लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में महिला डॉक्टरों और नर्सिंग कर्मचारियों से जुड़े कथित उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन के दबाव के मामलों ने संस्थान की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन में हलचल तेज हो गई है। रिपोर्ट में अलग-अलग विभागों से जुड़े डॉक्टरों, रेजिडेंट डॉक्टरों और कर्मचारियों की कथित भूमिका का उल्लेख किया गया है। आरोपों में प्रेम संबंध के बहाने नजदीकी बढ़ाने, शादी का झांसा देने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने जैसे गंभीर मामले शामिल हैं।एसटीएफ की जांच में गांधी वार्ड, पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग से जुड़े प्रकरणों का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में नफीस, मुस्तफा और रेजिडेंट डॉक्टर आदिल सहित कई लोगों से जुड़े कथित मामलों का उल्लेख है। जांच का एक अहम पहलू यह भी है कि शिकायतें सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने क्या कदम उठाए और शिकायतकर्ताओं को संस्थान के भीतर कितना सहयोग मिला।एसटीएफ की रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सा शिक्षा विभाग ने केजीएमयू प्रशासन को कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी ने कुलसचिव को पत्र भेजकर संबंधित मामलों में अब तक की गई कार्रवाई का विवरण मांगा है। अब सवाल केवल आरोपों की जांच का नहीं, बल्कि संस्थान की जवाबदेही और महिला कर्मचारियों की सुरक्षा का भी है।
- एसटीएफ की जांच में कई विभागों के मामले आए सामने
- पैथोलॉजी विभाग से जुड़े मामलों की भी पड़ताल
- गांधी वार्ड में नफीस और मुस्तफा से जुड़े आरोप
- माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग भी जांच के दायरे में
- शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर प्रशासन की भूमिका भी सवालों में
- शासन ने कुलसचिव से मांगा कार्रवाई का विवरण
- अब केजीएमयू प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी निगाहें

एसटीएफ की जांच में कई विभागों के मामले आए सामने
केजीएमयू से जुड़े मामलों की गंभीरता को देखते हुए एसटीएफ ने विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में सामने आई शिकायतों की पड़ताल की। जांच में संबंधित लोगों की भूमिका, शिकायतों की प्रकृति और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई को समझने का प्रयास किया गया।रिपोर्ट में अलग-अलग विभागों से जुड़े प्रकरणों का उल्लेख है। इनमें महिला डॉक्टरों, रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग कर्मचारियों की शिकायतें शामिल बताई गई हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में पहले निजी संबंध स्थापित किए गए और बाद में शादी या धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाया गया। कुछ शिकायतों में कथित उत्पीड़न और विरोध करने पर करियर प्रभावित होने की आशंका जताने जैसी बातें भी सामने आई हैं।एसटीएफ की जांच में कुल 12 मामलों का विवरण शामिल किया गया है। इनमें कुछ लोगों को कथित मुख्य आरोपी और अन्य को अलग-अलग प्रकरणों से संबंधित बताया गया है। प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग हैं और किसी भी व्यक्ति की भूमिका का अंतिम निर्धारण साक्ष्यों तथा कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।



पैथोलॉजी विभाग से जुड़े मामलों की भी पड़ताल
एसटीएफ की रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें रेजिडेंट डॉक्टरों के खिलाफ महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों की ओर से की गई शिकायतों की पड़ताल शामिल है। कुछ शिकायतों में निजी संबंधों के दौरान कथित तौर पर शादी का भरोसा देने, उत्पीड़न करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप लगाए गए।एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर की शिकायत पर दिसंबर 2025 में लखनऊ के चौक थाने में मुकदमा दर्ज किए जाने का विवरण भी मीडिया रिपोर्टों में सामने आया है। इस प्रकरण में संबंधित डॉक्टर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई किए जाने की जानकारी दी गई थी। एसटीएफ ने शिकायत के साथ-साथ यह भी जांचा कि संस्थान के स्तर पर मामले को किस तरह संभाला गया।रेजिडेंट डॉक्टर आदिल से जुड़े कथित मामले का भी रिपोर्ट में उल्लेख है। एक महिला कर्मचारी की शिकायत और उस पर दर्ज मुकदमे की जानकारी जांच के दायरे में रही। इन मामलों में लगाए गए आरोपों की पुष्टि संबंधित साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया से होनी बाकी है।
गांधी वार्ड में नफीस और मुस्तफा से जुड़े आरोप
एसटीएफ की रिपोर्ट में गांधी वार्ड से जुड़े प्रकरण भी शामिल बताए गए हैं। इस संदर्भ में नफीस और मुस्तफा के नाम सामने आए हैं। आरोपों की जांच के दौरान महिला नर्सिंग कर्मचारियों की शिकायतों और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल की गई।शिकायतों में कथित रूप से निजी संबंधों के बहाने नजदीकी बढ़ाने, शादी का भरोसा देने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने जैसी बातें शामिल बताई गई हैं। जांच एजेंसी ने यह समझने का प्रयास किया कि इन शिकायतों के पीछे की परिस्थितियां क्या थीं और संबंधित विभागों में शिकायतों पर किस स्तर पर कार्रवाई हुई।यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अस्पताल में काम करने वाली महिला डॉक्टरों और नर्सिंग कर्मचारियों को सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल उपलब्ध कराना संस्थान की जिम्मेदारी है। यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आती है तो उसकी निष्पक्ष जांच और शिकायतकर्ता को सुरक्षा देना प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग भी जांच के दायरे में
एसटीएफ की पड़ताल माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग तक भी पहुंची। माइक्रोबायोलॉजी विभाग में संविदा पर कार्यरत एक महिला कर्मचारी की शिकायत का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है। शिकायत में कथित उत्पीड़न और शादी तथा धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाए जाने के आरोप शामिल बताए गए हैं।जांच के दौरान यह भी देखा गया कि शिकायत मिलने के बाद विभागीय स्तर पर क्या प्रक्रिया अपनाई गई। क्या शिकायत की निष्पक्ष जांच हुई और संबंधित कर्मचारी के खिलाफ नियमानुसार कदम उठाए गए या नहीं, इन सवालों की पड़ताल की गई।रेडियोलॉजी विभाग से जुड़े एक अन्य मामले में भी महिला कर्मचारी या छात्रा की शिकायत के आधार पर कथित ब्लैकमेलिंग और धर्म परिवर्तन के दबाव के आरोपों का जिक्र है। एसटीएफ ने इन प्रकरणों को अपनी रिपोर्ट में शामिल करते हुए संबंधित घटनाओं और संस्थान की प्रतिक्रिया का विवरण दिया है।
शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर प्रशासन की भूमिका भी सवालों में
इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका है। एसटीएफ की रिपोर्ट में शिकायतों पर हुई कार्रवाई और संस्थान के भीतर शिकायत निवारण व्यवस्था की पड़ताल की गई है। कुछ मामलों में शिकायतकर्ताओं को अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने और कार्रवाई में देरी के आरोप भी सामने आए हैं।यदि किसी शिकायत को जानबूझकर दबाया गया या किसी व्यक्ति को अनुचित संरक्षण दिया गया, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर विषय होगा। इन आरोपों की पुष्टि जांच के निष्कर्षों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही होनी चाहिए।केजीएमयू जैसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में डॉक्टरों और कर्मचारियों के लिए सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता की पहचान और निजता की रक्षा करते हुए निष्पक्ष जांच करना संस्थान की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
शासन ने कुलसचिव से मांगा कार्रवाई का विवरण
एसटीएफ की रिपोर्ट सामने आने के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने केजीएमयू प्रशासन से जवाब तलब किया है। संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी ने कुलसचिव को पत्र लिखकर रिपोर्ट में चिह्नित मामलों में अब तक की गई कार्रवाई का विवरण मांगा है।शासन की ओर से संबंधित डॉक्टरों, शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ केजीएमयू अधिनियम 2002 तथा परिनियमावली 2011 के तहत नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह बताना होगा कि रिपोर्ट में सामने आए मामलों में क्या कदम उठाए गए और आगे की कार्रवाई की स्थिति क्या है।अब केजीएमयू प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच कराए, संबंधित पक्षों को सुनने के बाद नियमानुसार निर्णय ले और शासन को कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराए।
अब केजीएमयू प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
एसटीएफ की रिपोर्ट ने केजीएमयू में शिकायत निवारण व्यवस्था, महिला कर्मचारियों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब यह देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन रिपोर्ट में दर्ज प्रत्येक प्रकरण पर क्या कार्रवाई करता है और चिकित्सा शिक्षा विभाग को कब तक विस्तृत जवाब भेजता है।इस मामले में यह भी जरूरी है कि आरोपों की जांच व्यक्ति विशेष और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हो। किसी धर्म या समुदाय को सामूहिक रूप से निशाना बनाने के बजाय दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।फिलहाल एसटीएफ की रिपोर्ट के बाद मामला शासन और विश्वविद्यालय प्रशासन के स्तर पर पहुंच चुका है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि जांच में सामने आए आरोपों पर कितनी पारदर्शिता से कार्रवाई होती है और क्या संस्थान में काम करने वाली महिला डॉक्टरों तथा कर्मचारियों को सुरक्षित माहौल देने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।
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