लखनऊ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के ‘चवन्नी’ वाले बयान पर राष्ट्रीय लोक दल (RLD) प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी ने पलटवार किया है। जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर उन्हें कुछ ‘सस्ते शब्द’ बोलने ही थे तो वह उनका नाम ले लेते। उनके इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर सपा और रालोद के बीच जुबानी जंग तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।जयंत चौधरी का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति के बीच पुराने गठबंधनों, राजनीतिक रिश्तों और आगामी चुनावी रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हैं। अखिलेश यादव के बयान को लेकर जयंत चौधरी की प्रतिक्रिया ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है।

क्या है ‘चवन्नी’ वाले बयान का मामला?
अखिलेश यादव ने हाल ही में राजनीतिक संदर्भ में ‘चवन्नी’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए विपक्षी राजनीति और नेताओं पर निशाना साधा था। उनके बयान को लेकर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गईं। इसी क्रम में जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए कहा कि यदि उन्हें कुछ सस्ते शब्दों का इस्तेमाल करना ही था तो उनका नाम लिया जा सकता था।जयंत चौधरी के इस बयान को अखिलेश यादव की टिप्पणी का सीधा जवाब माना जा रहा है। हालांकि, उन्होंने अपने बयान में किसी विस्तृत राजनीतिक विवाद को लेकर कोई अलग घोषणा नहीं की, लेकिन उनके शब्दों ने दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेदों की चर्चा को जरूर हवा दे दी है।
जयंत चौधरी बोले- मेरा नाम ले लेते
जयंत चौधरी ने अखिलेश यादव की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “कुछ सस्ते शब्द बोलने ही थे, तो ले लेते मेरा नाम।” उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में तीखे पलटवार के तौर पर देखा जा रहा है।जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के राजनीतिक रिश्ते उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले भी चर्चा में रहे हैं। दोनों दलों ने अलग-अलग समय पर गठबंधन के जरिए चुनावी राजनीति में साथ काम किया है। ऐसे में दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सपा और रालोद के रिश्तों का रहा है लंबा राजनीतिक सफर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल का गठबंधन नया नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और किसान राजनीति के प्रभाव को देखते हुए रालोद का राजनीतिक महत्व रहा है, जबकि सपा का आधार प्रदेश के कई हिस्सों में मजबूत माना जाता है। दोनों दलों ने चुनावी परिस्थितियों के अनुसार एक-दूसरे के साथ गठबंधन किया है।2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटों पर रालोद ने प्रभाव छोड़ा था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले रालोद ने एनडीए के साथ जाने का फैसला किया। जयंत चौधरी का भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होना सपा के साथ उनके राजनीतिक समीकरण में बड़ा बदलाव माना गया था।यही वजह है कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की ओर से आने वाले राजनीतिक बयानों पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में विशेष नजर रहती है।
गठबंधन बदलने के बाद बदले राजनीतिक समीकरण
जयंत चौधरी के एनडीए में शामिल होने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बने। रालोद ने भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा और केंद्र की राजनीति में जयंत चौधरी को महत्वपूर्ण भूमिका मिली।दूसरी ओर, अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन के साथ चुनावी मैदान में उतरकर भाजपा के खिलाफ अभियान चलाया। ऐसे में सपा और रालोद के बीच राजनीतिक दूरी पहले की तुलना में स्पष्ट दिखाई देने लगी।अब अखिलेश यादव के ‘चवन्नी’ वाले बयान पर जयंत चौधरी के जवाब ने दोनों नेताओं के बीच जारी राजनीतिक तल्खी को फिर चर्चा में ला दिया है।
पश्चिमी यूपी की राजनीति पर भी नजर
जयंत चौधरी की राजनीति का प्रमुख प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में माना जाता है। किसान, ग्रामीण क्षेत्र और जाट समुदाय की राजनीति में रालोद लंबे समय से सक्रिय रहा है। दूसरी तरफ सपा भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश करती रही है।ऐसे में दोनों नेताओं के बीच होने वाली बयानबाजी केवल व्यक्तिगत राजनीतिक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं मानी जाती। राजनीतिक विश्लेषक इसे उत्तर प्रदेश में बदलते गठबंधन और वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर भी देखते हैं।हालांकि मौजूदा बयान को लेकर दोनों दलों की ओर से आगे कोई बड़ा राजनीतिक कदम सामने आता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।
यूपी की सियासत में बयानबाजी से बढ़ी हलचल
उत्तर प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बीच राजनीतिक दल लगातार अपने संगठन और जनाधार को मजबूत करने में जुटे हैं। इसी दौरान नेताओं के बीच बयानबाजी भी तेज होती रही है।अखिलेश यादव की टिप्पणी और उसके जवाब में जयंत चौधरी के बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आने वाले समय में सपा और रालोद के बीच राजनीतिक रिश्ते किस दिशा में जाएंगे। हालांकि दोनों दलों की मौजूदा राजनीतिक स्थिति अलग है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दोनों के प्रभाव को देखते हुए इनके बीच होने वाली हर राजनीतिक टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जाती है।फिलहाल जयंत चौधरी के “कुछ सस्ते शब्द बोलने ही थे, तो ले लेते मेरा नाम” वाले बयान ने राजनीतिक बहस को नया मुद्दा दे दिया है। अब देखना होगा कि अखिलेश यादव इस पलटवार का कोई जवाब देते हैं या नहीं। यदि दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी आगे बढ़ती है, तो इसका असर उत्तर प्रदेश की राजनीतिक चर्चा पर साफ दिखाई दे सकता है।
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