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी नीतिगत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।अमेरिका के साथ इजरायल के संबंध भी इस राजनीतिक बदलाव से प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, चुनाव परिणामों के आधार पर अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि नई सरकार बनने के बाद विदेश नीति में किस तरह के बदलाव होंगे।
नेतन्याहू की राजनीतिक पकड़ पर उठे सवाल
इस चुनाव को नेतन्याहू के लंबे राजनीतिक नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी पार्टी का सबसे बड़ा दल बनना राजनीतिक मजबूती का संकेत जरूर है, लेकिन गठबंधन का बहुमत से दूर रहना उनके सामने मौजूद चुनौतियों को भी उजागर करता है। विपक्ष के लिए भी यह परिणाम उम्मीद और चुनौती दोनों लेकर आया है। उसे नेतन्याहू के गठबंधन से कम सीटें मिली हैं, लेकिन अरब दलों के प्रदर्शन ने सरकार बनाने की संभावनाओं का एक नया रास्ता खोल दिया है।फिलहाल इजरायल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू अपने सहयोगियों के साथ मिलकर सत्ता बचाने में कामयाब होंगे या विपक्ष अरब दलों के समर्थन से नया राजनीतिक समीकरण तैयार करेगा। इतना तय है कि 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद नेतन्याहू के लिए सरकार बनाने की राह आसान नहीं है। आने वाले दिनों में गठबंधन की बातचीत ही इजरायल की अगली सरकार और देश की राजनीतिक दिशा तय करेगी।
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